मंगलवार, 2 जनवरी 2018

आसपास की गलियों से गुजरती ‘बातों वाली गली’ - गिरिजा कुलश्रेष्ठ

गिरिजा कुलश्रेष्ठ... यानी फ़ुल-टू मिठास. मीठा स्वभाव, मीठी आवाज़, मीठा लेखन..... कुछ व्यक्तित्व सादगी की ऐसी प्रतिमूर्ति होते हैं, जो सादगी का स्वयमेव पर्याय बन जाते हैं. गिरिजा दीदी ऐसा ही व्यक्तित्व हैं. आइये देखें, क्या लिखती हैं वे.
यह सुखद संयोग है कि जब कभी ब्लाग पर दिख जाने वाली वन्दना अवस्थी दुबे, जिनका प्रथम परिचय सलिल भैया (सलिल वर्मा) की ‘जिज्जी’के रूप में हुआ था लेकिन पिछले साल अर्चना चावजी द्वारा बनाए वाट्सअप ग्रुप (गाओ गुनगुनाओ) के माध्यम से उनसे भेंट हुई तो मैं उनके व्यक्तित्त्व और वाक्कौशल से प्रभावित हुए बिना न रह सकी . गीत और संवादों के माध्यम से वे हर किसी की आत्मीया बन गई हैं . कहने की जरूरत नही कि जब इनका यह पहला कहानी संग्रह बातों वाली गली आया तो पढ़ने की उत्कण्ठा तीव्र हो उठी . पता चला कि पुस्तक आमेजोन से प्राप्त की जा सकती है पर शायद माँग पूर्ति से अधिक होजाने के कारण निराशा ही हाथ लगी . तब ग्रुप पर ही उन बहिनों से भेजने का आग्रह किया जो ‘बातों वाली गली’ की बातें करके जी ललचा रही थीं . तब बहिन ऊषाकिरण (मेरठ) ने मुझे यह पुस्तक भेजी यानी ‘बातों वाली गली’ . यह हुई इस बहुप्रतीक्षित पुस्तक को पाने की दास्तान .
बातों वाली गली में बीस कहानियाँ हैं .आसपास की ही ,रोजमर्रा के जीवन की छोटी छोटी बातों को लेकर बुनी गई बड़ी कहानियाँ जैसे हमारे आपके बीच गुजरती चलती हैं . निम्न मध्यम परिवारों में मेहमान के आने पर उनके नाश्ते वगैरह को देख बच्चे किस तरह ललचाते हैं यह मार्मिक और बहुत ही जाना माना प्रसंग है जिसे वन्दना जी ने कहानी (अपने अपने दायरे ) में खूबसूरती से पिरोया है . ‘अनिश्चितता में’ , छोटी किन्तु बेरोजगारी से आई हीनता की अच्छी कहानी है ‘.ज्ञातव्य’ कहानी में पापा की मेहमाननवाजी को कोसने वाले बच्चे अपनी तरह से घर चलाते हैं .इसमें नई पीढ़ी में दूर के या व्यर्थ मेहमानों के प्रति उपेक्षा के भाव को बखूबी दर्शाया है . वास्तव में यह आज का यथार्थ है . ‘आसपास बिखरे लोग’ , लोगों की संवेदनहीनता का निर्मम दस्तावेज है . दूसरों के यहाँ हुई दुर्घटना लोगों के लिये महज एक खबर है . पड़ोस में बहू के जल जाने पर लोग तमाम बातें तो करते है पर सच को सामने लाने वाला कोई कदम नही उठाते . शीर्षक कहानी , जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है घर में रहने वाली महिलाएं अक्सर किस तरह दूसरों के बारे में अनुमान लगाकर तिल का ताड़ बना लेतीं हैं यह बड़ा और कड़वा सच है . जैसा कि भूमिका में अचला जी ने कहा है अधिकांश कहानियाँ स्त्री विमर्श पर केन्द्रित हैं .’हवा उद्दण्ड है’ , ‘नीरा जाग गई है’ ,’अहसास’ ,’सब जानती है शैव्या’ ,’प्रिया की डायरी’ ,ममता जी बड़ी होगई हैं ‘विरुद्ध’ ,’बड़ी बाई साब’ आदि कहानियाँ स्त्री के असन्तोष , अपने अस्तित्व के प्रति जागरूकता ,व व्यवस्था के प्रति असन्तोष की कहानियाँ हैं . हाँ ‘रमणीक भाई नहीं रहे’ , ‘पापा सब तुम्हारे कारण हुआ’ , ‘शिव शिव बोल.’, .कुछ अलग तरह की कहानियाँ हैं .ये लगभग सारी कहानियाँ उनके ब्लाग किस्सा-कहानी पर भी हैं .
कुल मिलाकर सारी कहानियाँ हमारी अपनी हैं . आसपास की है . जहाँ तक कहानियों के कथ्य की बात है ,वे रोजमर्रा की सामान्य जिन्दगी का जीवन्त दस्तावेज हैं .उनके पात्र आप और हममें से ही हैं . पात्रों के मनोभावों का सूक्ष्म चित्रण लेखिका के गहन निरीक्षण व अनुभूति का परिचायक है . संवाद रोचक हैं. भाषा सरल और जन सामान्य की भाषा है . कहीं भी दुरूहता नहीं है . सहज प्रवाह है . खास बात है लेखिका के कहने का तरीका जो किस्सा कहानी सा ही रोचक है . हर कहानी इतनी रोचकता के साथ शुरु होती है कि पाठक का ध्यान सहज ही जिज्ञासा से भर जाता है . वर्णन बेशक गजब का है . चाहे वह देशकाल हो या अन्तर्संघर्ष . बहुत गहन व सूक्ष्म चित्रण है . कुछ भी बनावटी नहीं लगता . हाँ कहीं कहीं कहानी का उद्देश्य स्पष्टता की माँग करता प्रतीत होता है . कहीं कहीं शिल्प में भी कुछ सुधार की गुंजाइश है . मेरे विचार से ‘बड़ी बाई साब’ ऐसी ही कहानी है . 
निष्कर्षतः बातों वाली गली कहानी संग्रह पाठकों के बीच जगह बनाएगा नहीं , बना चुका है . आशा है कि आगे और भी निखार के साथ हमें उनकी कहानियाँ पढ़ने मिलेंगी .

3 टिप्‍पणियां:

  1. "बातों वाली गली' की एक और बहुत अच्छी समीक्षा प्रस्तुति

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  2. बहुत आभार कविता जी. गिरिजा जी लिखती ही हैं ऐसा...

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  3. "बातों वाली गली' की एक और बहुत अच्छी समीक्षा प्रस्तु

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