गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

वे सीलोन के दिन, उर्दू सर्विस की रातें......


ब्रॉडकास्ट
कुछ दिन हुए, आकाशवाणी रीवा से तनुजा दी का फोन आया कि तुम्हारा फीचर रि- ब्रॉडकास्ट हो रहा है सुन लो. दरअसल एडिटिंग के बाद मैं अपने इस फीचर को सुन ही नहीं पाई थी. पहली बार जब प्रसारित हुआ तब भी नहीं सुन पाई थी. लेकिन हाय री किस्मत!! आज लाईट नहीं थी. और घर में ट्रांजिस्टर अब रहा नहीं.मन मसोस के रह गई. आमतौर पर मैं अपनी कोई भी रेकॉर्डिंग नहीं सुन पाती. संयोग ही कुछ ऐसा होता है. लेकिन आज इस रूपक को सुनना चाह रही थी जिसे मैंने बहुत मेहनत और लगन से तैयार किया था,आखिर मामला बाल-विवाह से जुड़ा था. लेकिन सुनती कैसे, ट्रांजिस्टर जो नहीं था...........
बड़ी शिद्दत से याद आने लगे ट्रांजिस्टर के दिन....यानी रेडियो के दिन....क्या खूब दिन थे वे भी....
पहले हमारे यहाँ एक बहुत भारी -भरकम सा बिजली से चलने वाला रेडियो हुआ करता था. इस रेडियो के साथ एक बड़ी सी बैटरी भी लगी थी. रेडियो के ऊपर बाक़ायदा स्टेशनों के नाम लिखे थे, जिनमें से मुझे केवल "सीलोन" लिखा हुआ याद रह गया है. तब मैं बहुत छोटी थी. रेडियो होने का मतलब ही नहीं समझती थी. लेकिन जब ट्रांजिस्टर आया तब मैं उसका महत्त्व समझने लगी थी, कुछ इस तरह कि जिनके यहाँ रेडियो, ट्रांजिस्टर, या टेप रिकॉर्डर होता है वे अन्य लोगों कि तुलना में विशिष्ट होते हैं.
तो जिस दिन हमारे यहाँ ट्रांजिस्टर आया, घर के सारे सदस्य उसे घेर के बैठ गए. ये बुश का ट्रांजिस्टर था. दायें-बाएं दोनों तरफ दो घिर्रियाँ सी लगी हुईं, जिनसे तमाम स्टेशन बदले जा सकते थे, आवाज़ बढ़ाई घटाई जा सकती थी. सबसे सुखद ये कि उसे कहीं भी ले जाया जा सकता था. लाईट होने या न होने का भी कोई चक्कर नहीं था.
उसी शाम अपनी मित्र मण्डली में मैं अपने गुलाब के फूलों वाली फ्रॉक की जेबों में हाथ डाले , घमंड से इतराती घूम रही थी. आखिर हमारे घर ट्रांजिस्टर था!! मैं उन्हें सुई घुमा-घुमा के और वॉल्यूम बढ़ा-बढ़ा के दिखा रही थी. मुकेश और गुड्डो, दोनों हसरत भरी निगाहों से देख रहे थे, मेरे ट्रांजिस्टर की ओर.
अब सुबह की शुरुआत ट्रांजिस्टर से होती. रेडियो सीलोन के "मसीही वंदना " से शुरू होने वाली सभा, ऑल इंडिया रेडियो की उर्दू सर्विस के फरमाइशी प्रोग्राम के बाद ही ख़त्म होती.
ट्रांजिस्टर पर हमारे घर में दो लोगों का ही कब्ज़ा था, मेरे पापा और मेरी बड़ी दीदी. पापा तो केवल समाचार सुनने के लिए ही ट्रांजिस्टर लेते थे लेकिन दीदी का तो हर काम उसी के साथ होता था. होम वर्क कर रहीं हैं तो, किचन में हैं तो, यहाँ तक की रात में उनके चादर या रजाई, जो भी ओढ़े होतीं, उसके नीचे ट्रांजिस्टर पर पहले उर्दू सर्विस का फरमाइशी कार्यक्रम और उसके ठीक बाद रेडियो पकिस्तान से प्रसारित होने वाला फरमाइशी कार्यक्रम चल रहा होता.
मेंहदी हसन, रूना लैला, नाहिद अख्तर इनके जो गीत उस वक्त रेडियो पर आते थे, मुझे आज भी याद हैं.
उस वक्त का रेडियो सीलोन बाद में श्रीलंका ब्रॉड कास्टिंग कॉर्पोरेशन हो गया. लेकिन प्रोग्राम वही रहे. लोकप्रिय कार्यक्रम बिनाका गीत-माला........ अमीन सयानी की असरदार आवाज़......दीवाने थे सब इस कार्यक्रम के. लेकिन मेरी हैसियत तब केवल इतनी थी, कि बड़ी दीदी ट्रांजिस्टर का वॉल्यूम बढ़ा के मुझे सामने के मैदान में दौड़ा देतीं थीं ये जानने के लिए कि हमारे ट्रांजिस्टर की आवाज़ कहाँ तक आ रही है!! विविध भारती से प्रसारित होने वाला हवा महल...शेख चिल्ली के कई नाटक , धुंधले से याद हैं मुझे, तब नाटक समझने की उम्र नहीं थी मेरी, लिहाजा सुनते समय जो भाव दीदी के चेहरे पर आते, मैं भी सप्रयास उन्हीं भावों को अपने चेहरे पर लाती.
बड़े भाई-बहनों का कितना अनुगमन करते थे हम!! दीदी ने कहा, तो सच ही कहा होगा, ये सोचने की ज़रुरत ही नहीं रहती थी कि सही है या गलत. ऊंची आवाज़ में बात करना तो बहुत दूर की बात थी. दीदी ने अभी पढने को कहा है तो क्या मजाल कि हम दिए गए समय से पहले उठ जाएँ! कितना प्रेम और लिहाज था बड़े भाई-बहनों के लिए. विश्वास तो था ही. मम्मी-पापा से कहीं ज्यादा रुतबा दीदी का था. और हम पूरा सम्मान देते थे उनके इस रुतबे को ( आज भी देते हैं ).
आज जब भाई -बहनों के बीच घटता प्यार देखती हूँ तो बहुत तकलीफ होती है. समय के साथ-साथ भाई-बहन के रिश्ते भी बदलते जा रहे हैं. प्रेम कि जगह औपचारिकता ने ले ली है. सब के लिए नहीं कह रही, लेकिन अधिसंख्य रिश्ते अब औपचारिक ही हो गए हैं. बड़े-छोटे का भेद तो कब का ख़त्म सा हो गया है.
बदलाव समय कि मांग है, प्रगति का सूचक भी , लेकिन रिश्ते बदलाव चाहते हैं क्या?

