रविवार, 14 मार्च 2010

वो छुप-छुप के लिखना..........


आज अपने बुक-शेल्फ की सफाई कर रही थी, तो एक पुरानी डायरी हाथ आ गई. सन १९८० की डायरी. यानि तीस साल पुरानी डायरी................. पन्ने पलटने लगी तो मेरा बचपन डायरी में से कूद कर बाहर भागा...

याद आने लगे लेखन के शुरूआती दिन....

हमारे घर में हमेशा से शुद्ध साहित्यिक माहौल रहा है. मेरे पापा ( श्री रामरतन अवस्थी) खुद भी बहुत अच्छे कवि और लिखने पढ़ने के बेहद शौक़ीन व्यक्ति हैं. लिहाजा बचपन से ही घर में पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों का अम्बार देखती आई हूँ. घर की सारी अलमारियां किताबों से सजी हुईं, रैक पर करीने से तमाम पत्रिकाएं सिलसलेवार रखी हुईं. पठन सामग्री को मैंने कभी घर में बिखरा हुआ नहीं देखा. उस वक्त हमारे घर में साप्ताहिक हिंदुस्तान, धर्मयुग, सारिका , कादम्बिनी, और ज्ञानोदय हॉकर लाता था, जबकि सोवियत भूमि, सोवियत नारी, और बाल स्पुतनिक डाक से आती थीं. हम तीन बहनों के लिए नंदन, चंदामामा, और पराग ये तीनों पत्रिकाएं नियमित आती थीं.
महीने में तीस दिन, और ग्यारह पत्रिकाएं!!!!

मेरी मम्मी अक्सर कहतीं, कि "अव्वल तो इस घर में चोर आयेगा ही नहीं, और यदि आया तो सिर पीट लेगा क्योंकि उसे किताबों के अलावा कुछ मिलेगा ही नहीं."

किताबों से मुझे हमेशा से बहुत प्रेम रहा. जब मुझे पढना नहीं आता था, तब भी मैं घंटों किताबें हाथ में लिए , पढने का नाटक करती बैठी रहती थी. फिर जब मेरा स्कूल में दाखिला होना था, उसके एक साल पहले से मेरी छोटी दीदी ने मुझे पढ़ाना शुरू किया. जानते हैं, लिखना-पढ़ाना सीखने के बाद मैंने सबसे पहला काम क्या किया?

पुरानी कॉपियों के पन्ने निकाल-निकाल के उन्हें दोहरा मोड़ के एक डायरी बनाई. उस के ऊपर बाक़ायदा लिखा- "गांधी-डायरी" (तब घर में मैंने केवल गांधी डायरियां ही देखीं थीं.)

अब इस डायरी में मैंने लिखना शुरू किया. शुरुआत मम्मी की सुनाई कहानी से की.... चार लाइनें ही लिखीं थीं, कि खुद को झिड़का- धत! कोई सुनी सुनाई कहानी भी लिखता है? खुद से सोच-सोच के लिखना चाहिए..........

....फिर कुछ कहानी टाइप लिखा. इसके बाद दूसरी और फिर तीसरी तो सचमुच ही कहानी जैसी बन पड़ी.

दोपहर में जब मम्मी सो रही होतीं, दीदियाँ स्कूल गईं होतीं, तब मैं खिड़की में बैठ के अपनी उस हस्त-निर्मित डायरी में चोरी से कहानियां लिखती. ( मेरा उस वक्त तक स्कूल जाना शुरू नहीं हुआ था, तब दाखिला छह साल कि उम्र में होता था और मेरे छह साल पूरे नहीं हुए थे.) साल भर में मैंने पता नहीं कितनी डायरियां बना डालीं, और पता नहीं कितनी कहानियां लिख डालीं..........

