गुरुवार, 16 सितंबर 2010

राज कर रही है तीन बेटों की मां...

कुछ दिन हुए, अपने मेहमानों को छोड़ने स्टेशन गई थी। तभी वहाँ मैंने देखा कि एक जर्जर बुढ़िया किसी प्रकार अपने पैर घसीटती संकोच सहित भीख मांग रही है। हालाँकि इसमें नया कुछ भी नहीं है। सैकड़ों बुजुर्ग महिलायें इस प्रकार भीख मांग रहीं हैं। लेकिन मेरे लिए नई बात ये थी कि ये वही बूढी अम्मा थी जिसने कई सालों तक हमें हमारे ऑफिस में चाय पिलाई थी।
पहले तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ, कि ये अम्मां है, लेकिन जैसे ही मैने उसे आवाज़ दी, अम्मां मुझसे लिपट के रोने लगी. इस वाकये से पहले मुझे ये नहीं मालूम था कि उसके बेटों ने उसे भिखारी बना दिया है.
जाति से कुलीन ब्राह्मणी इस अम्मा के तीन बेटे हैं। तीनों अच्छा-भला कमा रहे हैं। थोडी बहुत ज़मीन भी है। बूढी अम्मा के पति की मृत्यु बहुत पहले हो गई थी , सो अम्मा ने ही चाय की दुकान के ज़रिये अपने पाँच बच्चों का भरण-पोषण किया। उन्हें पढाया-लिखाया भी। बड़ा लड़का सरकारी नौकरी में है, बीच वाला किसी फैक्ट्री में है और तीसरा प्रैस में काम करता है। अम्मा तीसरे के पास ही रहती थी, क्योंकि दो बड़े पहले ही उसे निष्कासित कर चुके थे। लेकिन अब इस तीसरे ने भी उसे घर से निकाल दिया था। जबकि अम्मा घर का पूरा काम करती थी । उम्र अधिक हो जाने के कारण दुकान ज़रूर नहीं चला पाती थी। घर का काम भी अब उतनी फुर्ती से नहीं कर पाती थी। लिहाज़ा उसे घर में रखने योग्य नहीं समझा गया.
पिछले एक हफ़्ते से अम्मां मेरे पास रह रही है, और इस बीच उसके एक भी सपूत ने ,उसकी खोज खबर लेने की कोशिश नहीं की. इस बार घर से बाहर करने के पीछे बहू की वो साड़ी थी, जिसे अम्मां ने थोड़ी देर के लिये पहन लिया था.
न मेरी समझ में ऐसी बहुएं आती हैं और न ही बेटे. ये बहुएं क्या अपनी मां के साथ ऐसा ही व्यवहार करती होंगीं? और बेटे???? कैसे ८५ साल की बूढी, जर्जर मां को घसीट के घर से बाहर किया होगा? कैसे अपनी मां को भीख मांगते देख पाते होंगे? देखते तो ज़रूर होंगे, क्योंकि उसी शहर में रहते हैं.
अम्मा मुझे अपनी बेटी की तरह प्यार करती हैं। वे जब भी मुसीबत में होती हैं, तो मेरे पास आ जाती हैं. कुछ दिन रहती हैं, फिर लड़कों का मोह उन्हें सताने लगता है. जो लड़के उन्हें हर घड़ी दुत्कारते रहते हैं, उन्हीं के बच्चों को याद करके रोने लगती है. परिवार का, ऐसे परिवार का जिसमें उनके लिये कोई जगह ही नहीं है, मोह उन्हें आज भी छोड़ता नहीं।
तीन बेटों की माँ यदि भीख माँगने पर मजबूर हो तो बेहतर है, कि ऐसे बेटे पैदा ही न हों।
सोचने पर मजबूर हूँ, कि तमाम बेटों के कारनामे पढ़ने-देखने- भोगने के बाद भी लोग बेटों की पैदाइश ही क्यों चाहते है?

47 टिप्‍पणियां:

  1. ऐसा भी होता है.बहुत दुःख हुआ पढ़ कर..

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  2. समझ नहीं आ रहा कि क्या लिखूं ?..बहुत दुःख होता है जब ऐसा देखने सुनने को मिलता है ..शायद लोंग भूल जाते हैं कि बुढापा उनको भी आना है ...

