रविवार, 17 जनवरी 2016

याद-ए-मकर संक्रान्ति

सर्दिया शुरु होते ही मेरे ज़ेहन में जो त्यौहार ज़ोर मारने लगता है वो है मकर संक्रान्ति. सर्दियों में आने वाला एकमात्र ऐसा बड़ा त्योहार
जिस पर हमारे घर में बड़े सबेरे नहा लेने की बाध्यता होती थी. इधर जनवरी शुरु हुई, उधर हमारे घर में सन्क्रान्ति की तैयारियां शुरु . कम से कम पांच प्रकार के लड्डुओं
 की तैयारी करनी होती थी मम्मी को. ज्वार, बाजरा, मक्का और उड़द की दाल की पूड़ियां, मूंग दाल की मंगौड़ियां, और कई तरह के नमकीन. अब सोचिये, इतना सब करने में समय लगेगा न? वो समय पैकेट बन्द तैयार आटा मिलने का नहीं था. अब तो बाज़ार जाओ और ज्वार/बाजरा/मक्का जो चाहिये, उसी का आटा एकदम तैयार, पैकेट में सील-पैक घर ले आओ.  हमारे बचपन में ये सारे आटे अनाज की शक्ल में मिलते थे, जिनसे चक्की पर जा के आटा बनवाना पड़ता था.
हमारे घर लड्डू बनाने की शुरुआत मम्मी संक्रान्ति के दो दिन पहले कर देती थीं. आटे के लड्डू, लाई के लड्डू, तिल के दो तरह के लड्डू, नारियल के लड्डू और मूंगफ़ली के लड्डू. संक्रान्ति की सुबह सारे बच्चों को रोज़ की अपेक्षा जल्दी जगा दिया जाता. सर्दियों में सुबह छह बजे उठना मायने रखता है. उठते ही सबको दूध मिलता और बारी-बारी से नहा लेने का आदेश पारित होता. आंगन में एक कटोरे में पिसी हुई तिल का उबटन रक्खा होता, जिसे पूरे शरीर पर लगा के नहाने की ताक़ीद होती. बहुत सारे लोग तो इस दिन शहर के पास बहने वाली नदी में डुबकी लगाने जाते, और इसीलिये बुन्देलखण्ड में मकर संक्रान्ति का एक और नाम “बुड़की” भी प्रचलित है. तो इतनी सुबह नहाना, वो भी ठंडे पानी से!!! नहाने में आनाकानी करने वाले को कहा जाता कि- “यदि तुमने नहीं नहाया तो तुम लंका की गधी/गधा बनोगी अगले जन्म में. “ तब तो मैं छोटी थी, सो इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया कि आखिर लंका की गधी/गधा ही क्यों बनेगा कोई? लेकिन अब जरूर ये सवाल ज़ेहन में आता है तो पता करने की कोशिश भी करती हूं. लेकिन अब तक कोई सटीक जवाब नहीं मिल सका, जबकि मकर संक्रान्ति के दिन न नहाने वाले को यही कह कर डराने का चलन आज भी है.

तो भाई, सारे बच्चे नहा-धो के तैयार हो जाते. जो बच्चा नहा के निकलता, मम्मी उसके हाथ-पैरों में सरसों के तेल की हल्की मालिश करतीं, अच्छे कपड़े पहनातीं और कमरे में जल रही  गोरसी (  सर्दियों में आग जलाने के लिये इस्तेमाल किया जाने वाला मिट्टी का चौड़ा पात्र,  जिसमें हवन भी किया जाता है) के सामने बिठाती जातीं. जब सबने नहा लिया तो हम सब पूजाघर में इकट्ठे होते. यहां भगवान पर फूल चढाते, पहले से जल रहे छोटे से हवन कुंड में तिल-गुड़ के मिक्स्चर से हवन करते और वहीं बड़े से भगौने में रखी कच्ची खिचड़ी ( दाल-चावल का मिश्रण) पांच-पांच मुट्ठी भर, थाली में निकाल देते. काले तिल के लड्डू भी पांच-पांच की संख्या में ही निकालते. ये अनाज और लड्डू, गरीबों को दिया जाने वाला था.
इसके बाद हम सब फिर गोरसी को घेर के बैठ जाते और फिर शुरु होती पेट-पूजा. मम्मी सुबह हरे पत्तों वाली प्याज़ की मुंगौड़ियां  बनातीं और थाली में भर के बीच में रख देतीं. हम सब बच्चे मिल के उस पर हाथ साफ़ करते जाते. उड़द/ज्वार और मक्के की पूड़ियां भी सुबह ही बनतीं. दोपहर के खाने में केवल खिचड़ी बनती. ये खिचड़ी भी नये चावल से बनाई जाती. खिचड़ी खाने के विधान के चलते ही इस त्यौहार का नाम “खिचड़ी” भी है बुन्देलखंड में.  शाम को फिर मूंग की मुंगौड़ी, पूड़ियां, तरह-तरह के लड्डू और शक्कर के घोड़े/हाथी, जो बाज़ार से खरीदे जाते. गन्ने भी पूरे बाज़ार में बेचने के लिये लाये जाते. तो ये है बुन्देलख्न्ड की मकर संक्रान्ति… कृषि-प्रधान देश का कृषि आधारित साल का पहला त्यौहार.  देश के तमाम हिस्सों में इस दिन पतंगबाज़ी का भी रिवाज़ है. खासतौर से गुजरात और राजस्थान में.
ये एकमात्र ऐसा त्यौहार है जिसे अलग-अलग प्रदेशों में, अलग-अलग  नामों से जाना जाता है. मकर संक्रान्ति, पंजाब और हरियाणा में “लोहिड़ी”  के नाम से मनाई जाती है तो असम में यही “बिहू” हो जाती है. वहीं दक्षिण भारत में इसे “पोंगल” के नाम से मनाते हैं. दक्षिण में यह त्यौहार चार दिन तक मनाया जाता है. तिल-चावल और दाल की खिचड़ी