80 टिप्‍पणियां:

  1. Mujhe apna bachpan yaad dila diya!Aur mai khud apne prasaran, katha kathan, sakshatkar, kabhi nahi sun payi...wajah chahe jo rahi ho!

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  2. ट्रांजिस्टर, सीलोन, बिनाका गीतमाला, अमिन सायानी --आपने तो बचपन की याद दिला दी।
    सच कितना मज़ा आता था , वो रफ़ी, लता और किशोर के गाने सुनकर ।
    अब तो गानों के नाम पर बस शोर सुनाई देता है।

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  3. dr.t s daral ji meri man ki baat kah gaye sach kaha khwab ban rah gaya wo din ,aap aesi yaadon ko badi sundarata se shabdo me utarati hai ,bahut hi pyara lekh .

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  4. शुरू से हँसते हुए पढ रहा था ....सोच रहा था कि टिप्‍पणी में सिर्फ हा हा लिखूँगा लेकिन अंत तक पहुंचते पहुंचते कहानी कुछ और ही हो गई ...एकदम से यू टर्न मार दिया :)

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  5. सही कहा आपने वंदना जी, ज़माना बदल गया है! वो दिन वापिस नहीं आयेंगे!
    कोई मुझे मेरा बचपन लौटा दे तो कितना अच्छा होगा!

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  6. वंदना ,कितनी आसानी से bachpan ki याद दिला देती हो और फिर कई दिन तक हम उन्हीं गलियों में घुमते रह जाते
    हैं अपनी ये सहजता हमेशा बनाये रखना .
    और ant में जो संबंधों के दरकने की बात आई तो लेख ने अलग ही शक्ल ले ली ,वाह

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  7. Vandana ji really great. When i was a small boy, my father had a transistor. We would enjoy Bibid Bharati, AIR Urdu service, radio ceylone. Ah, Amin sayani's voice was really forceful and dulcet. Then our local station. I grew up and passed matriculation. Then i had a radio of my own. Yes my own. Then my journey began. It was my friend as i would walk, sleep and eat with that. I was a regular listener of BBC News hour, BBC hindi service, voice of america. My tilt was towards english programs. I would listen news first in english, then in Hindi and the spot light.

    Really that was the day. In the bbc world service at that time there was a program Professor Grammar, Jolly good show, short short stories of which i was a regular listener. BBC and Voice of america would send their six monthly program guide to me and i would stick them on my wall infront of the study table.

