रविवार, 1 अक्तूबर 2017

बातों वाली गली में निवास करती सशक्त एवं शालीन स्त्री: राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर



बातों वाली गली में टहलते हुए अपने आसपास का माहौल ही नजर आया. जिस तरह से रोज ही जो निश्चित सी दिनचर्या लोगों की दिखाई देती है, कुछ-कुछ वैसी ही बातों वाली गली के लोगों की दिखी. लघुकथा जैसे छोटे कलेवर में विस्तृत फलक दिखाई दिया. वंदना जी अपने बचपन से लेकर अद्यतन लेखकीय कर्म से लगातार सम्बद्ध रही हैं. विज्ञान की नींव पर उन्होंने जिस तरह से भाषाओं की, पुरातत्व की, साहित्य की, पत्रकारिता की बुलंद इमारत बनाई वो प्रशंसनीय है. इसी का परिणाम बातों वाली गली से गुजरते हुए दिखाई भी देता है. बहुत ही सामान्य सी भाषा में वे कहानियों के माध्यम से समाज की वास्तविकता को सामने रखती नजर आती हैं. जो पाठक उनके ब्लॉग अथवा सोशल मीडिया पर उनके लेखन से परिचित होगा उसके लिए समझना मुश्किल न रहा होगा कि बातों वाली गली में किस तरह की बातें हो रही होंगी. उनकी एकाधिक कहानियों को छोड़ दिया जाये तो सभी कहानियों के केंद्र में स्त्री रही है. वे स्त्री के आगे बढ़ने की बात भी करती हैं, स्त्री की उम्र की बात भी करती हैं, स्त्री के सशक्त होने के निर्णय की बात भी करती हैं, स्त्री के अपने आपको जागृत होने की बात भी करती हैं मगर किसी भी रूप में स्त्री के सशक्त होने में वर्तमान जैसा अशालीन सशक्तिकरण नहीं दिखाई दिया. वास्तविक रूप में देखा जाये तो किसी भी स्त्री का सशक्त होना इसी में संदर्भित है कि वह किस तरह से अपने आपको शालीन बनाते हुए न केवल खुद को सशक्त करे वरन परिवार को भी सशक्त करे.

स्त्री के चरित्र को विस्तार देते हुए वे परिवार की संकल्पना को सहेजना नहीं भूलती हैं. वे यदि बड़की बहू को अगले दिन से अपनी स्वतंत्रता पाने का विश्वास जगाती हैं तो कहीं से भी सास-बहू जैसा टकराव नहीं दिखाती हैं. वे प्रौढ़ावस्था की दुल्हिन को अपने वृद्ध सास के प्रति मन ही मन रोष व्यक्त करता अवश्य दिखाती हैं मगर उसी सास की अनुपस्थिति में दुल्हिन खुद को किसी सूनेपन से घिरा पाती है. उम्र के एक पड़ाव पर आकर यदि सादगी को स्वीकारने वाली माँ भी है जो अंततः अपने बच्चों के निर्णय को ही सराहती दिखती है. अपने बालों को लहराने का स्वतंत्र निर्णय कर उद्दंड हवा का विरोध करना रहा हो, अपनी नई पत्रकार सहयोगी के लिए नए रूप में आती शैव्या हो, लड़कियों को प्रदर्शनी की वस्तु बनाने का विरोध कर दो-टूक कहने वाली नीरा हो, घर-परिवार के लिए स्त्री का महत्त्व समझाती प्रिया हो या फिर अपनी दकियानूसी सास को उसी की बेटी के साथ मिलकर यथार्थ से परिचय कराती निधि हो सभी नारी पात्र स्त्री-सशक्तिकरण का सशक्त परिचायक बनते हैं मगर कहीं भी जीवन-मूल्यों के साथ टकराव नहीं है, कहीं भी संस्कारो के साथ खिलवाड़ नहीं है, कहीं भी परिवार का विखंडन नहीं है.