तब स्कूल के शुरूआती दिन थे....... घर में दिल्ली के नवभारत टाइम्स के अलावा दैनिक जागरण भी आता था. दैनिक जागरण के रविवारीय पृष्ठ के "बाल-जगत " को मैं हमेशा पढ़ती थी. धीरे-धीरे उसमें छपने की इच्छा जागने लगी. एक दिन चुपचाप एक कहानी फुल स्केप कागज़ पर उतारी गई. पापाजी की फ़ाइल में से एक लिफाफा चुराया गया, उस पर नौसिखिया अक्षरों में दैनिक जागरण-बालजगत का पता लिखा गया. कहानी भेजी गई.....शीर्षक था " जब बच्चों ने नाटक खेला".

भेजने के बाद इंतज़ार शुरू. छपने से ज्यादा डर कहानी के वापस आ जाने का था....पोस्टमैन के आने के समय बाहर घूमती रहती, ताकि कहानी का लिफाफा वापस लाये, तो मुझे ही मिले. किसी और को मिल गया तो कितनी हंसी उड़ेगी. डांट अलग से पड़ेगी , कि पढाई छोड़ के क्या-क्या के तमाशे करती रहती हूँ.

एक हफ्ता बीता.....दूसरा भी.....किसी अंक में मेरी कहानी नहीं छपी थी.......अब तो पक्का भरोसा हो गया कि लिफाफा वापस आने वाला है. रविवार को देर तक सोने वाली मैं, बड़े सबेरे उठ जाती थी..... तीसरा हफ्ता.........नींद देर से खुली. कुछ आवाजें आ रहीं थीं....ध्यान लगाया , मेरे बारे में ही बात हो रही थी....कान खड़े हो गए मेरे.
ओह्ह्ह्ह.....ये तो कहानी के बारे में बात हो रही है......उठ के भागी. पापाजी अखबार हाथ में लिए मम्मी को दिखा रहे थे. उसके बाद तो पूरे मोहल्ले में अखबार घूमा, कुछ लोगों ने खुद आ के बताया. चूंकि नाम के साथ पूरा पता भी छपा था, इसलिए सब पहचान पा रहे थे. अगले दिन स्कूल में भी खूब तारीफ़ पाई, इस हिदायत के साथ कि पढ़ाई पहले है.
इसके बाद छपने का सिलसिला जो शुरू हुआ तो आज तक जारी है, लेकिन वो ख़ुशी दोबारा नहीं मिली जो उस दिन मिली थी.

आज जब लोगों में पढने की  आदत लगभग ख़त्म होते देखती हूँ, तो बहुत तक़लीफ़ होती है. बच्चों में तो ये आदत अब न के बराबर रह गई है. अधिक से अधिक कॉमिक्स, बस. हांलांकि दोष बच्चों का नहीं है. उन के सिर पर पढ़ाई का इतना बोझ है, कि उसे पूरा करने के बाद कुछ और पढने कि इच्छा ही नहीं रह जाती होगी. ये अलग बात है कि बच्चे छुट्टियों में भी कुछ पढ़ने का मन नहीं बनाते.

बड़े ही कितना मन बनाते हैं!!


58 टिप्‍पणियां:

  1. लेकिन वो ख़ुशी दोबारा नहीं मिली जो उस दिन मिली थी.
    ...सच है. वो खुशी दुबारा नहीं मिलिती. आपकी पोस्ट कवियों के संस्मरण की कहानी है.

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  2. वंदना जी,बचपन के संस्मरण सचमुच बचपन में पहुंचा देते हैं.सच बहुत अच्छी पोस्ट लगी.मैं तो बचपन मैं ऐसा कुछ खास नहीं करती थी पर हाँ आकाशवाणी के रविवार वाले बच्चों के प्रोग्राम में अक्सर जाती थी.स्कूल और कोलेज की तरफ से भी कभी कुछ रेडियो में बोल आती थी. पैसे तो मुझे मेरे हाथ में नहीं मिलते थे क्योंकि चेक तो स्कूल और कोलेज के नाम बनता था पर स्कूल से मुझे चोकोबार आइसक्रीम खाने को मिलती थी और जिस दिन मेरा प्रोग्राम आता मेरी क्लास में रेडियो भेजा जाता फिर पूरी क्लास सुनती और हम उस पीरियड में पढ़ने से बच जाते थे.सच क्या दिन थे

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  3. aapkee ye kahaanee maine bhee padhhi thee ..achchhe se yaad hai.. itane lambe samay ka gap parivaryan svabhavic hai...

