शुक्रवार, 16 मार्च 2018

वंदना अवस्थी दुबे ‘कहानी’ और ओम नागर ‘कविता’ श्रेणी में प्रथम


कलमकार पुरस्कारों की घोषणा
वंदना अवस्थी कहानीऔर ओम नागर कविताश्रेणी में प्रथम
जयपुर। कलमकार मंच की ओर से राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित कलमकार पुरस्कार प्रतियोगिता में कहानी एवं लघुकथा श्रेणी में प्रथम पुरस्कार सतना, मध्यप्रदेश निवासी वंदना अवस्थी दुबे की कहानी जब हम मुसलमान थेऔर गीत, गजल, कविता श्रेणी में प्रथम पुरस्कार कोटा, राजस्थान के ओम नागर की रचना हँसी के कण्ठ में अभी रोना बचा हैको दिया जाएगा। पुरस्कार वितरण समारोह आगामी 25 मार्च को जगतपुरा स्थित सुरेश ज्ञान विहार यूनिवर्सिटी में होगा। निर्णायक मंडल के निर्णय के अनुसार कहानी एवं लघुकथा श्रेणी में द्वितीय और तृतीय पुरस्कार क्रमश: मुंबई के दिलीप कुमार की कहानी हरि इच्छा बलवानऔर वड़ोदरा, गुजरात के ओमप्रकाश नौटियाल की कहानी शतरंजी खंभाको दिया जाएगा। गीत, गजल एवं कविता श्रेणी में द्वितीय और तृतीय पुरस्कार क्रमश: नई दिल्ली की मानवी वहाणे की रचना प्यारी दीदी के लिएऔर देवास, मध्यप्रदेश के मनीष शर्मा की रचना अटालाको दिया जाएगा। 
कलमकार मंच के संयोजक निशांत मिश्रा ने बताया कि देश के रचनाकारों और उनकी रचनाओं को सम्मान और मंच उपलब्ध कराने के उद्देश्य से कलमकार पुरस्कार के लिए राष्ट्रीय स्तर पर रचनाकारों से दो श्रेणियों रचनाएं आमंत्रित की गई थीं। कहानी एवं लघुकथा श्रेणी में कुल 87 और गीत, कविता एवं गजल श्रेणी में कुल 144 रचनाएं प्राप्त हुईं। टीम कलमकार की ओर से शॉर्टलिस्ट करने के बाद प्रथम चरण में पुरस्कार के लिए श्रेष्ठ रचनाओं का चयन साहित्यकार प्रदीप जिलवाने, उमा, तस्नीम खान और स्थानीय लेखक भागचंद गूर्जर ने किया।
मिश्रा ने बताया कि निर्णायक मंडल में प्रो. सत्यनारायण, पाखी के संपादक प्रेम भारद्वाज, विख्यात लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ, वरिष्ठ पत्रकार ईशमधु तलवार, दूरदर्शन के पूर्व निदेशक नंद भारद्वाज, कहानीकार चरणसिंह पथिक, साहित्यकार डॉ. अनुज कुमार और मध्यप्रदेश के जाने माने साहित्यकार बहादुर पटेल शामिल थे।
उन्होंने बताया कि प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय पुरस्कार के तहत क्रमश: 5100, 3100 और 2100 रुपए के साथ श्रीफ ल, प्रमाण पत्र और ट्रॉफ ी दी जाएगी। दोनों श्रेणियों में दस-दस श्रेष्ठ रचनाओं का चयन सांत्वना पुरस्कार के लिए किया गया है। सुरेश ज्ञान विहार यूनिवर्सिटी में 25 मार्च को होने वाले पुरस्कार वितरण समारोह में प्रतियोगिता के लिए चयनित और पुरस्कृत रचनाओं से सुसज्जित पत्रिका कलमकार का विमोचन भी किया जाएगा।
कहानी एवं लघुकथा श्रेणी में सांत्वना पुरस्कार विनोद कुमार दवे, अंजू शर्मा, रुपेन्द्र राज तिवारी, चन्द्रशेखर त्रिशूल, वैभव वर्मा, पूनम माटिया, राजेश मेहरा, असीमा भट्ट, सविता मिश्रा अक्षजा’, मिन्नी मिश्रा, भारती कुमारी, चन्द्रकेतु बेनीवाल और गीत, कविता एवं गजल श्रेणी में फरहत दुर्रानी शिकस्ता’, विकास शर्मा दक्ष’, लीलाधर लखेरा, कैलाश मनहर, अलका गुप्ता भारती’, राम नारायण हलधर, राम लखारा विपुल’, मनोज राठौर मनुज’, डॉ. शिव कुशवाहा शाश्वतऔर शाइस्ता मेहजबी शाइस्ताको दिये जाएंगे.