यद्यपि वंदना जी की कहानियों में कहानी की वो नाटकीयता नहीं देखने को मिलती अक्सर कहानी लिखने वाले जिसकी वकालत करते दिखाई देते हैं तथापि उनकी कहानियाँ सादगी के साथ अपना विस्तार करती हैं, अपने नारी-चरित्रों का विकास करती हैं. उन्होंने बहुत ही सहज शब्दों में, आम बोलचाल की भाषा में, जिस तरह से एक आम व्यक्ति रोजमर्रा में जिस तरह की शब्दावली प्रयोग में लाता है, उसी का प्रयोग करके कहानियों में एक तरह का अपनापन घोला है.  इस अपनेपन में पाठक कहानियों की नाटकीयता को विस्मृत कर जाता है और खुद को कहानियों के बजाय उसके वातावरण में समाहित कर जाता है, उस वातावरण के साथ तादाम्य स्थापित कर जाता है. यही किसी भी रचना की सफलता होती है कि पाठक उसके साथ खुद को न केवल जोड़ ले बल्कि उसके वातावरण को महसूस भी करने लगे. उनकी कहानियों को पढ़ते हुए शब्द-शब्द आगे बढ़ते जाने पर उसकी सहजता से ऐसा लगता है जैसे कि ये सब कहीं न कहीं हम लोग अपने आसपास देख रहे हैं.

वर्तमान में जिस तरह से कहानियों में तरह-तरह के प्रयोग किये जा रहे हैं, उनमें जबरन नाटकीयता, मनोवैज्ञानिकता, आधुनिकता का समावेश किया जा रहा है वो वंदना जी की कहानियों में देखने को नहीं मिलता है. इसके अलावा शाब्दिक क्लिष्टता, शब्दों, वाक्यों को जबरिया ओढ़ाई गई आलंकारिकता भी यहाँ देखने को नहीं मिलती. लेखिका ने अपनी सादगी की तरह ही अपनी कहानियों को, अपने पात्रों को सादगी प्रदान की है. सादगी के आँचल में लिपटी बातों वाली गली में विचरण करने के बाद जब पाठक खुद को दूसरे मुहाने पर खड़ा पाता है, तब उसकी तन्द्रा टूटती है कि अरे! वो गली से बाहर आ गया. यद्यपि एकधिक जगह पर मुद्रण त्रुटि देखने को मिली, जो कहानियों की यात्रा में कहीं-कहीं अवरोधक अवश्य बनती है तथापि कहानी संग्रह वाकई संग्रह के योग्य है.

बचपन में जबकि खेल-खिलौनों से खेलने के दिन होते हैं तब लेखिका कहानियों से, कलम से, कागज से खेल रही थी तो ज़ाहिर है कि उनकी वैचारिकता से साहित्य की अनेक विधाओं को बहुत कुछ मिलना है. यह तब और भी प्रामाणिक सिद्ध होता है जबकि पहला संग्रह उन्होंने लिखना सिखाने वाले अपने पापा को समर्पित किया है. निश्चित ही वंदना जी कलम और वैचारिकता को विस्तार देते हुए गली से बाहर नगर, देश, परदेश तक अपने पाठकों को ले जाएँगी.

समीक्षक : डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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कृति : बातों वाली गली (कहानी संग्रह)
लेखिका : वन्दना अवस्थी दुबे
प्रकाशक : रुझान पब्लिकेशन्सजयपुर
संस्करण : प्रथम, 2017
ISBN : 9788193322734
मूल्य : 150 रुपये मात्र

10 टिप्‍पणियां:

  1. जिजिया, आपका स्नेह है ये हमारे प्रति.
    आभार

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    1. छोटे भाई बहन हमेशा स्नेह के ही हकदार होते हैं कुमारेन्द्र :)

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (03-10-2017) को "ब्लॉग की खातिर" (चर्चा अंक 2746) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, भूत, वर्तमान और भविष्य “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  4. उत्सुकता जगाती प्रेरक ,बेबाक समीक्षा।

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  5. इतना प्यारा विवेचन.... कि मन पढ़ने को आतुर हो गया

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