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  4. वाह वाह वन्दना जी ,, मैं तो इसे पढ़ते हुए लोटपोट हो गया ..नहीं इसलिये नही कि यह कोई हास्य रचना है ..इसलिये कि यही सब हरकतें तो बचपन मै भी कर चुका हूँ । बस दैनिक जागरण की जगह कर दें दैनिक नवभारत नागपुर और कहानी का शीर्षक जब बच्चों ने नाटक खेला की जगह कर दे " "सुनो सबकी करो मन की" और वन्दना की जगह कर दें मेरा नाम बस पूरी की पूरी स्टोरी मेरी ।
    इत्तेफाक देखिये कि मैं भी अपनी पुरानी डायरी निकाल कर पढ़ रहा था । अब इस पीढी के बारे में क्या कहें । पत्रिकायें तो अब भी घर में आती हैं लेकिन..... ।

    बहुत मुश्किल है इस पीढ़ी को टीवी,डीवीडी,एफ एम से बचाना ।

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  5. वंदना जी, आदाब.
    सचमुच क्या दिन थे वो भी, बच्चों की अपनी किताबें, वो ज्ञानवर्धक कहानियां, पहेलियां,
    ’आप कितने बुद्धिमान हैं, तेनालीराम वगैरह वगैरह...

    आपकी दैनिक जागरण में छपी कहानी की तरह..
    उर्दू के मिलाप अखबार में फोटो के साथ अपनी पहली ग़ज़ल छपने की याद आज भी अलग ही खुशी का एहसास कराती है
    ...आपके इस अंदाजे-बयां में हम सब अपना अतीत याद कर रहे हैं.

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  6. vandanaji
    bhut acha lga bachpan ka sansmarn padhkar .phli lhushi hoti hi hai alokik .sath hi prernadayak sansmarn bhi hai ki aapne chpvane ki pahl aur himmt ki .
    aapki lekhni anvart chlti rahe shubhkamnaye .

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  7. आप की बचपन की डायरी ओर बचपन के संस्मरण पढ कर शायद सब को अपना बचपन याद आ गया होगा.बहुत सुंदर

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  8. ओह आज का दिन इतिहास बन गया क्योंकि आज आपके हाथ अनमोल खजाना मिल गया है, और हमें भी अब उस खजाने में से हीरे मोती मिलते रहेंगे ....आप लोग कितना नोस्टेलजिया देते हैं कसम से ..बहुत देर तक नींद नहीं आएगी ...
    अजय कुमार झा

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  9. कैसा संयोग है ना मैम...मैं भी अभी एक तेरह साल पुरानी डायरी के पन्नों के बाबत पोस्ट लिख रहा हूं...और उधर शरद जी भी।

    डायरी की तस्वीर और पोस्ट का अंदाज भाया...

    आजकल के बच्चों की आदतें क्या हम सब पर भी निर्भर नहीं है मैम?

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  10. बहुत शानदार संस्मरण!!

    सच कहा आज पढ़ने की आदत कम होती जा रही है. यह वाकई चिन्ता का विषय है.

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  11. वाह दिल खुश हो गया यह संस्मरण पढ़ के..
    और रही पढने की आदत तो आजकल किताबें उपलब्ध भी कहाँ हैं?
    हमारे शहर में तो एक पुस्तकालय भी नहीं हैं जहाँ हिंदी किताबें पढने में मिले..