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  3. जिंदगी के कडुवे सच से रूबरू करवाया है आपने....
    ना जाने ऐसा क्यों होता है ....

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  4. आज की दुनिया की यही सच्चाई है ......एक माँ ३ बेटो को पाल लेती है पर ३ बेटे मिल कर भी एक माँ को नहीं पाल पाते !

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  5. मेरी मां के संग भी कुछ ऎसा ही हुआ है, मै यहां से जितने पेसे मां को भेजता, वो सब पैसे मां छोटे को दे देती, ओर उस की बीबी ओर वो मिल कर मां को नर्क समान जिन्दगी देते थे, मै जब भी पुछता तो मां झूठ बोल देती कि मै तो बहुत खुश हू, ओर यह सब बाते मुझे मां के मरने के बाद पता चली, मेरे हिस्से मै जो मकान आया है मै चहाता हुं वहां ऎसे बुजुर्ग लोगो को रखू, जो अपनो के दुतकारे हुये है, लेकिन अभी नीचे भाई ओर उस की बीबी रहते है जो किसी कॊ टिकने नही देगे, अगर आप इस मां के लिये कोई मदद चाहे तो मुझे बेझिझक लिख दे, मै दुर बेठा सिर्फ़ पैसो की मदद ही कर सकता हुं....या सब ब्लागरं मिल कर कुछ ऎसा काम करे जिस से हम सब ऎसे बुजुर्गो को कोई टिकाना दे पाये, जहां से इज्जत से रह पाये

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  6. बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

    आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

    आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

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  7. वन्‍दना पहले तो तुम्‍हें आशीष, की तुमने इतना अच्‍छा काम किया। तुम्‍हार प्रश्‍न कि लोग बेटों की पैदाइश ही क्‍यों चा‍हते हैं? मुझे लगता है कि हमारे अन्‍दर बुढापें के लिए जो असुरक्षा का भाव है उसी कारण हम सब सोचते हैं कि बेटा हो तो हमें बुढापे में सहारा रहेगा लेकिन समाज में ऐसे नालायक बेटों की संख्‍या बढती ही जा रही है जो अपने माता-पिता को ऐसे नरक देते हैं। इसलिए लोग अब बेटियों की इच्‍छा करने लगे हैं क्‍योंकि अब बेटियां माता-पिता का सहारा बनी हुई हैं। एक मजेदार बात और है कि बेटा माता-पिता को नहीं रखना चाहता लेकिन दामाद रखता है। पता नहीं कैसी मानसिकता है मनुष्‍य की? महिला बहु के रूप में अलग और बेटी के रूप में अलग ऐसे ह‍ी पुरुष बेटे के रूप में अलग और दामाद के रूप में अलग।

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  8. बहुत दुखद लेकिन कटु सत्य है. उपभोगतावाद की दौड़ में लोग रिश्ते की एहमियत भूल गए हैं. भूल जाते हैं, कि जो आज कुछ करने लायक नहीं है, उन्होंने ही उन्हें प्यार, मुहब्बत, सरंक्षण और हर ख़ुशी दी थी, जब वह कुछ करने लायक नहीं थे. और कुछ करने लायक भी तो उन्होंने ही बनाया था..... बेहद अफ़सोस की बात है.

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  9. आजकल ऐसे लोग हर जगह देखे जाते हैं बस कमोवेश और वो भी बहु-बेटोंके सताये। हमारे पडोस मे एक परिवार हैुनकी माता जी दो माह के लिये अपने बेटे के पास आयी थी तो एक दिन उसने बातों बातों ने बताया कि उसके सात बेटे हैं सभी बहुत अच्छा कमाते खाते हैं मगर उन्हें हर बेटा केवल दो महीने के लिये अपमे पास रखता है। वो केवल बेतों के यहाँ अनचाही महमान की तरह रहती हैं। लेकिन औरत के मन से फिर भी बेटों के प्रति मोह नही छूटता। । दुखद स्थिती है मगर मुझे लगता है इसके पीछे कहीं न कहीं औरतें भी अधिक जिम्मेदार हैं। शन्यवाद।

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  10. वंदना जी ,
    आपकी इस पोस्ट को पड़ने के बाद आज आपके लिए दिल में बहुत श्रद्धा और आदर उभर आया .....जहाँ ३ -३ सगे बेटे अपनी माँ को भिखारिन देख कर शर्मसार नहीं हो रहे , उनका ज़मीर उन्हें कोस नहीं रहा , वही दूसरी और आपने इंसानियत और दया और सद्भावना का परिचय देते हुए ये काम किया . आप बधाई की पात्र है . ऐसे नालायक बेटों से तो बेटे ना होना ही अच्छा है इसीलिए अब लोग समझ रहे है की लड़कियाँ ही अच्छी होती है .

