रविवार, 11 जुलाई 2010

चिट्ठी न कोई संदेश.....

पूरी छुट्टियां निकल गईं, और उस अलमारी की सफाई नहीं कर पाई, जो साल भर से मेरा मुंह जोह रही थी, आज बिना किसी प्लान के उसे साफ़ करने बैठ गई. एक बड़ा सा लिफाफा दिखाई दिया, पिछले कई सालों से इस लिफ़ाफ़े को बिना देखे ही पोंछ-पांछ के रख देती थी, आज खोल लिया....... तमाम अंतर्देशीय, पोस्ट कार्ड, और लिफ़ाफ़े सामने बिखर गए..... और इन सारी चिट्ठियों के पीछे हमारे पोस्टमैन चाचा का चेहरा उभर कर दिखाई देने लगा.......
लगा कितने दिन हो गए किसी की चिट्ठी आये हुए.....
कितनी बार रोका है खुद को पुराने किस्से लिखने से, लेकिन क्या करुँ, पिछले बीस सालों में समय
कुछ ऐसे बदला हैं, कुछ आदतें इस क़दर ख़त्म हुईं हैं, कि लिखने कुछ और बैठती हूँ, लिख कुछ और ही जाता है... आज भी नए टीवी शो " बिग-मनी" पर लिखने का मन बनाया था, लेकिन बीच में ये चिट्ठियाँ आ गईं....... मन फिर वही नौगाँव की गलियों में भटकने लगा....
वो समय पोस्ट-ऑफिस के स्वर्ण युग की तरह था. चिट्ठी, तार, टेलीफोन, पार्सल, रजिस्ट्री, मनी ऑर्डर..... सारे काम पोस्ट ऑफिस से, पोस्ट मैन कितने महत्वपूर्ण होते थे तब. घरों में फोन लगवाने का चलन नहीं था . टेलीफोन तब केवल ऑफिसों में, बड़े सरकारी अधिकारियों के घरों में होते थे. सार्वजनिक रूप से टेलीफोन की सुविधा केवल पोस्ट ऑफिस में ही मिलती थी. लोग भी जब बहुत ज़रूरी हो, तभी फोन लगाने जाते थे. बाहर कहीं फोन लगाना है, तो ट्रंक-कॉल बुक होती थी. लाइन मिलने पर खूब चिल्ला-चिल्ला के बात करनी पड़ती थी. शायद इसीलिये पुराने लोग आज भी मोबाइल पर ज़ोर-ज़ोर से बात करते मिल जायेंगे... :)
पोस्ट ऑफिस का अपना अलग ही रुतबा था. और पोस्ट-मास्टर से ज्यादा पोस्ट मैन का. हम घर में पोस्ट मैन का इंतज़ार इस तरह करते थे, जैसे किसी ख़ास मेहमान का. सुबह ग्यारह बजे और दोपहर में एक बजे डाक आती थी. हम सब भाई-बहन इस कोशिश में रहते कि पत्र उसी के हाथ में आये, भले ही वो हमारे काम का हो या न हो. हमारे कान बाहर ही लगे रहते.