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  12. वन्दना ,सच बहुत मज़ा आया पढ़ कर ,इखना तो मैं
    ने बहुत बाद में शुरू किया लेकिन किताबें पढ़्ने का शौक़ हमेशा रहा हर किताब पढ़ डालते थे हम लोग
    जहां तक आज के बच्चों की बात है उस के ज़िम्मेदार क्या हम लोग नहीं ? किताबों की जगह CD खरीदते हैं project की जानकारी के लिए नेट का इस्तेमाल है

    एक अच्छी पोस्ट के लिए बधाई

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  13. बचपन के दिन भी क्‍या दिन थे
    वास्‍तव में रचनाकारों के बचपन के दिन भी
    अलग ही होते हैं
    पर एक ख्‍वाहिश है कि
    जब बच्‍चों ने नाटक खेला
    कहानी उपलब्‍ध हो तो
    उसे ब्‍लॉग पर अवश्‍य उपलब्‍ध करवायें
    चाहे स्‍कैन करके
    अथवा टाइप करके
    बस्‍स ... पढ़ना चाहते हैं।

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  14. सच है पहली बार छपने का आनंद कुछ और ही होता है ।

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  15. समय के पंख होते हैं वह उड़कर पीछे भी यूं ही चला जाता जाता है. सुंदर अनुभूतियां.

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  16. बहुत रोचक संस्मरन हैं बचपन के मुझे लगता है बचपन की यादों से हम जितना कुछ सीखते हैं उतना आगे जा कर पूरी जिन्दगी मे नही सीख पाते\ संस्कारों की नींव तो बचपन मे ही रखी जाती है मगर आज बचपन भी खो सा गया लगता है कहाँ है आपके और हमारे जैसा बचपन। जब जिन्दगी मे ठहराव हो तभी हम कुछ नया पढने लिखने और साहित्य की बात सोच सकते हैं\ बहुत अच्छा लगा आपका संस्मरण। धन्यवाद्

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  17. वाह, वाकई पुरानी डायरी मिलने की बहुत खुशी होती है। पर अफ़सोस हमारी तो गुम गई :(

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  18. विकास के भ्रम ने हमें जहॉं लाकर खड़ा कर दिया वहॉं से पीछे पलटकर देखने से निश्चित ही साप्ताहिक हिंदुस्तान, धर्मयुग, सारिका , कादम्बिनी, नवनीत, पराग, नंदन और चंदामामा का युग सुखद लगता है। फिर आये चंपक, चाचा चौधरी भी शुद्ध मनोरंजन की दृष्टि से कम नहीं थे। अब चंपक का लेखन स्‍तर पहले जैसा तो नहीं रहा लेकिन फिर भी मिल जाये तो पढ़ने में आनंद आता है, लेकिन आज के बच्‍चे हॉंके जा रहे हैं, मॉ-बाप को लगता है कि पत्रिकाओं में खोये रहे तो दौड़ में पीछे रह पे-जायेंगे, बच्‍चे बेचारे दौड़ रहे हैं-बेतहाशा-खुद जीतने के लिये नहीं- अपने मॉं-बाप को जिताने के लिये। स्‍कूल में भरती होने के पहले तो दौड़ की तैयारी शुरू हो जाती है। दुर्भाग्‍यपूर्ण है कि बच्‍चा आज इन्‍वेस्‍टमेंट हो चुका है जिसकी परणिति अंतत: एक पैकेज में होती है और वह पे-पैकेज ही सफलता का पैमाना बन जाता है।

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  19. "अव्वल तो इस घर में चोर आयेगा ही नहीं, और यदि आया तो सिर पीट लेगा क्योंकि उसे किताबों के अलावा कुछ मिलेगा ही नहीं."
    ऐसे कितने घर बचे हैं ? सोचता हूँ बस सोचता हूँ ....

    आप घनीभूत भावों को प्रकट करने का सामर्थ्य रखती है, मैं आपके इस ब्लॉग से सदा प्रसन्न हो कर जाता हूँ.