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  11. वंदना आज ये कटु सत्य बन चुका है, मैं सोचती हूँ कि ऐसी बहुओं कि माँ जब घर से दुत्कार कर निकाली जाय तो वो क्या करेंगी ? वो उन्हें अपने घर में प्यार से रख लेंगी. आज के समय में मैं अपनी १०० साल कि सास के भाग्य को सराहती हूँ,वो पिच्छे दो साल से बिल्कुल बिस्तर पर हैं दिखाई नहीं देता और सुनाई भी नहीं देता बस चिल्ला सकती हैं सो वह सारे दिन लड़के और बहुओं को बुलाया करती हैं. इसमें वंदना अतिश्योकी बिल्कुल भी नहीं है. मेरे जेठ जी ६३ साल के रिटायर्ड हैं और मेरे पति देव उनसे ७ साल छोटे. माँ की इच्छा थी कि मेरे बेटे साथ ही रहें. आज कितने ही मतभेदों के बाद उनकी इच्छा बनाये रखे हैं और दोनों बेटे मिल उनके नहलाने धुलाने से लेकर सारे काम, बहुएँ उनके खाने पीने की व्यवस्था और उनका जीवन एकदम ठाठ के साथ गुजार रहा है. मुझे लगता है की आज भी अगर श्रवण कुमार jeevit हैंउनके बेटी कोई नहीं है. .

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  12. वंदना गर्व हो आया तुम पर....अम्मा की दुआएं, तुम्हारी ज़िन्दगी में कभी कोई मुश्किल नहीं आने देंगी.
    ऐसे बेटों के लिया क्या कहा जाए...सिर्फ यही कि उनके बच्चे भी अपनी दादी के प्रति किया ये व्यवहार देख रहें होंगे...और ये बेटे भी कभी बूढे होंगे...तब उनके बच्चे उनके साथ कैसा व्यवहार करेंगे,इसका इलहाम नहीं है.
    मन बहुत दुखी हो गया पढ़कर और कई अम्माओं का ध्यान आया जिन्हें सुना है लोग कुम्भ के मेले में छोड़ आते हैं या मथुरा में छोड़ आते हैं जिसने रातें जागकर ..आधा पेट खाकर उन्हें पाला होता है.

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  13. जैसा बो रहे हैं वैसा ही काटेंगे वो नालायक..

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  14. संवेदनाएं किस तरह दम तोड़ रही हैं, इस पोस्ट से साफ़ हो जाता है...
    एक शायर ने कहा है-
    की थी जिनकी परवरिश गैरों के बरतन मांझकर
    एक बूढ़ी मां उन्हीं बेटों को भारी हो गई...
    वंदना जी,
    आप उन संस्कारों का प्रतिनिधित्व कर रही हैं, जिनमें बड़े बुज़ुर्गों के प्रति आदर और सम्मान का भाव होता है...
    ऐसे विचारों को बढ़ाए जाने की आवश्यकता है.

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  15. yahin jindagi ka sach hai.........lekin sach ye bhi hai ki khushi lene wale ke saath kuchh khushi dene wale bhi awtarit ho hi jate hain........:)

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  16. मां तेरी अज़ब कहानी,
    मुंह में दुआएं, आंखो में पानी।

    वे जन्म जन्म दिवालिया है, जो मातृ ॠण से मुक्त न होंगे।

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  17. दुखद बात है, इसके लिए समाज का सही और पुन: निर्माण ज़रूरी है.


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  18. यह पोस्ट तो पहले भी पढ़ चुका हूँ!
    --
    इस बार पढ़कर पहले से अधिक अच्छा लगा!

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  19. बहुत सारे सवाल उठाती पोस्ट!