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गुरुवार, 1 मार्च 2018

श्वेता का प्यारा सा गिफ़्ट..... :)



जिन चीज़ों का इंतज़ार , हम छोड़ देते हैं, अगर अचानक ही वे मिल जाएं तो हमारे लिए सरप्राइज़ गिफ्ट की तरह होती हैं। Sweta Soni की ये पुस्तक समीक्षा भी मेरे लिए गिफ़्ट ही है। खूब स्नेह श्वेता 
बातों वाली गली------------------
हाँ-हाँ,जानती हूँ बहुत देर से आई हूँ!पर करती भी क्या? गुम जो हो गई थी गलियों में।बहुत हीं रोचक और मजेदार रही अवस्थी दीदी(वंदना अवस्थी दुबे)के मन की गली यानि-"बातों वाली गली"।एक दो नहीं पूरे बीसियों विषय की दिलचस्प और अनोखी कहानी है इसमें-चलिए रूब रू करवाती हूँ कहानियों की---
पहली गली से नाम है-"अलग-अलग दायरे"----यह कहानी सुनील,उसकी पत्नी नीरू और उसकी सखी राजी के इर्द-गिर्द घूमती है।इस कहानी में दो सखियों के बीच अमीरी-गरीबी में जी जा रही जिंदगी की कुछ झलकियां है जो पूरी तरह वास्तविकता से जुड़ी है के-कैसा महसूस करती है एक गरीब सखी जब उसके घर उसकी अमीर सखी कुछ पल बिताने आती है,हर चीज में कमी महसूस कर अंदर-अंदर शर्म और हीन भाव में जब खुद को आंकती है।परन्तु उसके पति ने उसे बहुत बढ़िया बात बताई और उसे ये कह कर सम्भाला के-"मित्रता उनके बीच हीं कायम रह सकती है जिसमें बनावटीपन या दिखावा न हो,साथ ही एक दूजे को समझने की क्षमता हो।.....👨‍👩‍👧‍👦
दूसरी गली-"अनिश्चितता में"...इस कहानी की शुरुआत लेखिका ने रेल यात्रा से की है और करे भी क्यूँ न!एक दुःखी चिंतित व्यक्ति को कुछ सोचने के लिए इससे अच्छी जगह कहाँ मिलेगी।इस कहानी का नायक अपने बेरोजगारी से हताश था जो एम.एस.सी में 65% लाने के बावजूद बेकार बैठा था।अब तो उसके छोटे भाई को भी नौकरी लग गई थी सो उसके सामने आने से भी शर्म महसूस होने लगी थी उसे और तो और पिताजी ने भी तो कोई कसर नहीं छोड़ी ऐसा महसूस कराने के लिए आखिर टोक लगा हीं दी उन्होंने--"आखिर कब तक खिलाता रहूँ तुमलोगों को"--और उस तुमलोगों में मेरे सिवा और बचा ही कौन था। 🤦‍♂️
तीसरी गली-"ज्ञातव्य"---ये गली बहुत कुछ बोध करा गई घर के बच्चों को जब घर की बागडोर सम्भालने का जिम्मा उनके पिता ने उनके हाथों में थमा दी के आखिर कैसे नहीं चलता आपसे घर इतने पैसों में --जब खुद पड़ पड़ी तब समझ आई आखिर होती कहाँ थी फिजूल खर्ची,क्यूँ लेने पड़ जाते थें घर के मुखिया को महीने के अंत में कर्ज!खैर इस फैसले से बच्चों में समझ तो आई,फिजूल खर्ची पर काबू पाने की। 👌
चौथी गली-"आस पास बिखरे लोग"--इस गली में आस-पड़ोस के बेतरतीब लोगों का काबिलानापन उजागर किया है लेखिका ने। जो किसी घटना के विषयों को तोड़-मरोड़ कर एक दूजे से बतिया तो सकते हैं पर वक्त आने पर किसी को इन्साफ दिलाने के लिए पुलिस का साथ नहीं दे सकते आखिर कौन पड़े इस झमेले में सोच भाग खड़े होते हैं 🏃‍♂️-----