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  20. बहुत रोचक लिखा ही आपने इस संस्मरण को किताबे और बचपन पढ़ते ही अपना बचपन याद आ जाता है ..आज के बच्चो में पढने की इस तरह से रूचि वाकई बहुत कम है ..

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  21. संस्मरण बहुत ही बढ़िया है!
    आपकी पुरानी डायरी में तो रत्न भरे पड़े हैं!

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  22. पुराने पन्नों को पलटना वाकई कितना सुखद होता है........

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  23. क्या बात है...आपके तो पूत के पाँव पालने से ही नज़र आने लगे थे.....स्कूल बाद में और डायरी लेखन पहले...वाह...
    और वो डर अच्छा बयाँ किया जो रचना की वापसी का होता था और हर बार सबसे पहले पत्रिका का वही पन्ना खोलना और अपनी रचना ना देख, उदास हो जाना...जब छप जाए, तो बल्लियों उछलते मन से ये प्रदर्शित करना कि कोई ख़ास बात नहीं....क्या क्या ना याद दिला दिया तुम्हारी इस नौस्टेलजिक पोस्ट ने
    आज कि पीढ़ी मरहूम है इन छोटी छोटी खुशियों से...पर वे फेसबुक पर स्टेटस सजा कर ही खुश हैं...

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  24. वाह....वंदना जी आज आपने पत्रिकाओं का नाम गिनाया तो याद आया ये सभी पत्रिकाएँ मैं भी पढ़ती रही हूँ .....कादम्बिनी मैंने कम पढ़ी .....धर्मयुग , सारिका , पराग, लोटपोट, नंदन , चंदामामा , सरिता- मुक्ता, फ़िल्मी दुनिया ...और उपन्यास बहुत पढ़ती थी ..... लिखना मैंने देर से शुरू किया ....हाँ यहाँ के स्थानीय समाचार पत्रों में खूब छपी ...तब जिज्ञासा आप जैसी ही रहती थी .....अच्छा लगा ये संस्मरण ....आप तो खूब लिखती हैं .......!!

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  25. इसीलिए कहते हैं --होनहार बिरवान के होत चीकने पात ।
    आपने ६ साल की उम्र में कहानी लिख दी , यह तो अद्भुत है।
    सच है , आजकल बच्चों पर स्कूल का ही इतना बोझ होता है , की और कुछ पढने का समय ही नहीं बचता । कम से कम साहित्यिक सामग्री तो नहीं।

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  26. वंदना जी,
    नमस्कार
    वाकई आपने जो संस्मरणात्मक आलेख लिखा उसे पढ़ कर मुझे भी बचपना याद आ गया.
    पहली ख़ुशी वो भी बचपन की, अविस्मरनीय तो रहेगी ही.
    अच्छा लग पढ़ कर

    - विजय तिवारी ' किसलय "

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  27. is sanamaran ne kaiyo ki bachpan ki yaade taza kar di ,pahli baarish me bhigne kaa jo adbhut aanand milta ,kuchh aesa hi aanand pahli saflata par ,apne bhi bite huye lamhe yaad aa gaye ,sabke bachpan ko is aangan me jinda kar diya ,yahi to kaamaal hai apni baat ki jahan jo bhi baat kahi jaati hai wo apni hi hoti hai .ati sundar .

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  28. बहुत ही सुन्दर और दिलचस्प संस्मरण ! इस उम्दा पोस्ट के लिए ढेर सारी बधाइयाँ !

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  29. खूबसूरत संस्मरण..वो दिन कभी भुलाये नहीं जा सकते.
    ______________
    भारतीय नववर्ष विक्रमी सम्वत 2067 और चैत्री नवरात्रारंभ पर हार्दिक शुभकामनायें.

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  30. laga ki apne ghar kee kahani padh rahee hu....sab kuchh vaisa hee....tamaam badee badee sahityik kitaaben bachpan me hee padh dalee thee.....

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  31. बड़े ही सुन्दर तरीके से संस्मरण लिखा है.
    रोचक लगा सब पढ़ना.
    वो भी दिन थे...:) क्या दिन थे!

