रविवार, 14 जनवरी 2018

बुन्देलखंड की मकर संक्रान्ति

सर्दिया शुरु होते ही मेरे ज़ेहन में जो त्यौहार ज़ोर मारने लगता है वो है मकर संक्रान्ति. सर्दियों में आने वाला एकमात्र ऐसा बड़ा त्योहार
जिस पर हमारे घर में बड़े सबेरे नहा लेने की बाध्यता होती थी. इधर जनवरी शुरु हुई, उधर हमारे घर में सन्क्रान्ति की तैयारियां शुरु . कम से कम पांच प्रकार के लड्डुओं 
 की तैयारी करनी होती थी मम्मी को. ज्वार, बाजरा, मक्का और उड़द की दाल की पूड़ियां, मूंग दाल की मंगौड़ियां, और कई तरह के नमकीन. अब सोचिये, इतना सब करने में समय लगेगा न? वो समय पैकेट बन्द तैयार आटा मिलने का नहीं था. अब तो बाज़ार जाओ और ज्वार/बाजरा/मक्का जो चाहिये, उसी का आटा एकदम तैयार, पैकेट में सील-पैक घर ले आओ.  हमारे बचपन में ये सारे आटे अनाज की शक्ल में मिलते थे, जिनसे चक्की पर जा के आटा बनवाना पड़ता था.
हमारे घर लड्डू बनाने की शुरुआत मम्मी संक्रान्ति के दो दिन पहले कर देती थीं. आटे के लड्डू, लाई के लड्डू, तिल के दो तरह के लड्डू, नारियल के लड्डू और मूंगफ़ली के लड्डू. संक्रान्ति की सुबह सारे बच्चों को रोज़ की अपेक्षा जल्दी जगा दिया जाता. सर्दियों में सुबह छह बजे उठना मायने रखता है. उठते ही सबको दूध मिलता और बारी-बारी से नहा लेने का आदेश पारित होता. आंगन में एक कटोरे में पिसी हुई तिल का उबटन रक्खा होता, जिसे पूरे शरीर पर लगा के नहाने की ताक़ीद होती. बहुत सारे लोग तो इस दिन शहर के पास बहने वाली नदी में डुबकी लगाने जाते, और इसीलिये बुन्देलखण्ड में मकर संक्रान्ति का एक और नाम “बुड़की” भी प्रचलित है. तो इतनी सुबह नहाना, वो भी ठंडे पानी से!!! नहाने में आनाकानी करने वाले को कहा जाता कि- “यदि तुमने नहीं नहाया तो तुम लंका की गधी/गधा बनोगी अगले जन्म में. “ तब तो मैं छोटी थी, सो इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया कि आखिर लंका की गधी/गधा ही क्यों बनेगा कोई? लेकिन अब जरूर ये सवाल ज़ेहन में आता है तो पता करने की कोशिश भी करती हूं. लेकिन अब तक कोई सटीक जवाब नहीं मिल सका, जबकि मकर संक्रान्ति के दिन न नहाने वाले को यही कह कर डराने का चलन आज भी है.