पाँचवी गली----"बातों वाली गली"--जो अपने शीर्षक पर खड़ी उतरी है।बातें निकलती हीं है महिलाओं के बीच से सो यहाँ रू ब रू करवाई इस गली के महिलाओं के एक ऐसे झुंड से,जो किसी खास के विषय में झट से कोई राय बनाने से बाज नहीं आतीं-उनके मन को भाई तो बड़ी भली अगर अपनी चलाई तो उससे बुरी संसार में कोई नहीं 😄😄😄शायद! ये कभी नहीं बदल सकता कभी नहीं। 
छठी गली-"नहीं चाहिए आदि को कुछ"---इस गली एक ऐसा बच्चा है जो अक्सर हर गली में पाया जाता है।हाँ बगल के घर का छोटू सा प्यारा बच्चा-जीसे आपका घर,घर की सभी वस्तुएं इतनी भाती है कि वो अपने घर जाना नहीं चाहता।यहीं रह सब पाना चाहता है,मगर वहीं किसी एक रोज जब वो अपनी माँ से किसी कारण वश लम्बे समय तक दूर रहता है तो अपने घर लौटने के लिए ये बोल हीं पड़ता है-नहीं चाहिए मुझे कुछ मुझे तो बस मेरी माँ चाहिए।👩‍👦
सातवीं गली---"हवा उद्दंड है"--इस गली में उन मनचलों का जिक्र हैं जिनकी न तो कोई उम्र होती है न ईमान ये कब किधर हल्लर उठा देंगे किसी को क्या पता! शक होता है क्या ये अपनी माँ-बहन के होते भी होंगे या??👹
आठवीं गली---"नीरा जाग गई है"---इस गली में हर उस गली की वो बेटी है जो किसी न किसी वजह से शादी के लिए ठुकराई गई हो।पर ये बेटी निराश हो रोने धोने में नहीं बल्कि अपनी खुशी तलाश जीवन जीने में विश्वास रखती है।👧
नौवीं गली---" रमणीक भाई नहीं रहें"--इसमें एक बेटी अपने पिता के जाने के बाद उस सोच का लेखा जोखा लेकर बैठती है के पिताजी ने जो किया भाईयों के हक के लिए क्या वो सही है! जो अपनी मर्जी का काम नहीं आजतक उनके साथ दुकान पर हीं रहे बेमन बेसमझ काम से क्या अब जिंदगी भर उन्हें मुनीम चाचा पर हीं निर्भर नहीं रहना पडेगा ये सब शुरू से समझने करने को🤰
दसवीं गली----"सब जानती है शैव्या"---ये उस लड़की की कहानी है जिसे समाज के कुछ लोग आज भी पचा नहीं पाते के लड़की उनके बराबर में आ कैसे कदम मिला चल रही-इसे क्या समझ पत्रकारिता की या अन्य किसी विषय की।पर सयानी शैव्या भली भांति जानती है करना क्या है?👩‍🎓
ग्यारहवीं गली---"अहसास"---इसमें छोटे से घर से आई उन सभी बहुओं की व्यथा है,जीसे अपनी खुशी या अपनी पसंद तक पाने का कोई हक नहीं।🤦‍♀️ 
बारहवीं गली---"दस्तक के बाद"---इसका संबंध उम्र के दस्तक से है जो आप से पहले दूसरे आंक लेते हैं।और अंततः आप भी स्वीकार लेते हैं के सच यही है।👵
तेरहवीं गली---"प्रिया की डायरी"---यह कहानी एक गृहणी के जीवन शैली को प्रदर्शित करती है। 👰
चौदहवीं गली---"करत करत अभ्यास के"---ये कहानी उनकी है जो खुद तो आधुनिक हो गए परन्तु सोच पुरानी है इस में उन जैसों को सुधारने का एक अथक प्रयास किया जा रहा है।👼