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  32. बहुत ही सुन्‍दर संस्‍मरण, बचपन की यादें ताजा हो गई आपके साथ साथ हमारी भी, बधाई सुन्‍दर अभिव्‍यक्ति के लिये ।

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  33. bachpan mein mujhe to sirf padhne ka shauk tha, likhna to maine bahut baad mein shuru kiya... par aapki sansmaran ne mujhe bhi mere bachpan mein pahucha diya...

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  34. बधाई कि तीस साल पहले से आजतक नियमित लेखन और प्रकाशन जारी है |सरल भाषा में लिखा गया संस्मरण और बाल सुलभ छपास की जिज्ञासा तथा न छपने पर यानी कहानी वापस आने पर हंसी उड़ने का डर|आजकल बच्चों को पहले जैसी पढ़ने की इच्छा नहीं होती और उसका कारण वही है तो आपने लिखा है कि स्कूल की पढाई का भार |आपने लेख में जिन पत्रिकाओं का जिक्र किया है उनमे से अधिकाँश तो बंद हो चुकी है |सोवियत भूमि, सोवियत नारी, और बाल स्पुतनिक चित्र देखने और किताब कापी पर कवर चढाने के काम आती थी | मै उस वक्त की कल्पना कर सकता हूँ जब पहली कहानी छपने पर कैसा कैसा महसूस हुआ होगा |संस्मरण अच्छा लगा

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  35. सच मे बचपन की यादे, वो चोरी छुपे शरारत करना आप ने तो मुझे अपना बचपन याद करवा दिया ।

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  36. 'वो छुप-छुप के लिखना' जाने कैसे मेरी आँखों से बचा रह गया ? देर से आया हूँ, तो ज़ाहिर है, गफलत मेरी है ! इस संस्मरणात्मक आलेख से आपका बाल्य-काल झलक रहा है और इसे पढ़ते हुए हम सबों का मन भी अपने-अपने बचपन में जा पहुंचा है ! भई, mera भी... !!
    आलेख की विशेषता यह है कि यह नवांकुरों के लिए अत्यंत प्रेरक बन पड़ा है ! कभी ऐसा भी हो सकेगा क्या कि वह आपकी पहली प्रकाशित रचना भी बिना किसी परिवर्तन के ब्लॉग का पोस्ट बनेगी ? उसे पढ़ना भी प्रीतिकर होगा !!
    मेरी शुभकामनाएं !
    सप्रीत--आ.

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  37. आप के लिखने का जादू तो पढने के साथ असर करता है. बेहद खूबसूरत अल्फाजों के साथ सजी आपकी पोस्ट बहुत पसंद आई. आजकल बच्चों के न पढने का कारण ज्यादा अनजाना नहीं है. अब घरों में पढने लायक सामग्री नहीं मिलती और न ही बच्चों कों इसकी इज़ाज़त..

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  38. आपका ये सन्समरण पढकर वहुत अच्छा लगा.

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  39. जो भी बचा है पहले का, bas मेरी याद में हैं...डायरी न लिख पाने का अफ़सोस है
    और देखिये.. आज भी नहीं लिखता...शायद यह अफ़सोस जिन्दगी भर रहेगा...

    सही संस्मरण वही है जो कहीं आपके अतीत को जोड़ पाता है...

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  40. वाह वाह वन्दना जी ,, मैं तो इसे पढ़ते हुए लोटपोट हो गया ..नहीं इसलिये नही कि यह कोई हास्य रचना है .

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  41. Bahut achha Sansamaran likha hai aapne.Mujhe apne din yaad aa gaye jab hum pitajee se 5 Rs pocket money lekar CHAMPAK aur Nandan khareed kar laya karte the.

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  42. खूबसूरत संस्मरण..वो बचपन के दिन भला किसे भूल पाएंगे.