तो पोस्ट ऑफिस का अपना अलग ही रुतबा था. और पोस्ट-मास्टर से ज्यादा पोस्ट मैन का. हम घर में पोस्ट मैन का इंतज़ार इस तरह करते थे, जैसे किसी ख़ास मेहमान का. सुबह ग्यारह बजे और दोपहर में एक बजे डाक आती थी. हम सब भाई-बहन इस कोशिश में रहते कि पत्र उसी के हाथ में आये, भले ही वो हमारे काम का हो या न हो. हमारे कान बाहर ही लगे रहते. उधर पोस्ट मैन की आवाज़ आई, इधर हम गिरते-पड़ते भागते... चिट्ठी पा जाने वाला विजेता की मुद्रा में मुस्कुराता, पत्र खोलता, हमारी आँखें उस पर लगी रहतीं- " किसका है?" जिसे पत्र मिलता, उसे ही पत्र पढ़ के सुनने का हक़ होता. घर के सारे पढ़े-लिखे लोग, पत्र सुनने बैठ जाते.
सुनने के बाद , यदि किसी ख़ास का पत्र है, तो बारी-बारी से सब पढ़ते. राय-मशविरा होता. और फिर उसे हमारे पापा अपनी फ़ाइल में सहेज लेते. पत्रों के जवाब देना उनकी दिनचर्या में शामिल था.
हमारे पोस्ट मैन , जिन्हें हम चाचा कहते थे, बड़ी दूर से "अवस्थी जीईईईई ........." की हांक लगाते थे, जिस पर हम दौड़े चले आते थे.
कुछ और बाद में जब मैं छपने लगी तो मेरी फैन-मेल आने लगी, अब पोस्ट मैन चाचा मेरे लिए और भी ख़ास हो गए थे. रचनाएं वापस न आ रहीं हों, इस डर से मेरी कोशिश होती थी कि पोस्ट मैन के आने के वक्त मैं ही बाहर रहूँ :)
धीरे-धीरे टेलीफोन का चलन बढ़ा, तो चिट्ठियों में कुछ कमी आई. लेकिन अब, जब से मोबाइल का चलन बढ़ा है, नेट का चलन आम हो गया है, पत्र आने ही बंद हो गए. कभी कोई सरकारी डाक आ जाती है बस. लोग पत्र लिखना ही भूल गए. अब तो ये भी नहीं मालूम कि लिफाफे या पोस्ट कार्ड की कीमत आज कितनी है?
इन त्वरित सेवाओं ने निश्चित रूप से दूरियां काम की हैं, लेकिन इनसे उस काल-विशेष को सहेजा नहीं जा सकता. यादों में शामिल नहीं किया जा सकता, किसी बात का अब साक्ष्य ही नहीं...... सब मौखिक रह गया...लिखित कुछ भी नहीं....
कभी-कभी सुविधाएं भी कितनी अखरने लगतीं हैं.....

69 टिप्‍पणियां:

  1. ab dakiya ka intjar bhi nahi rahta.
    bahut khoob likha hai.

    पॉल बाबा का रहस्य आप भी जानें
    http://sudhirraghav.blogspot.com/

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  2. सच है ख़त का एक अपना ही मज़ा होता था आज भी जब पुराने ख़त निकलते हैं तो उन्हें पढ़ना भी किसी साहित्यिक कृति के पढ़ने जैसा ही होता है
    वंदना ,तुम ने इस रचना का अंत भी बहुत अच्छा
    किया विशेषतया ये जुमला कि
    कभी-कभी सुविधाएं भी कितनी अखरने लगतीं हैं....
    वाक़ई चलो फिर से शुरू करें ख़त लिखना

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  3. बहुत सही कहा आपने ! आजकल तो सिर्फ़ शादी के कार्ड या फिर शोक शुचना का पोस्ट कार्ड ही आता है या फिर आती है कोई बैंक या बीमा कंपनी की चिट्ठी जिस के की आप ग्राहक हो !
    नाते रिश्तेदारों या फिर ख़ास मित्रो के हाल चला तो मोबाइल पर मिल ही जाते है या अब तो सोसिअल नेट्वोर्किंग साइट्स का भी बोलबाला है ! चिट्ठी लिखता ही कौन है जो डाकिया घर का दरवाज़ा खटखटाए या आवाज़ दें !

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  4. सच कहा...एक अर्सा बीता बिलों के अलावा कोई मित्रवत खत आये.

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  5. जिन्‍होने चिटि्ठयों का जमाना देखा है। उन सब को ऐसा ही लगता है। पुरानी चिट्ठियों के दस्‍तावेज खोलने पर।

    फटाफट चिटिठयॉं ईमेल हैं।

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  6. ई-मेल ने तो चिठ्ठी और डाकिया दोनो को ही भूतकालीन बना दिया । सच में अब चिठ्ठी का इन्तजार ही नही रहता । आपका लेख पुराने दिनो की यादें ताजा कर गया जब डाकिया डाक लाया का आनंद मन में समाता न था ।

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  7. ई-मेल ने तो चिठ्ठी और डाकिया दोनो को ही भूतकालीन बना दिया । सच में अब चिठ्ठी का इन्तजार ही नही रहता । आपका लेख पुराने दिनो की यादें ताजा कर गया जब डाकिया डाक लाया का आनंद मन में समाता न था ।

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  8. आज भी याद आती है उन दिनों की | सुंदर अतिसुन्दर बधाई

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  9. हमने भी पुराने पत्रों को सहेज कर रखा है , एक धरोहर के रूप में ।
    अब आगे तो पुरातत्त्व विभाग की चीज़ बन गई हैं चिट्ठियां ।

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  10. सहेजने के लिए चिट्ठी से बेहतर कोई विकल्प नहीं है ...ईमेल और SMS में वो बात कहाँ ...

    सुन्दर पोस्ट ...!