तो भाई, सारे बच्चे नहा-धो के तैयार हो जाते. जो बच्चा नहा के निकलता, मम्मी उसके हाथ-पैरों में सरसों के तेल की हल्की मालिश करतीं, अच्छे कपड़े पहनातीं और कमरे में जल रही  गोरसी (  सर्दियों में आग जलाने के लिये इस्तेमाल किया जाने वाला मिट्टी का चौड़ा पात्र,  जिसमें हवन भी किया जाता है) के सामने बिठाती जातीं. जब सबने नहा लिया तो हम सब पूजाघर में इकट्ठे होते. यहां भगवान पर फूल चढाते, पहले से जल रहे छोटे से हवन कुंड में तिल-गुड़ के मिक्स्चर से हवन करते और वहीं बड़े से भगौने में रखी कच्ची खिचड़ी ( दाल-चावल का मिश्रण) पांच-पांच मुट्ठी भर, थाली में निकाल देते. काले तिल के लड्डू भी पांच-पांच की संख्या में ही निकालते. ये अनाज और लड्डू, गरीबों को दिया जाने वाला था.
इसके बाद हम सब फिर गोरसी को घेर के बैठ जाते और फिर शुरु होती पेट-पूजा. मम्मी सुबह हरे पत्तों वाली प्याज़ की मुंगौड़ियां  बनातीं और थाली में भर के बीच में रख देतीं. हम सब बच्चे मिल के उस पर हाथ साफ़ करते जाते. उड़द/ज्वार और मक्के की पूड़ियां भी सुबह ही बनतीं. दोपहर के खाने में केवल खिचड़ी बनती. ये खिचड़ी भी नये चावल से बनाई जाती. खिचड़ी खाने के विधान के चलते ही इस त्यौहार का नाम “खिचड़ी” भी है बुन्देलखंड में.  शाम को फिर मूंग की मुंगौड़ी, पूड़ियां, तरह-तरह के लड्डू और शक्कर के घोड़े/हाथी, जो बाज़ार से खरीदे जाते. गन्ने भी पूरे बाज़ार में बेचने के लिये लाये जाते. तो ये है बुन्देलख्न्ड की मकर संक्रान्ति… कृषि-प्रधान देश का कृषि आधारित साल का पहला त्यौहार.  देश के तमाम हिस्सों में इस दिन पतंगबाज़ी का भी रिवाज़ है. खासतौर से गुजरात और राजस्थान में.
ये एकमात्र ऐसा त्यौहार है जिसे अलग-अलग प्रदेशों में, अलग-अलग  नामों से जाना जाता है. मकर संक्रान्ति, पंजाब और हरियाणा में “लोहिड़ी”  के नाम से मनाई जाती है तो असम में यही “बिहू” हो जाती है. वहीं दक्षिण भारत में इसे “पोंगल” के नाम से मनाते हैं. दक्षिण में यह त्यौहार चार दिन तक मनाया जाता है. तिल-चावल और दाल की खिचड़ी

के अलावा यहां “पायसम” जो कि नये चावल और दूध से बनी विशेष प्रकार की खीर को कहा जाता है, भी बनाते हैं.
मकर संक्रान्ति के दिन भगवान भास्कर अपने पुत्र शनिदेव से स्वयं मिलने आते हैं. चूंकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, इसलिये इस त्यौहार को “मकर संक्रान्ति” के नाम से जाना गया. महाभारत में भीष्म पितामह ने शरीर त्यागने के लिये, मकर संक्रान्ति का दिन ही चुना था. तो तमाम पौराणिक/भौगोलिक/ और पर्यावरणीय महत्व वाले इस त्यौहार को आइये मनाते हैं पूरे रीति-रिवाज़ के साथ, क्योंकि इस की हर रीति में छुपा है आयुर्वेद का कोई न कोई राज़… आप सबको मकर संक्रान्ति की अनन्त शुभकामनाएं.