    ______________
    ''शब्द-सृजन की ओर" पर- गौरैया कहाँ से आयेगी

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  43. वंदना जी
    वाकई......तब छुप छुप के लिखा करते थे...एक यह डर कि अगर कहानी-कविता अप्रकाशित बैरंग वापस आयी और घरवालों ने देख लिया तो क्या कहेंगे.......! नंदन-पराग....... भाई वाह क्या दिन थे वे......! आज कल डायरी का दौर चल गया है ब्लॉग पर बड़ा मज़ा आ रहा है पुराणी डायरियां पढने में....

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  44. पहली हर चीज़ अच्छी लगती है ... उसकी याद हमेशा दिल में किसी कोने पर सजी रहती है ... डायरी, उसमें लिखी रचनाएँ, कहानी, .... जाने क्या क्या आँखों के सामने घूमता रहता है ...
    ये सच है की आज माहॉल बदल रहा है ... पत्रिकाओं की जगह अब लेप-टॉप ने ले ली है ... परिवर्तन का युग है .. पर ये समय भी आने वाली पीडी का कल बनेगा और उनकी यादों में महकेगा ....

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  45. Aapne apne bachpan ki baate bataakar mujhe bhi apne bachpan ki yaadon me pahunchaa diyaa. Puraani yaade kitna sukh deti he. Jaane anjaane dhero mitra parijan yaad aa jaate he.
    Aapke is lekh ke liye aapko jitnaa dhanyvaad diyaa jaaye bah kam he. Kabhi us diary ko yadi high resolution me post kar sake to ati uttam taaki ham bhi us likhaavat ko padh sake.
    kshamaa sahit.
    Satyendra

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  46. आपका संस्मरण मोहक लगा,वास्तव में पहली सफलता की ख़ुशी कभी दुबारा अपनी बराबरी किसी ख़ुशी को बही करने देती है..बचपन होता ही ऐसा कि उसकी यादों में खो जाने का जी चाहता है.

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  47. vandanajee aaj apane blog par aapkee tipannee padkar accha laga .

    मेरी मम्मी अक्सर कहतीं, कि "अव्वल तो इस घर में चोर आयेगा ही नहीं, और यदि आया तो सिर पीट लेगा क्योंकि उसे किताबों के अलावा कुछ मिलेगा ही नहीं."

    ye hee shavd meree betiyaon ke hai..................

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  48. आज जब लोगों में पढने कि आदत लगभग ख़त्म होते देखती हूँ, तो बहुत तक़लीफ़ होती है. बच्चों में तो ये आदत अब न के बराबर रह गई है. अधिक से अधिक कॉमिक्स, बस. हांलांकि दोष बच्चों का नहीं है. उन के सिर पर पढ़ाई का इतना बोझ है, कि उसे पूरा करने के बाद कुछ और पढने कि इच्छा ही नहीं रह जाती होगी. ये अलग बात है कि बच्चे छुट्टियों में भी कुछ पढ़ने का मन नहीं बनाते.

    Sach hai!
    Sansmaran behad achha laga..kab padh gayi pata na chala!
    Ramnavmiki anek shubhechhayen!

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  49. डायरी मेरा तो ब्लाग ही मेरी डायरी हॆ..हा आज भी जब पुराने लेख पडता हू तो सच मे बहुत खुशी होती हे..

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  50. shauk ke liye padhna to jaise ek ANTIQUE cheez ho gayi hai.. takleef to hoti hai...

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  51. vandana ji

    deri se aane ke liye maafi ....

    purane din aur specially bachpan ke din apne app me itne yaadgaar rahte hai ki unke saamne baaki sab kuch naganya hai .. aapne bahut accha likha .. us waqt me likhi gayi baato ka asar kabhi kabhi zindagi bhar bhi rahta hai ....

    badhayi sweekar kijiye ..