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  11. सच कहा...आज कल पोस्टमैन का कोई इंतज़ार नहीं करता...पहले चिट्ठियों को कितना सहेज कर रखते थे...कितनी बार पढते रही...अब वो बात कहाँ

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  12. बिलकुल सही कहा आपने ....हमने भी खत का थोडा सा जमाना देखा .....लेकिन उसका भी एक अलग अंदाज था .

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  13. अब वो साइकिले......घंटी .....ओर नीले नीले कागज ....मोबाइल नेट के पीछे गुम हो गए है .....

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  14. कुछ चिट्ठियां तो आज भी सहेजी हुयी हैं……………यादों का कारवां ऐसे ही दस्तक देता है।

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  15. चिट्ठी में जब इंसान अपने हाथ से लिखता है तो उसकी खुश्बू कुछ और ही होती है ...... और डाकिया .... वो तो उस जमाने में घर का ही हिस्सा माना जाता था ... पर आज नेट की दुनिया में ये सब संवेदनाएँ मशीनी होती जा रही हैं ...... भावुक है आपकी पोस्ट बहुत ही ....

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  16. सारगर्भित लेख ....
    प्रभाव छोड़ने वाली शैली......
    वंदना जी...
    इस परिवर्तन का एक नुकसान ये हुआ कि.....
    भावनाओं की अभिव्यक्ति को
    सटीक शब्द नहीं मिल पाते...
    सब कुछ फ़ास्ट होकर रह गया है.

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  17. क्या कहूँ वंदना जी,मैं इस मामले में अजीब लकी हूँ ,खुदको अजीब लकी इसलिए कह रही हूँ क्योकि रोज दोपहर २ से तीन बार पोस्टमेन चाचा नही कुरियर वाले अंकल दरवाजे की बेल ठीक उसी समय बाजा देते हैं जब मेरे अरु सो रही होती हैं .अब इस ज़माने में पत्र आने का सुख तो होता हैं चाहे वह बेंक से ही क्यों न आया हो ,पर बेटी के जागने का................हर माँ जानती हैं :-).
    आपकी पोस्ट बहुत अच्छी लगी .सच चिट्ठी चिट्ठी ही होती हैं .

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  18. मैं भी कई दिनों से एक अच्छी चिट्ठी का इन्तजार ही कर रहा हूं.
    अच्छा लिखा है आपने.

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  19. मै भी पत्र लिखा कराती थी जब स्कूल - कॉलेज जाती थी . माँ कहती थी अपनी चाची को एक पत्र लिख दे या अलाहाबाद भैया हॉस्टल मै पढ़ते थे उन के लिए पत्र लिखाती थी बड़े प्यार से लिखती थी ऐसा महसूस होता था मै ही समझदार हूँ अब तो चाहकर भी पत्र नहीं लिख पाती फ़ोन या ईमेल पहले ही आ जाता है बहुत सी बातें रह जाती है

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  20. मै भी पत्र लिखा कराती थी जब स्कूल - कॉलेज जाती थी . माँ कहती थी अपनी चाची को एक पत्र लिख दे या अलाहाबाद भैया हॉस्टल मै पढ़ते थे उन के लिए पत्र लिखाती थी बड़े प्यार से लिखती थी ऐसा महसूस होता था मै ही समझदार हूँ अब तो चाहकर भी पत्र नहीं लिख पाती फ़ोन या ईमेल पहले ही आ जाता है बहुत सी बातें रह जाती है

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  21. हम भी पोस्ट मेन को चाचा, मामा जी कह कर ही बुलाते थे, ओर गर्मियो मै कभी पानी तो कभी लस्सी पिलाते थे, दिन त्योहार पर उसे कुछ ना कुछ देते भी थे, ओर कभी बिना बताये छुट्टी कर लेता तो उस के आने पर नाराज भी होते थे, वेसे हमारे यहां आज भी पत्र तो बहुत आते है, सारे के सारे बेंक के या सरकारी होते है, ओर वो भी अब ई मेल से भेजना चाहाते है.
    इस बहुत सुंदर लेख के लिये धन्यवाद

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  22. बहुत अच्छी लगी आपकी ये पोस्ट आज भी जब सायकिल की घंटी सुनती हूँ अपने घर के आस पास वो भी १ और २ के बीच तो पोस्टमेन भी याद आता है और साथ कुछ अच्छी बुरी यादें