मंगलवार, 2 जनवरी 2018

आसपास की गलियों से गुजरती ‘बातों वाली गली’ - गिरिजा कुलश्रेष्ठ

गिरिजा कुलश्रेष्ठ... यानी फ़ुल-टू मिठास. मीठा स्वभाव, मीठी आवाज़, मीठा लेखन..... कुछ व्यक्तित्व सादगी की ऐसी प्रतिमूर्ति होते हैं, जो सादगी का स्वयमेव पर्याय बन जाते हैं. गिरिजा दीदी ऐसा ही व्यक्तित्व हैं. आइये देखें, क्या लिखती हैं वे.
यह सुखद संयोग है कि जब कभी ब्लाग पर दिख जाने वाली वन्दना अवस्थी दुबे, जिनका प्रथम परिचय सलिल भैया (सलिल वर्मा) की ‘जिज्जी’के रूप में हुआ था लेकिन पिछले साल अर्चना चावजी द्वारा बनाए वाट्सअप ग्रुप (गाओ गुनगुनाओ) के माध्यम से उनसे भेंट हुई तो मैं उनके व्यक्तित्त्व और वाक्कौशल से प्रभावित हुए बिना न रह सकी . गीत और संवादों के माध्यम से वे हर किसी की आत्मीया बन गई हैं . कहने की जरूरत नही कि जब इनका यह पहला कहानी संग्रह बातों वाली गली आया तो पढ़ने की उत्कण्ठा तीव्र हो उठी . पता चला कि पुस्तक आमेजोन से प्राप्त की जा सकती है पर शायद माँग पूर्ति से अधिक होजाने के कारण निराशा ही हाथ लगी . तब ग्रुप पर ही उन बहिनों से भेजने का आग्रह किया जो ‘बातों वाली गली’ की बातें करके जी ललचा रही थीं . तब बहिन ऊषाकिरण (मेरठ) ने मुझे यह पुस्तक भेजी यानी ‘बातों वाली गली’ . यह हुई इस बहुप्रतीक्षित पुस्तक को पाने की दास्तान .
बातों वाली गली में बीस कहानियाँ हैं .आसपास की ही ,रोजमर्रा के जीवन की छोटी छोटी बातों को लेकर बुनी गई बड़ी कहानियाँ जैसे हमारे आपके बीच गुजरती चलती हैं . निम्न मध्यम परिवारों में मेहमान के आने पर उनके नाश्ते वगैरह को देख बच्चे किस तरह ललचाते हैं यह मार्मिक और बहुत ही जाना माना प्रसंग है जिसे वन्दना जी ने कहानी (अपने अपने दायरे ) में खूबसूरती से पिरोया है . ‘अनिश्चितता में’ , छोटी किन्तु बेरोजगारी से आई हीनता की अच्छी कहानी है ‘.ज्ञातव्य’ कहानी में पापा की मेहमाननवाजी को कोसने वाले बच्चे अपनी तरह से घर चलाते हैं .इसमें नई पीढ़ी में दूर के या व्यर्थ मेहमानों के प्रति उपेक्षा के भाव को बखूबी दर्शाया है . वास्तव में यह आज का यथार्थ है . ‘आसपास बिखरे लोग’ , लोगों की संवेदनहीनता का निर्मम दस्तावेज है . दूसरों के यहाँ हुई दुर्घटना लोगों के लिये महज एक खबर है . पड़ोस में बहू के जल जाने पर लोग तमाम बातें तो करते है पर सच को सामने लाने वाला कोई कदम नही उठाते . शीर्षक कहानी , जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है घर में रहने वाली महिलाएं अक्सर किस तरह दूसरों के बारे में अनुमान लगाकर तिल का ताड़ बना लेतीं हैं यह बड़ा और कड़वा सच है . जैसा कि भूमिका में अचला जी ने कहा है अधिकांश कहानियाँ स्त्री विमर्श पर केन्द्रित हैं .’हवा उद्दण्ड है’ , ‘नीरा जाग गई है’ ,’अहसास’ ,’सब जानती है शैव्या’ ,’प्रिया की डायरी’ ,ममता जी बड़ी होगई हैं ‘विरुद्ध’ ,’बड़ी बाई साब’ आदि कहानियाँ स्त्री के असन्तोष , अपने अस्तित्व के प्रति जागरूकता ,व व्यवस्था के प्रति असन्तोष की कहानियाँ हैं . हाँ ‘रमणीक भाई नहीं रहे’ , ‘पापा सब तुम्हारे कारण हुआ’ , ‘शिव शिव बोल.’, .कुछ अलग तरह की कहानियाँ हैं .ये लगभग सारी कहानियाँ उनके ब्लाग किस्सा-कहानी पर भी हैं .
कुल मिलाकर सारी कहानियाँ हमारी अपनी हैं . आसपास की है . जहाँ तक कहानियों के कथ्य की बात है ,वे रोजमर्रा की सामान्य जिन्दगी का जीवन्त दस्तावेज हैं .उनके पात्र आप और हममें से ही हैं . पात्रों के मनोभावों का सूक्ष्म चित्रण लेखिका के गहन निरीक्षण व अनुभूति का परिचायक है . संवाद रोचक हैं. भाषा सरल और जन सामान्य की भाषा है . कहीं भी दुरूहता नहीं है . सहज प्रवाह है . खास बात है लेखिका के कहने का तरीका जो किस्सा कहानी सा ही रोचक है . हर कहानी इतनी रोचकता के साथ शुरु होती है कि पाठक का ध्यान सहज ही जिज्ञासा से भर जाता है . वर्णन बेशक गजब का है . चाहे वह देशकाल हो या अन्तर्संघर्ष . बहुत गहन व सूक्ष्म चित्रण है . कुछ भी बनावटी नहीं लगता . हाँ कहीं कहीं कहानी का उद्देश्य स्पष्टता की माँग करता प्रतीत होता है . कहीं कहीं शिल्प में भी कुछ सुधार की गुंजाइश है . मेरे विचार से ‘बड़ी बाई साब’ ऐसी ही कहानी है . 
निष्कर्षतः बातों वाली गली कहानी संग्रह पाठकों के बीच जगह बनाएगा नहीं , बना चुका है . आशा है कि आगे और भी निखार के साथ हमें उनकी कहानियाँ पढ़ने मिलेंगी .