    अम्माजी के बेटे कैसे हैं, बहुयें कैसी हैं और किन हालातों में ऐसा किया उन्होंने यह सब लगातार सोच का विषय है।

    जो स्त्री घर-परिवार का पालन-पोषण करे फ़िर बच्चों के समर्थ हो जाने पर उसको अपने जीवन यापन के लिये भीख मांगना पड़े यह बड़े दुख का विषय है।

    बहू न जाने किस असुरक्षित परिवेश में रही होगी जिसने साड़ी पहन लिये जाने पर अपनी सास को निकाल बाहर किया।

    अम्माजी का अपने बच्चों के प्रति मोह सहज है। भले-बुरे जैसे भी हैं उनको अपने बच्चों से लगाव होगा। बहुत जटिल और निष्टुर समय से गुजर रहे हैं हम लोग।

    आपके जिस आफिस में अम्माजी चाय पिलातीं थीं उसके कुछ संस्मरण लिखिये।

    अंत में आपकी और आपके घरवालों की प्रशंसा करता हूं जो अम्माजी को अपने साथ रख सके।

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  20. ऐसे कुपुत्रों का एक ही दण्ड है, सार्वजनिक जीवन से निष्कासन।

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  21. बहु के कहने पर माँ का कलेजा काट कर ले जाने वाले बेटे के ठोकर लगने पर भी कलेजे यही पुकार आती है कि चोट तो नहीं लगी बेटा!!

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  22. मां के लिए तो बेटे फिर भी उसकी औलाद ही हैं । लेकिन बेटों को अब ममता की ज़रुरत महसूस नहीं होती । यही कलियुग है ।

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  23. अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी
    आँचल में है दूध और आँखों में पानी.
    वंदना जी बस हमरा करेजा जानता है कि हम कइसा महसूस कर रहे हैं..

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  24. वंदनाजी
    आज की पोस्ट ने तो आंखे ही नम कर दी आपको ईश्वर सदा खुशिया दे आपने एक माँ की आत्मा को सुख दिया है |
    आज हर तीसरे घर में इसी तरह की घटना हो रही है जीको लोकलाज नहीं है वे घर से निकल देते है और जो लोकलाज का दिखावा करते है वो अपने माता पिता के साथ दोगला व्यवहार करते है |

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  25. is se padkar kuch likhne ki halat mein nahi reh gaya hoon.....
    ----------------------------------
    मेरे ब्लॉग पर इस मौसम में भी पतझड़ ..
    जरूर आएँ...

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  26. अंदर तक द्रवित कर गयी आपकी पोस्ट .... संवेदनहीन होते ज रहे हैं सब .... जिस औलाद को पाल पॉस कर इस लाएक बनाया की वो अपने काबिल हो जाएँ अगर वो ही ऐसा करें तो शरम की बात है .... डूब मारना चाहिए ऐसे बच्चों को .... ऐसे लोगों का भी हश्र ऐसा ही होगा ... उनके बच्चे भी उन्ही से सीख रहे हैं ....

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  27. प्रिय वंदना,

    अभी मैं दिल्ली में commonwealth गेम्स के लिए हूँ. शायद समय मिले ब्लॉग से गुजरने का. आशा है तुम्हारा रचनाकर्म इतनी ही उजास बिखेरता रहेगा.

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  28. दिल छलनी हो गया पढ़कर, पता नहीं हमारे यहाँ की माँऐं कब ऐसे नालायक बेटों के साथ नालायक बर्ताव करना शुरु करेंगी, आखिर माँ तो माँ होती है, ऐसे बहुत से वाक्ये होते हैं, परंतु आप निश्चित ही साधुवाद की हकदार हैं, नमन है आपको।

    ऐसा ही एक वाक्या मेरे एक परिचित के यहाँ भी था और उनकी माता जी मुझे बहुत मानती थीं तो उनको कानून बताकर उनके बेटों से उनका पैसा और मकान बचा लिया तो अब वे नालायक बेटे सुनते तो नहीं परंतु कम से कम उस माँ को भीख तो नहीं मांगनी होगी, पर फ़िर भी माँ तो माँ है और उन नालायकों को वैसा ही प्यार करती है और छलनी होकर रोती रहती है।

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  29. तीन बेटों की माँ यदि भीख माँगने पर मजबूर हो तो बेहतर है, कि ऐसे बेटे पैदा ही न हों।
    सोचने पर मजबूर हूँ, कि तमाम बेटों के कारनामे पढ़ने-देखने- भोगने के बाद भी लोग बेटों की पैदाइश ही क्यों चाहते है?
    दुःख होता है कडुवे सच से बहुत दुखद लेकिन कटु सत्य है.