के अलावा यहां “पायसम” जो कि नये चावल और दूध से बनी विशेष प्रकार की खीर को कहा जाता है, भी बनाते हैं.
मकर संक्रान्ति के दिन भगवान भास्कर अपने पुत्र शनिदेव से स्वयं मिलने आते हैं. चूंकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, इसलिये इस त्यौहार को “मकर संक्रान्ति” के नाम से जाना गया. महाभारत में भीष्म पितामह ने शरीर त्यागने के लिये, मकर संक्रान्ति का दिन ही चुना था. तो तमाम पौराणिक/भौगोलिक/ और पर्यावरणीय महत्व वाले इस त्यौहार को आइये मनाते हैं पूरे रीति-रिवाज़ के साथ, क्योंकि इस की हर रीति में छुपा है आयुर्वेद का कोई न कोई राज़… आप सबको मकर संक्रान्ति की अनन्त शुभकामनाएं.


18 टिप्‍पणियां:

  1. दीदी! बहुत सारी बचपन की यादें ताज़ा हो गईं. मेरी ड्यूटी होती थी, धान को पानी में रात भर भिगोने के बाद दूसरी दिन रात भर मिल में चिवड़ा कुटवाने के लिये बैठे रहना और ठेले पर लेकर आना. फिर अम्मा उसको फ़टकती थीं और सारे मुहल्ले में बँटता था. गाण्व से गन्ने का रस, गुड़ और साबुत गन्ना आता था. एक ख़ुश्बूदार और ख़ुशनुमा त्यौहार होता था. अब तो सब बिसर गया...!
    एक कविता लिखी थी मैंने, बस वही बाकी रह गयी है!
    बहुत अच्छा लगा यादें साझा करके!!

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    1. गन्ने के रस और उससे बनने वाली खीर का ज़िक्र करना तो हम भूल ही गए....

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  2. वाह सजीव वर्णन वाकई परंपराओं के मायने बुंदेलखण्ड में जीवंत हैं,कल भी आज भी...जय हो.

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  3. पढ़ लिया और बचपन में घूम आये । हम लोगों के यहाँ तो सब कुछ एक सा होता था , बुन्देलखण्डी जो हैं ।

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  4. पढ़ लिया और बचपन में घूम आये । हम लोगों के यहाँ तो सब कुछ एक सा होता था , बुन्देलखण्डी जो हैं ।

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  5. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "मौत का व्यवसायीकरण - ब्लॉग बुलेटिन" , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  6. बचपन बड़ा प्यारा होता है, हर त्योहार में याद आता है। सुन्दर और स्वादिष्ट चित्र।

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    1. बहुत दिनों के बाद आये हैं प्रवीण जी, याद रखियेगा.

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  7. बहुत ही मीठा मीठा संस्मरण ,तिल गुड सा .बचपन की कई सारी यादें जुडी हुई हैं ,सुबह सुबह गर्म पानी से नहाकर सबसे पहले काले तिल के लड्डू खाना .तब सफ़ेद तिल का रिवाज नहीं था .हमारे महल्ले के सारे बच्चे एक दूसरे के यहाँ खाने जाते .पेट इतना भर जाता कि अपने घर में ही नहीं खाते .
    मुम्बई में मराठी लोग हल्दी कुमकुम मनाते हैं .उस दिन औरतें एक दूसरे को अपने घर बुला, माथे पर हल्दी कुमकुम लगा, तिल के लड्डू,पान सुपारी, चावल देती हैं और कहती हैं ,"तिल गुड घ्या गोड गोड बोला "यानि तिल गुड खाओ मीठा मीठा बोलो .कई बिल्डिंग में इसका सामूहिक आयोजन भी होता है .

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    1. हम तो एक हफ्ते बाद ही आ गए थे .तुमने ही एक महीने बाद देखा :)

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  8. बचपन से जुडी यादों का खजान खुलवा दिया आपने ... मुंह में पनी आने लगता है चित्र देख के ... और पढके ...

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