पन्द्रहवीं गली---"बड़ी हो गई ममता जी"---इस कहानी में जो बहु है वो भले उम्र के आधे पड़ाव पर है पर अपनी सास के आगे अभी भी उसे बहुत छोटा बना रहना पड़ता है। पहले तो ये बात उसे बहुत खलती है पर जब एक दिन उसकी सास चल बसती हैं तो बार-बार उन्हें याद कर दुखी हो जाती है के अपने बड़े होने की खुशी मनाऊँ या उनके न रहने का गम😢
सोलहवीं गली---"विरूध"---इस कहानी से बहुत अच्छी सीख मिली के अगर रिश्तों में विश्वास या सामंजस्य बैठाने जैसा कुछ बचा न हो तो उसे अलविदा कह अलग हो जाने में हीं फायदा है। 🙅‍♀️
सत्रहवीं गली---"ये कहानी ऐसे पिता पुत्र की है जो परीक्षा और उसमें उपयोग होने वाली अलग-अलग प्रकाशन की किताब पर है।जब एक बार पिता किताब लाने में लेट हो जातें हैं तो बेटा ये सोच कर चिंतित होता है के-कितना समय तो निकल गया अब कैसे होगा----और वहीं पिता ये सोच निश्चिंत होते हैं चलो ले हीं आए हम वरना अंक कम मिलने पर तो ये यही कहता ....सब आपके वजह से हुआ 👴
अठारहवीं गली---"डेरा उखड़ने से पहले" बहुत हीं अलग है आभा की जिंदगी भाई बहन सभी है भाभी भतीजे से भरा घर है फिर भी आजतक अकेले हीं ढ़ोते आई अपने बीमार पिता को करती भी क्या भाई रखने को तैयार जो नहीं थें। वो तो शुक्र है कि उसे नौकरी है वरना क्या होता इन बाप बेटी का।पिता के रहते भाईयों से न के बराबर संबंध रखे थें आभा ने।पर अब अकेले रहने पर कभी कभार हो जाती है बात उनमें।फिर भी एक बड़े उलझन में है वो और हो भी क्यूँ न !पचपन की होने को आई है और सामने से शादी का एक रिश्ता आया है समझ नहीं पा रही आखिर करे क्या---🤔
उन्नीसवीं गली---"शिव बोले मेरी रचना घड़ी-घड़ी"-ढोंगी बाबा पर आधारित ये कहानी बहुत हीं बढ़िया है।आखिर हमने ही तो उपजाने में मदद की है समाज में इस जहरीले पौधे को। तो झेलते भी हम हैं,पर सुधरते नहीं है।...
बीसवीं गली---"ये कहानी ऐसे तथ्य को उजागर करती है के किसी की जिंदगी का फैसला हर बार सिर्फ घर का मुखिया करे ये हीं सही नहीं होता,हर फैसले को हर बार किसी पर थोपने से पहले उसके हित को ध्यान में रख लेना चाहिए। खुशहाल जीवन तभी मिलता है। हालांकि-बड़ी बाई साहब भी अंत में इस तथ्य से सहमत दिखाई पड़ रही थी। 👩‍⚖
हमने तो बहुत छोटा सारांश लिखा,लिखना तो बहुत चाहती हूँ पर दुविधा में हूँ क्या लिखूं और कितना---कैसे खत्म करू इन गलियों की कहानी। बातें भी कभी खत्म होती हैं???फिर कैसे खत्म हो बातों वाली गली की कहानी।तो फिर इंतजार कीजिए आने तक अगले गली की कहनी,जो हमारे बीच लेकर आएंगी हमसब की जिज्जी!एक ब्लॉगर,फेसबुक सखी वंदना अवस्थी दुबे। 
ढेरों शुभकामनाएँ दीदी 😍
------श्वेता सोनी-----