    aabhar

    vijay
    - pls read my new poem at my blog -www.poemsofvijay.blogspot.com

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  52. वंदना,
    तुम्हारा लिखा हमेशा ही मुझे अच्छा लगता रहा है. आज भी जब तुम्हारे ब्लॉग पर आया कई सुखद अनुभूतियाँ हुईं. तुम्हारे संस्मरणों में जीवन की सच्चाई है, जिसे पता नहीं क्यों आज लोग याद करने की कोशिश भी नहीं करते. बदलाव सभी मोर्चों पर हुआ है, लेकिन बदलाव की आहट-मात्र से हम अपने अतीत के उन पलों को को बिसार नहीं सकते, जिनके चलते आज हम हैं, हमारा वजूद है. मैं गाँव में, गाँव का होकर कभी रहा नहीं, लेकिन बड़े भैया की पोस्टिंग अक्सर ब्लोक में रहती थी. लिहाज़ा मैं अक्सर स्कूल की होने वाली छुट्टियों में वहां जाकर रहा करता था. वहां के गाँव की पगडंडियाँ , हरे-भरे खेत, और खासकर वहां की रातें मुझे बहुत प्रिय थीं. आकाश बिलकुल साफ और धुला हुआ नज़र आता था और उसमें भी यदि चाँद हुआ तो वो भी बिलकुल शफ्फाफ. मेरी आरम्भिक दिनों की कई कवितायेँ उन्ही क्षणों की देन हैं, हालाँकि बहुत बाद में उन्हें बचकाना मानकर मैंने नष्ट कर दिया. तुम्हारा ये संस्मरण मुझे थोड़ी देर के लिए ही सही, मुझे उन्ही दिनों में खींच ले गया.

    इधर अरसे से तुम्हारी कहानियाँ पढ़ने को नहीं मिलीं, लेकिन एक कहानी मुझे आज भी याद है, 'हवा बदहवास है'. ये पहली बार आकाशवाणी, रीवा से प्रसारित हुई थी. युवा पीढ़ी को लेकर लिखी गयी ये कहानी मुझे आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती है, जितनी तब थी.

    उत्तर देंहटाएं
  53. वंदना,
    तुम्हारा लिखा हमेशा ही मुझे अच्छा लगता रहा है. आज भी जब तुम्हारे ब्लॉग पर आया कई सुखद अनुभूतियाँ हुईं. तुम्हारे संस्मरणों में जीवन की सच्चाई है, जिसे पता नहीं क्यों आज लोग याद करने की कोशिश भी नहीं करते. बदलाव सभी मोर्चों पर हुआ है, लेकिन बदलाव की आहट-मात्र से हम अपने अतीत के उन पलों को को बिसार नहीं सकते, जिनके चलते आज हम हैं, हमारा वजूद है. मैं गाँव में, गाँव का होकर कभी रहा नहीं, लेकिन बड़े भैया की पोस्टिंग अक्सर ब्लोक में रहती थी. लिहाज़ा मैं अक्सर स्कूल की होने वाली छुट्टियों में वहां जाकर रहा करता था. वहां के गाँव की पगडंडियाँ , हरे-भरे खेत, और खासकर वहां की रातें मुझे बहुत प्रिय थीं. आकाश बिलकुल साफ और धुला हुआ नज़र आता था और उसमें भी यदि चाँद हुआ तो वो भी बिलकुल शफ्फाफ. मेरी आरम्भिक दिनों की कई कवितायेँ उन्ही क्षणों की देन हैं, हालाँकि बहुत बाद में उन्हें बचकाना मानकर मैंने नष्ट कर दिया. तुम्हारा ये संस्मरण मुझे थोड़ी देर के लिए ही सही, मुझे उन्ही दिनों में खींच ले गया.

    इधर अरसे से तुम्हारी कहानियाँ पढ़ने को नहीं मिलीं, लेकिन एक कहानी मुझे आज भी याद है, 'हवा बदहवास है'. ये पहली बार आकाशवाणी, रीवा से प्रसारित हुई थी. युवा पीढ़ी को लेकर लिखी गयी ये कहानी मुझे आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती है, जितनी तब थी.

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