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  23. चिठ्ठी पर पोस्ट लिखकर आपने फिर से गुजरा जमाना याद दिला दिया है |हमारे खंडवा में दो बार डाक मतलब पोस्टमेन आता था |एक सुबह ९ बजे और दोपहर १२ से दो बजे के बीच |मेरे दादाजी को तो इतनी जल्दी रहती थी की वो गली के नुक्कड़ से ही पोस्टमेन से डाक ले लिया करते थे |और कोई साहित्यिक डाक तो वो पोस्ट ऑफिस से ही ले आते थे |जब मै शादी होकर बम्बई गई तो जवाबी पोस्ट कार्ड पर पता भी लिख देते थे मुझे बस इतना लिखना होता था की हम सब कुशल है \ऐसा था चिठियोका संसार |टिप्पणी थोड़ी ज्यादा बड़ी हो गई

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  24. ये पोस्ट पढ़ कर मैं भी यादों की झील में तैर आया कुछ देर के लिए..

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  25. वंदना जी आप की यादों को पढ़ते समय पता ही नहीं चला कब मैं अपने पुरानी यादों मैं चला गया. सच है वोह पत्रों का आना , उनको संभाल के रखना.वोह पोस्ट मैन का इंतज़ार. बहुत कुछ आप ने समेट के रख दिया , छोटी से पोस्ट मैं.

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  26. बहुत अच्छी पोस्ट लिखी है ..बिलकुल जैसे मन की बात कह दी आप ने..आज सच में मुझे तो ये भी मालूम नहीं है की पोस्ट कार्ड या अंतर्देशीय का क्या मूल्य है..मोबाइल /ईमेल पर कितने निर्भर हो गए हैं..घर के बाहर डाकिये की सायकिल की घंटी बजती थी तो समझ जाते थे कि चिट्ठी आई है...

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  27. नमस्कार...
    कुसुम जी को मैंने आपकी पोस्ट के द्वारा ही जाना है...और यह कविता उनसे आपका लगाव स्पष्ट बयां कर रही है... तो जिसके संग आपका आत्मिक प्यार हो उसके जन्मदिवस और विवाह दिवस की वर्षगाँठ पर आपका यह कविता लिखना स्वाभाविक ही है... इस अवसर पेर मेरी हार्दिक बढ़ायी स्वीकार करें....

    दीपक...

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  28. सच कहा मैम...तकनीकी कितनी भी एडवांस क्यों न कर , कुछ चीजों का मजा जो उसके पुराने बने रहने में है उसका कोई जोर नहीं। सेना में दूर-दराज के पोस्टों चौकियों पर जहां मोबाइल की सुविधा आज भी नहीं, खत अभी भी उतने ही लोकप्रिय हैं।

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  29. सच में चिट्ठियों की बात ही कुछ और है। एक ही चिट्ठी कई-कई बार पढीं जाती थीं। अब भी अक्सर मन करता है कि चिट्ठियां लिखीं जायें। कई बार पोस्टकार्ड लाकर रखे लेकिन वे रखे ही रह गये।

    सुन्दर यादें सहेजती पोस्ट।

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  30. जी हाँ, सब वंस अपोन ए टाईम की बातें लगती हैं!

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  31. सच लिखा आपने..संवेदनाएं कहाँ जाएँ आखिर.
    _________________________
    अब ''बाल-दुनिया'' पर भी बच्चों की बातें, बच्चों के बनाये चित्र और रचनाएँ, उनके ब्लॉगों की बातें , बाल-मन को सहेजती बड़ों की रचनाएँ और भी बहुत कुछ....आपकी भी रचनाओं का स्वागत है.

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  32. कितनी सारी यादें हैं...चिट्ठियों से जुडी...हॉस्टल में रहने वालों के लिए कुछ और ख़ास जगह थी ,इनकी.... अपनों से जुड़े रहने का बस यही एक सहारा था.
    और छुट्टियों में घर आओ तो फ्रेंड्स के ख़त का इंतज़ार...
    आज तो पोस्टमैन को देखकर लगता है...लो आ गए कुछ और बिल.
    नए पीढ़ी महरूम रहेगी इन यादों से....कितने गीत ग़ज़ल..गाने थे ख़त और चिट्ठियों पे...बहुत कुछ याद दिला गयी ये पोस्ट .

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  33. पोस्टमैन को याद करके लिखी यह पोस्ट बहुत अच्छी लगी ! वाकई में लगा कि घर का एक अपना कहीं चला गया ! सादर

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  34. wo tooti likhawatein...wo antardeshiy neele wale..wo peele postcard...sab kuchh wapas yaad dilane, unhe yaad karne ka hriday se aabhar.

    bahut shukriya jo apne likha ise..