सोमवार, 22 जनवरी 2018

वसन्त......

वैसे तो महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला" का जन्म 21 फरवरी को 1896 में पश्चिमी बंगाल के मेदिनीपुर जिले के महिषादल नामक देशी राज्य में हुआ था, लेकिन उस दिन वसंतपंचमी थी. माँ सरस्वती ने प्रकृति का कैसा अनुपम उपहार दिया साहित्य-जगत को. वसंत पंचमी के अवसर पर निराला जी की एक प्रसिद्ध रचना के साथ हाज़िर हुई हूँ- 

रविवार, 14 जनवरी 2018

बुन्देलखंड की मकर संक्रान्ति

सर्दिया शुरु होते ही मेरे ज़ेहन में जो त्यौहार ज़ोर मारने लगता है वो है मकर संक्रान्ति. सर्दियों में आने वाला एकमात्र ऐसा बड़ा त्योहार
जिस पर हमारे घर में बड़े सबेरे नहा लेने की बाध्यता होती थी. इधर जनवरी शुरु हुई, उधर हमारे घर में सन्क्रान्ति की तैयारियां शुरु . कम से कम पांच प्रकार के लड्डुओं 
 की तैयारी करनी होती थी मम्मी को. ज्वार, बाजरा, मक्का और उड़द की दाल की पूड़ियां, मूंग दाल की मंगौड़ियां, और कई तरह के नमकीन. अब सोचिये, इतना सब करने में समय लगेगा न? वो समय पैकेट बन्द तैयार आटा मिलने का नहीं था. अब तो बाज़ार जाओ और ज्वार/बाजरा/मक्का जो चाहिये, उसी का आटा एकदम तैयार, पैकेट में सील-पैक घर ले आओ.  हमारे बचपन में ये सारे आटे अनाज की शक्ल में मिलते थे, जिनसे चक्की पर जा के आटा बनवाना पड़ता था.
हमारे घर लड्डू बनाने की शुरुआत मम्मी संक्रान्ति के दो दिन पहले कर देती थीं. आटे के लड्डू, लाई के लड्डू, तिल के दो तरह के लड्डू, नारियल के लड्डू और मूंगफ़ली के लड्डू. संक्रान्ति की सुबह सारे बच्चों को रोज़ की अपेक्षा जल्दी जगा दिया जाता. सर्दियों में सुबह छह बजे उठना मायने रखता है. उठते ही सबको दूध मिलता और बारी-बारी से नहा लेने का आदेश पारित होता. आंगन में एक कटोरे में पिसी हुई तिल का उबटन रक्खा होता, जिसे पूरे शरीर पर लगा के नहाने की ताक़ीद होती. बहुत सारे लोग तो इस दिन शहर के पास बहने वाली नदी में डुबकी लगाने जाते, और इसीलिये बुन्देलखण्ड में मकर संक्रान्ति का एक और नाम “बुड़की” भी प्रचलित है. तो इतनी सुबह नहाना, वो भी ठंडे पानी से!!! नहाने में आनाकानी करने वाले को कहा जाता कि- “यदि तुमने नहीं नहाया तो तुम लंका की गधी/गधा बनोगी अगले जन्म में. “ तब तो मैं छोटी थी, सो इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया कि आखिर लंका की गधी/गधा ही क्यों बनेगा कोई? लेकिन अब जरूर ये सवाल ज़ेहन में आता है तो पता करने की कोशिश भी करती हूं. लेकिन अब तक कोई सटीक जवाब नहीं मिल सका, जबकि मकर संक्रान्ति के दिन न नहाने वाले को यही कह कर डराने का चलन आज भी है.

तो भाई, सारे बच्चे नहा-धो के तैयार हो जाते. जो बच्चा नहा के निकलता, मम्मी उसके हाथ-पैरों में सरसों के तेल की हल्की मालिश करतीं, अच्छे कपड़े पहनातीं और कमरे में जल रही  गोरसी (  सर्दियों में आग जलाने के लिये इस्तेमाल किया जाने वाला मिट्टी का चौड़ा पात्र,  जिसमें हवन भी किया जाता है) के सामने बिठाती जातीं. जब सबने नहा लिया तो हम सब पूजाघर में इकट्ठे होते. यहां भगवान पर फूल चढाते, पहले से जल रहे छोटे से हवन कुंड में तिल-गुड़ के मिक्स्चर से हवन करते और वहीं बड़े से भगौने में रखी कच्ची खिचड़ी ( दाल-चावल का मिश्रण) पांच-पांच मुट्ठी भर, थाली में निकाल देते. काले तिल के लड्डू भी पांच-पांच की संख्या में ही निकालते. ये अनाज और लड्डू, गरीबों को दिया जाने वाला था.
इसके बाद हम सब फिर गोरसी को घेर के बैठ जाते और फिर शुरु होती पेट-पूजा. मम्मी सुबह हरे पत्तों वाली प्याज़ की मुंगौड़ियां  बनातीं और थाली में भर के बीच में रख देतीं. हम सब बच्चे मिल के उस पर हाथ साफ़ करते जाते. उड़द/ज्वार और मक्के की पूड़ियां भी सुबह ही बनतीं. दोपहर के खाने में केवल खिचड़ी बनती. ये खिचड़ी भी नये चावल से बनाई जाती. खिचड़ी खाने के विधान के चलते ही इस त्यौहार का नाम “खिचड़ी” भी है बुन्देलखंड में.  शाम को फिर मूंग की मुंगौड़ी, पूड़ियां, तरह-तरह के लड्डू और शक्कर के घोड़े/हाथी, जो बाज़ार से खरीदे जाते. गन्ने भी पूरे बाज़ार में बेचने के लिये लाये जाते. तो ये है बुन्देलख्न्ड की मकर संक्रान्ति… कृषि-प्रधान देश का कृषि आधारित साल का पहला त्यौहार.  देश के तमाम हिस्सों में इस दिन पतंगबाज़ी का भी रिवाज़ है. खासतौर से गुजरात और राजस्थान में.
ये एकमात्र ऐसा त्यौहार है जिसे अलग-अलग प्रदेशों में, अलग-अलग  नामों से जाना जाता है. मकर संक्रान्ति, पंजाब और हरियाणा में “लोहिड़ी”  के नाम से मनाई जाती है तो असम में यही “बिहू” हो जाती है. वहीं दक्षिण भारत में इसे “पोंगल” के नाम से मनाते हैं. दक्षिण में यह त्यौहार चार दिन तक मनाया जाता है. तिल-चावल और दाल की खिचड़ी