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  30. "जो वालेदैन ने अब तक तुम्हें सिखाया है
    अमल करो न करो शर्मसार मत करना"

    लेकिन अम्मां के बच्चों ने तो पूरी इंसानियत को ही शर्मसार कर दिया,तुम ने एक जगह लिखा है कि
    "सो अम्मा ने ही चाय की दुकान के ज़रिये अपने पाँच बच्चों का भरण-पोषण किया"
    बाक़ी दोनो लड़्कियां हैं क्या?अगर ऐसा है तो लड़्कियां क्या कर रही हैं?
    इस बात से मेरा ये मतलब कदापि नहीं कि बेटों की ज़िम्मेदारी ख़त्म हो गई ,लेकिन अगर उन्हें ये एहसास होता तो मां इस हालत को पहुंचती ही नहीं
    मां जैसी नि:स्वार्थ भावना तो किसी भी रिश्ते में मिलना मुश्किल है ,बद नसीब हैं वो औलादें जो उस का तिरस्कार कर रही हैं और सेवा करने का पुण्य गंवा रही हैं .

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  31. पाता नहीं ये पोस्ट कैसे मेरी नजर से चूक गई भला हो अनूप शुक्ल जी का उनकी चर्चा से यहाँ तक पहुंची.
    इसे बेटे बहु तो मेरी समझ में भी नहीं आते .कितना दुखद है .पर भगवन की लाठी में भी आवाज़ नहीं होती ,बुढ़ापा उन्हें भी आएगा.
    हट्स ऑफ टू यु .आपने संबल दिया बृद्ध को आप जैसे लोगों को देखकर ही लगता है कि इंसानियत अभी जिन्दा है वर्ना इन बृद्धा के बेटे बहुओं जैसे लोगों से दुनिया भरी पड़ी है.

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  32. वंदना मैंने पहले भी अपने लेखों में लिख चुका हूँ, आज के दौर में रिश्ते ज़रुरत पे टिकते हैं. जब तक मां की ज़रुरत थी, साथ रहे , अब पत्नी की ज़रुरत है, तो वोह साथ है. ऐसा मर्द जो मां को निकाल सकता है, किसी दिन पत्नी को भी निकलेगा और एक दिन उस बहु का बेटा उसको भी. मैंने भी ऐसी ओलाद देखी है , मन दुखी हो उठता है, इंसानियत है इस समाज में, यकीन नहीं होता.
    मुंबई में ऐसे बूढ़े बहुत हैं,

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  33. आपकी टिपण्णी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया! मैं अगली बार आपके लिए ख़ास शाकाहारी खाना पोस्ट करुँगी!
    बहुत सुन्दरता से आपने सच्चाई को शब्दों में पिरोया है! उम्दा प्रस्तुती!

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  34. नारी ही नारी की सबसे बड़ी शत्रु है। शायद इसी का खामियाजा अम्मा को और अम्मा के जैसी कई स्त्रियों को भुगतना पड रहा है। धिक्कार है ऐसे बेटों पर जो अपनी मां को भीख मांगने के लिए छोड देते हैं। फिर भी मां ते मां ही होती है। इतना सब कुछ होते हुए भी आप अम्मा के सामने उनके बेटों के लिए कुछ भी भला-बुरा नहीं कह सकतीं। 'मां' दुनिया का सबसे बड ा और महान पद

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  35. kuchh jindgiya hadso ko jnm de deti hai our ye hadse khi na khi to jwabdehi ke liye pesh honge hi .tbhi unke krmo ka fl milega .

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  36. इस पोस्ट को पढ़कर मुझे अपनी एक कविता की पंक्तियाँ याद आ गईं जिसे मैने वृद्धाश्रम से लौटकर लिखा था...

    धूप से बचे
    छाँव में जले
    कहीं ज़मी नहीं
    पाँव के तले
    नई हवा में
    जोर इतना था
    निवाले उड़ गए
    थाली के ।
    .........