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  35. ऐसा ही एक लिफाफा मेरे यहाँ है और तीन फाइल और बहुत कुछ ... मैने अपने पिता और अन्य रिश्तेदारों के पत्रों की एक किताब भी छपवाई है .. 200 पन्नो की " कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ " शीर्षक से । वैसे पोस्ट्मैन अब भी मेरे यहाँ रोज़ आता है .. आप अपना पता दीजिये , देखिये मैं चिठ्ठी लिखता हूँ या नहीं

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  36. ज्यादा पुरानी बात नहीं है सिर्फ़ अठारह उन्नीस साल पहले, मेरे दादाजी को मुझसे सबसे बड़ी शिकायत यही थी कि चिट्ठी लिखने में मैं आलस्य किया करता हूं, जबकि सोमवार सुबह चलकर शनिवार रात को मैं घर लौट आता था, क्या समय था वो भी।
    आपकी पोस्ट बहुत पीछे ले गई, स्वर्ण काल था शायद।
    आभार, इस पोस्ट के माध्यम से पिछले समय में विचर रहे हैं।

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  37. वाह ,क्या बात कही है । हमने अपनी स्कूल बुक मे पढा कबूतर पत्र लाने का काम करते थे ,आने वाली पीढी पढेगी .डाकिया भी पत्र लाने का काम करते थे

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  38. बहुत अच्छा लिखा आपने वंदना जी. आपकी यह पोस्ट 'डाकिया डाक लाया' ब्लॉग पर साभार दे रहे हैं.

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  39. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  40. Chhithi par post likhkar aapne gujre jamane kee yaaden taaji kar dee.. kitna sahej kar rakhte the hum chhithiyon ko.. mere paas to aaj bhi 25 varsh purane khat hai.. hai bahut achha lagta tha khat likhana... lelin chalo ab blog ke madhayam se hi khat likh lete hain apne man kee baat kar lete hai yahi shayad achha lagne laga hai...

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  41. Chhithi par post likhkar aapne gujre jamane kee yaaden taaji kar dee.. kitna sahej kar rakhte the hum chhithiyon ko.. mere paas to aaj bhi 25 varsh purane khat hai.. hai bahut achha lagta tha khat likhana... lelin chalo ab blog ke madhayam se hi khat likh lete hain apne man kee baat kar lete hai yahi shayad achha lagne laga hai...

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  42. सच्च ख़त का अपना ही मज़ा है .....अंतर्देशीय तो नहीं पर पोस्ट कार्ड काफी आ जाते हैं .....हाँ इमरोज़ जी का ख़त जरुर आ जाता है .....!!

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  43. vandana ji,
    Aaap ka gaon aur hamara gaon ek hi tha .aur apna bhi wahi hal tha .purane yaadein tazaa ho gayi .badhiya post thanks.

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  44. mere jeevan ka ek हिस्सा पत्र के साथ ही तय हुआ आज इस लेख ने पुराने दिन याद दिला डाले ,बहुत कुछ लिख चुकी हूँ इस ख़त पर मगर कभी ध्यान नहीं आया कि उन यादों पर ध्यान दूं ,आज इस पोस्ट ने आँखे नम कर दी ,इतनी बाते है कि कहने लगी तो एक लेख ही न तैयार हो जाए ,मन को छू गयी और छिड़ गया फ़साना atit ka ,बहुत बहुत सुन्दर रचना .
    लिफाफे या पोस्ट कार्ड की कीमत आज कितनी है? इन त्वरित सेवाओं ने निश्चित रूप से दूरियां काम की हैं, लेकिन इनसे उस काल-विशेष को सहेजा नहीं जा सकता. यादों में शामिल नहीं किया जा सकता, किसी बात का अब साक्ष्य ही नहीं...... सब मौखिक रह गया...लिखित कुछ भी नहीं.... कभी-कभी सुविधाएं भी कितनी अखरने लगतीं हैं.....
    kitni pate ki baate hai ,bilkul satya .

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  45. सच ! वो ज़माना ,, चिट्ठियों का ज़माना
    बरबस ही याद दिलवा दिया आपने
    किसी नायाब खजाने कि तरह संभाल कर रखे गये
    वो तमाम ख़त....
    आज भी मन को सुकून देते हैं

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  46. ख़त का मज़ा अपना होता था....इन्तिजारी का मज़ा तो ख़त में ही था.
    खतों को लेकर मासूम ख्याल यूँ ही थोड़े ही पिरोये गए हैं....
    " खुशबू जैसे लोग मिले अफ़साने में,
    एक पुराना ख़त खोला अनजाने में...." (गुलज़ार )
    संवेदनशील पोस्ट...!