    Really, those were the days that i would never forget but as time changes, tv took its place. Now for song i have got cell phone, look what a change has gone in the meanwhile. Now i have also no radio and my son or daughter would not know about radio.


    You just helped me momorise my days of radio.

    The post is really good. thanks Vandana Ji.

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  8. महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें!

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  9. महा शिव रात्रि की शुभ कामनायें..... पढ कर ही ट्टिपणी करूँगा.... आलेख के साथ ट्टिपणी पढ पाता, तो इस तरह खानापूर्ति ना करनी पङती. साधक

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  10. बदलाव समय कि मांग है, प्रगति का सूचक भी , लेकिन रिश्ते बदलाव चाहते हैं क्या?'
    बदलाव समय की मांग है पर रिश्तों में बदलाव कष्टदायी है.
    सुन्दर

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  11. तार-तार सम्बन्ध हैं, हर मानव है त्रस्त.
    भाव खो गये धन-पद में, पति-पत्नी सब व्यस्त.
    पति-पत्नी भी व्यस्त, हुये माँ-बाप पराये.
    छोटे बच्चे पूछ रहे, क्या ’अपने-पराये?’
    कह साधक बदला-बदला है, अब जीवन का छन्द.
    हर मानव अतृप्त, हो गये तार-तार सम्बन्ध.
    sahiasha.wordpress.com

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  12. वंदना जी, क्या याद दिलाई आपने...आह..हम तो अभी भी यादों की उन गलियों में ही भटक रहें हैं.क्या दिन थे वे भी....मेरा हाल बिलकुल,आपकी दीदी जैसा था और मैथ्स बिना गाना सुने कैसे हल हो सकता है..:)..मेरी कोई छोटी बहन नहीं थी,वरना मैं भी उसे ऐसे ही दौडाती...छोटे भाई हैं पर वे कहाँ रौब जमाने देते हैं....मजा आ गया ये संस्मरण पढ़...वो बिनाका गीतमाला का सालाना प्रोग्राम और अमीन सायनी जब अपनी लरजती आवाज़ में कहते और पहली पायदान पे है....तो हमारी सांस एक पल को रुक जाती.
    और आप अपना प्रोग्राम क्यूँ नहीं सुन पातीं,भला??...मैंने भी जब आकाशवाणी ज्वाइन किया तब एक ट्रांजिस्टर खरीद लिया...(बच्चे भले ही चिढाते हैं कि ममी आजकल सिर्फ वाचमैन ही ट्रांजिस्टर सुनते हैं..पर हम परवाह थोड़े ही ना करते हैं :)

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  13. बेहद सुंदर, पुरानी यादों को ताजा करती हुई पोस्ट.

    रामराम.

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  14. वंदना जी, आदाब
    सच कहा है आपने.
    टीवी आने के बाद ट्रांजिस्टर तो अब बीते ज़माने की बात होकर रह गये हैं. कुछ जगह क्रिकेट की कमेंट्री के लिये पयते मिल जायें, तो अलग बात हैं. म्यूजिक के नाम पर एफ़एम का परचम लहरा रहा है.

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  15. हमारे यहाँ भी बुश का ही ट्रांसिस्टर था..... आज भी है.... बड़ा सा... बिलकुल वैसा ही है ...जैसा आपने बताया है..... पुरानी यादें ताज़ा हो गई हैं.... रूना लैला ....यह नाम तो मैं भूल ही गया था....आज आपने याद दिला दिया..... इस नाम को याद कर के रोना भी आ गया... वो इसलिए...क्यूंकि मेरी मम्मी रूना लैला की बहुत बड़ी फैन थीं..... रूना के बहाने मम्मी याद गयीं.....

    बड़ी दीदी ट्रांजिस्टर का वॉल्यूम बढ़ा के मुझे सामने के मैदान में दौड़ा देतीं थीं ये जानने के लिए कि....... कुछ ऐसा ही हमारे यहाँ भी होता था....पर यह काम मेरी मम्मी करतीं थीं.... मम्मी मुझे एक रुपया भी देतीं थीं यह काम करने के लिए.... और मैं भी दौड़ा दौड़ा जाता था.... पापा मेरे मम्मी से कहते थे..... कि दो बच्चों की माँ हो.... बचपना कब छोडोगी... ? वैसे जब मेरी मम्मी की जब डेथ हुई तो वो आज जो मेरी उम्र है.... उसी उम्र की थीं.... और मैं १२/१३ साल का था....

    एक बार की बात और आपको बता रहा हूँ... दी...