    पूरी कविता यहाँ है..
    ..http://devendra-bechainaatma.blogspot.com/2009/11/blog-post_15.htm
    ..एक और सच से रूबरू कराती इस पोस्ट से मन भारी हो गया।

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  37. ऎसे मामलों में मै समझ नही पाती की क्या लिखूँ आजकल के हालात लिखूँ या माता-पिता की परवरिश को ही कोसूँ। लेकिन दुख से अधिक मुझे क्रोध ज्यादा आता है ऎसा देख कर।

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  38. वन्दना जी ! इस भरी दुनिया में आप ही उनकी सगी है ! रही बात बेटे की कामना की तो वह तो गुलाम मानसिकता की देन है ! जब बहने जान जाएँगी तो छूट जायेगा ! जागरूक कार्य और पोस्ट के लिए बधाई !

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  39. आज पढ़ी यह पोस्ट बहुत दुखद पूर्ण है ..पर आज का सच यही है ...आपने वाकई अच्छा काम किया है ..इस तरह के सच आने वाले वक़्त का आइना है और बहुत डराते हैं

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  40. "मैं और मेरा परिवार" के यह जीते जागते नमूने हैं .. फिर भी लोग कहते हैं शादी-ब्याह, घर-परिवार, धरम-कर्म ..आखिर इन बेटों का क्या कसूर है यदि इस माँ ने ऐसे ही पाला है उन्हें.. ऐसा ही व्यवहार करने के संस्कार दिए हैं? ..यही तो मिलेगा न उसे! .. इस माँ का भी क्या कसूर .. एक आदमी से बाँध दी गई थी बेचारी और वह चला गया! ..समाज पर तो कोई जिम्मेदारी है नहीं .. हर किसी का अपना अपना घर-परिवार है कोई क्यों दे दखल एक दुसरे में ? शादी-ब्याह, घर-परिवार, अब यह कोई सभ्य सामाजिक व्यवस्था नहीं रही ..जिसे हम ढो रहे हैं .. इससे मिलने वाले सुख ; सुख नहीं सिर्फ छायाएं हैं ..देर स्वर विकल्प तो तलाशना ही पडेगा .. क्योंकि परिवारवाद से उपजी अनेक समस्याएं हर क्षेत्र में सुरसा की तरह मुह बाये चली आ रही हैं

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  41. दूध में तो कोई नहीं धुला। सो पहला पत्थर कौन मारे। हम तो अब भी अपने मां-पिता पर टिके हैं। इसका एक ही इलाज है। आर्थिक रुप से कमांड मां-बाप अपने पास ही रखें या अपनी दशा को ठीक रखें।

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  42. इस तरह के so called बेटों की निन्दा करते हुए हमें अनेकों लोग मिल जायेंगे....ढेरों सच्ची घटनाओ पर आधारित किस्से-कहानी भीपढने को मिल जायेंगीं...परहममें से ज्यादातर लोग सडक पर इस हालत में पडे हुए बुजुर्गों की मदद करना तो दूर ,एक रुपया देने से भी कतराते हें...आपने सिर्फ़ लिखा हि नहीं,कर दिखाया है so nice of you..you are great

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  43. आजकल हर रिश्ता जरूरत पर टिका होता है...हम नहीं मानते..


    जिन अम्मा जी को वंदना मैडम घर लेकर आई हैं...उनसे भला वंदना जी की क्या जरूरत पूरी हुई होगी...? और जो अम्माँ का मन इतना दुत्कारे जाने के बाद भी बेटों में ही पडा है...वो और किस चीज की उम्मीद किये बैठी होगीं उन से..?


    (कैसे अपनी मां को भीख मांगते देख पाते होंगे? देखते तो ज़रूर होंगे, क्योंकि उसी शहर में रहते हैं )

    रास्ता काट के निकल जाते होंगे हरामजादे...

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  44. आपका बहुत बहुत शुक्रिया वंदना जी..

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  45. हमारे समाज के एक कटु सत्य को उज़ागर किया है आपने । जिसने जन्म दिया उसी को सड़क पर भीख माँगने के लिए छोड़ दिया जाता है ...क्या एक माँ उन पर इतनी भारी हो गई ।

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