के अलावा यहां “पायसम” जो कि नये चावल और दूध से बनी विशेष प्रकार की खीर को कहा जाता है, भी बनाते हैं.
मकर संक्रान्ति के दिन भगवान भास्कर अपने पुत्र शनिदेव से स्वयं मिलने आते हैं. चूंकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, इसलिये इस त्यौहार को “मकर संक्रान्ति” के नाम से जाना गया. महाभारत में भीष्म पितामह ने शरीर त्यागने के लिये, मकर संक्रान्ति का दिन ही चुना था. तो तमाम पौराणिक/भौगोलिक/ और पर्यावरणीय महत्व वाले इस त्यौहार को आइये मनाते हैं पूरे रीति-रिवाज़ के साथ, क्योंकि इस की हर रीति में छुपा है आयुर्वेद का कोई न कोई राज़… आप सबको मकर संक्रान्ति की अनन्त शुभकामनाएं.



मंगलवार, 2 जनवरी 2018

आसपास की गलियों से गुजरती ‘बातों वाली गली’ - गिरिजा कुलश्रेष्ठ

गिरिजा कुलश्रेष्ठ... यानी फ़ुल-टू मिठास. मीठा स्वभाव, मीठी आवाज़, मीठा लेखन..... कुछ व्यक्तित्व सादगी की ऐसी प्रतिमूर्ति होते हैं, जो सादगी का स्वयमेव पर्याय बन जाते हैं. गिरिजा दीदी ऐसा ही व्यक्तित्व हैं. आइये देखें, क्या लिखती हैं वे.
यह सुखद संयोग है कि जब कभी ब्लाग पर दिख जाने वाली वन्दना अवस्थी दुबे, जिनका प्रथम परिचय सलिल भैया (सलिल वर्मा) की ‘जिज्जी’के रूप में हुआ था लेकिन पिछले साल अर्चना चावजी द्वारा बनाए वाट्सअप ग्रुप (गाओ गुनगुनाओ) के माध्यम से उनसे भेंट हुई तो मैं उनके व्यक्तित्त्व और वाक्कौशल से प्रभावित हुए बिना न रह सकी . गीत और संवादों के माध्यम से वे हर किसी की आत्मीया बन गई हैं . कहने की जरूरत नही कि जब इनका यह पहला कहानी संग्रह बातों वाली गली आया तो पढ़ने की उत्कण्ठा तीव्र हो उठी . पता चला कि पुस्तक आमेजोन से प्राप्त की जा सकती है पर शायद माँग पूर्ति से अधिक होजाने के कारण निराशा ही हाथ लगी . तब ग्रुप पर ही उन बहिनों से भेजने का आग्रह किया जो ‘बातों वाली गली’ की बातें करके जी ललचा रही थीं . तब बहिन ऊषाकिरण (मेरठ) ने मुझे यह पुस्तक भेजी यानी ‘बातों वाली गली’ . यह हुई इस बहुप्रतीक्षित पुस्तक को पाने की दास्तान .
बातों वाली गली में बीस कहानियाँ हैं .आसपास की ही ,रोजमर्रा के जीवन की छोटी छोटी बातों को लेकर बुनी गई बड़ी कहानियाँ जैसे हमारे आपके बीच गुजरती चलती हैं . निम्न मध्यम परिवारों में मेहमान के आने पर उनके नाश्ते वगैरह को देख बच्चे किस तरह ललचाते हैं यह मार्मिक और बहुत ही जाना माना प्रसंग है जिसे वन्दना जी ने कहानी (अपने अपने दायरे ) में खूबसूरती से पिरोया है . ‘अनिश्चितता में’ , छोटी किन्तु बेरोजगारी से आई हीनता की अच्छी कहानी है ‘.