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  47. लोग पत्र लिखना ही भूल गए. अब तो ये भी नहीं मालूम कि लिफाफे या पोस्ट कार्ड की कीमत आज कितनी है?

    सब बाज़ार की माया है.

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  48. अतीत के अपने दंश होते हैं ! और जब आप उस दंश की पीड़ा में कलम डुबा-डुबाकर कोई भी मस्लहा लिख डालती हैं तो उस पीड़ा की तासीर बदल जाती है ! हुज़ूर ! ये मसले की नहीं, आपकी खुसूसियत है !
    खातो-किताबत के वे दिन गए, लेकिन उन दिनों की याद आज भी एक मंज़र खड़ा कर देती है ! यकीन कीजिये, पुराने खतों को निकालकर आज भी उन्हें सूंघता हूँ कभी-कभी ! काल-खंड की बात छोडिये, लिखनेवाला भी प्राण में एक गंध बनकर समा जाता है ! साधुवाद !!
    सप्रीत--आ.

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  49. कुछ भी हो जी..
    ख़त तो ख़त ही होते हैं...
    एस.एम.एस से तो अब चिढ सी होने लगी है...ज्यादातर बिना पढ़े ही डिलीट करने लायक होते हैं..घिसे पिटे से..हजारों बार फारवर्ड किये हुए..
    और ई.मेल से भी वो खुशबू कहाँ आती है..जो नीला अंतर्देशीय पत्र खुलते ही आती थी...

    और वो १५ पैसे वाली खाकी चिट्ठी... हा हा हा हा...कितनी ज्यादा ओपन होती थी....सचमुच खुला ख़त वो भी जरूरत से ज़्यादा...

    बाद में हमने उसका इस्तेमाल सिर्फ विविध भारती पर फरमाइश भेजने के लिए ही रख छोड़ा था...
    डेली १०० - ५० चिट्ठियाँ भेजते थे...
    आपकी फरमाइश/संगम/और युववाणी के लिए...

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  50. और शायद उसी खाकी चिट्ठी के लिए किसी गीतकार ने किसी फिल्म के लिए लिखा हो...

    तन मन दे डाला सैंया सोला साल वाला..

    और तूने तो ख़त भी न डाला..

    पंद्रह पैसे वाला ..बैरी.. पंद्रह पैसे वाला...

    आज सुबह सुबह बहुत बहुत मजा लिया आपकी पोस्ट पर...बचपन याद आ गया...

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  51. धन्यवाद मनु जी, लेकिन इतने दिनों बाद आये हैं??

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  52. mujhe aapka blog bahut achha laga...
    bahut achhe sandesh diye aapne is blog ke jariye...
    Meri Nai Kavita padne ke liye jaroor aaye..
    aapke comments ke intzaar mein...

    A Silent Silence : Khaamosh si ik Pyaas

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  53. डाकिया बना एक कहानी
    रिश्तों पर भी पड़ा ठंडा पानी
    अब हर सुख दुख का संदेशा
    घर पर लगा फोन बता जाता है
    रिश्तों में जम गयी बर्फ को
    हर पल और सर्द सा कर जाता है
    अब ना दिल भागता है
    लफ़ज़ो के सुंदर जहान में
    बस हाय ! हेलो ! की ओपचारिकता निभा
    कर लगा जाता है अपने काम में ...

    http://ranjanabhatia.blogspot.com/2010/06/blog-post.html


    कुछ इसी तरह के दर्द को मैंने भी लिखा था .बहुत अच्छे से लिखा है आपने इस को लेख के रूप में खासकर इसका अंत ..

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  54. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

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  55. माँ कहती हैं कि जब पत्र लिखती थी तो वे उसे जब भी मेरी याद आती थी पढ लेती थीं। अब तो कोई भी पत्र नहीं लिखता।
    घुघूती बासूती

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  56. क्‍या बात ळे टिप्‍पणी दब के होती है यहॉं पर

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  57. Bachapan me ek kavita padhi thi "Chhithi Patri Khaton Kitabat Ke Mausam Fir Kab Aayenge"
    Aapke blog ko padhkar yad aa gayi, kya aap mujhe bata sakti h ki ye kavita kaha milegi? aur iske lekhak ka nam kya h?

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