ज्ञातव्य’ कहानी में पापा की मेहमाननवाजी को कोसने वाले बच्चे अपनी तरह से घर चलाते हैं .इसमें नई पीढ़ी में दूर के या व्यर्थ मेहमानों के प्रति उपेक्षा के भाव को बखूबी दर्शाया है . वास्तव में यह आज का यथार्थ है . ‘आसपास बिखरे लोग’ , लोगों की संवेदनहीनता का निर्मम दस्तावेज है . दूसरों के यहाँ हुई दुर्घटना लोगों के लिये महज एक खबर है . पड़ोस में बहू के जल जाने पर लोग तमाम बातें तो करते है पर सच को सामने लाने वाला कोई कदम नही उठाते . शीर्षक कहानी , जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है घर में रहने वाली महिलाएं अक्सर किस तरह दूसरों के बारे में अनुमान लगाकर तिल का ताड़ बना लेतीं हैं यह बड़ा और कड़वा सच है . जैसा कि भूमिका में अचला जी ने कहा है अधिकांश कहानियाँ स्त्री विमर्श पर केन्द्रित हैं .’हवा उद्दण्ड है’ , ‘नीरा जाग गई है’ ,’अहसास’ ,’सब जानती है शैव्या’ ,’प्रिया की डायरी’ ,ममता जी बड़ी होगई हैं ‘विरुद्ध’ ,’बड़ी बाई साब’ आदि कहानियाँ स्त्री के असन्तोष , अपने अस्तित्व के प्रति जागरूकता ,व व्यवस्था के प्रति असन्तोष की कहानियाँ हैं . हाँ ‘रमणीक भाई नहीं रहे’ , ‘पापा सब तुम्हारे कारण हुआ’ , ‘शिव शिव बोल.’, .कुछ अलग तरह की कहानियाँ हैं .ये लगभग सारी कहानियाँ उनके ब्लाग किस्सा-कहानी पर भी हैं .
कुल मिलाकर सारी कहानियाँ हमारी अपनी हैं . आसपास की है . जहाँ तक कहानियों के कथ्य की बात है ,वे रोजमर्रा की सामान्य जिन्दगी का जीवन्त दस्तावेज हैं .उनके पात्र आप और हममें से ही हैं . पात्रों के मनोभावों का सूक्ष्म चित्रण लेखिका के गहन निरीक्षण व अनुभूति का परिचायक है . संवाद रोचक हैं. भाषा सरल और जन सामान्य की भाषा है . कहीं भी दुरूहता नहीं है . सहज प्रवाह है . खास बात है लेखिका के कहने का तरीका जो किस्सा कहानी सा ही रोचक है . हर कहानी इतनी रोचकता के साथ शुरु होती है कि पाठक का ध्यान सहज ही जिज्ञासा से भर जाता है . वर्णन बेशक गजब का है . चाहे वह देशकाल हो या अन्तर्संघर्ष . बहुत गहन व सूक्ष्म चित्रण है . कुछ भी बनावटी नहीं लगता . हाँ कहीं कहीं कहानी का उद्देश्य स्पष्टता की माँग करता प्रतीत होता है . कहीं कहीं शिल्प में भी कुछ सुधार की गुंजाइश है . मेरे विचार से ‘बड़ी बाई साब’ ऐसी ही कहानी है . 
निष्कर्षतः बातों वाली गली कहानी संग्रह पाठकों के बीच जगह बनाएगा नहीं , बना चुका है . आशा है कि आगे और भी निखार के साथ हमें उनकी कहानियाँ पढ़ने मिलेंगी .