    बात शिमला की है... पापा शिमला में पोस्टेड थे... मैं कोई ५ साल का था... पापा कैप्टन थे उस वक़्त ...आर्मी में.... शिमला में नाशपाती और सेब के बगीचे बहुत थे.... और वहां लंगूर बन्दर बहुत पाए जाते हैं... एक बार सुबह सुबह मैं और मम्मी टहलने के लिए निकले .... तो हम लोग उन्ही बागों में टहल रहे थे.... तभी मैं और मम्मी ऐसे ही दौड़ने लगे.... सामने एक पेड़ से रस्सी लटक रही थी.... मम्मी उसी रस्सी को पकड़ कर झूल गयीं.... और फिर सीधा हॉस्पिटल में आँख खुलीं उनकी.... हुआ यह था कि वो रस्सी नहीं ...लंगूर की पूँछ थी.... और लंगूर ने हम दोनों माँ बेटे को बहुत मारा.... मैं तो डर के किसी तरह भाग के आ गया..... और सबको बताया... तो सब लोग भाग के गए.... और देखा की मम्मी बेहोश पड़ीं हैं.... हम लोग यह बात याद कर कर के बहुत हँसते थे..... पर अब यह बात याद कर के रोना आता है.... मेरा साथ मेरी माँ के साथ बहुत कम रहा ....पर मैं उन्हें बहुत प्यार करता था.... करता हूँ और करता रहूँगा.... पता नहीं क्यूँ अच्छी चीज़ें क्यूँ हमसे जल्दी दूर हो जातीं हैं.... ? उफ़! इस वक़्त मेरे आंसू निकल आये हैं....

    मैं आता हूँ अभी .... खुद को कण्ट्रोल नहीं कर पा रहा हूँ....आपकी इस पोस्ट के बहाने मम्मी भी याद गयीं..... बहुत अच्छी लगी यह पोस्ट....


    मैं बाहर गया हुआ था...इसलिए देरी से आया.... माफ़ी चाहता हूँ.....

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  16. haan hamaare ghar me bhi ek aisa hi radio hua karta tha. 12 volt ki battery se chalta tha. un dino hamaare yahan bijlee nahee thi to radio chalaane ke liye shirt thi ki main lalten saaf karun. Budhwar ki shaam ko ghar me mahfil jamti binaka geet maala sunne vaalon ki. sab kuchh kitna sundar thaa. log subah charchaa karte ki ameen saahab ne is gaane ko doosri paaydaan par rakh kar achchha nahin kiyaa to tapaak se koi uttar deta ki unhe pataa thaa ki tumhari pasand kitni kharaab he isiliye voh gaana ek number par nahin aa paayaa. Aapne to dher saare kahaani kisse yaad dilaa diye. vaapas bachpan ke dino me, kuchh kshan ke liye hi sahi, bhejne ke liye dhanyvaad.
    Rishte kaise badal rahe he meri samajhh se baahar he. is par to koi tippni na karun vahi behtar he.
    agle lekh ka intjaar rahega.

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  17. बड़ी सुखद यादें ताजी कर गया आपका संस्मरण.. रेडियो सीलोन . और आल इण्डिया रेडियो की उर्दू सर्विस अपने समय के 'मील का पत्थर कहे जा सकते हैं .मूल्यों में परिवर्तन की पीड़ा कचोटती तो है ही ,पर परिवर्तन का होना अपरिहार्य प्रक्रिया है . जिसे सहन करना ही मानव की नियति है. .

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  18. महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें!
    बहुत बढ़िया लगा ! बधाई!

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  19. ०-धन्यवाद सुमन जी.
    ०-धन्यवाद क्षमा जे.
    ०-धन्यवाद दराल साहब. सच है संगीत के नाम पर अब शोर ही सुनाई देता है.
    ०- धन्यवाद ज्योति जी.
    ०- धन्यवाद शास्त्री जी.
    ०- धन्यवाद अर्कजेश जी.
    ०- धन्यवाद अरुणा जी.
    ०- धन्यवाद इस्मत जी.
    ०- धन्यवाद सुदाम जी.
    ०- धन्यवाद संजय जी.
    ०- धन्यवाद साधक जी.
    ०- ध्न्यवाद वर्मा जी.
    ०- धन्यवाद अजित जी.
    ०- धन्यवाद रश्मि जी.
    ०- धन्यवाद ताऊ जी.
    ०- धन्यवाद शाहिद जी.
    ०- महफ़ूज़ भाई, आपको दुखी कर दिया, माफ़ी चाहती हूं.
    ०- धन्यवाद सत्येन्द्र जी.
    ०- धन्यवाद आदित्य जी.
    ०-

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  20. आपकी पोस्ट से सचमुच हम तो बचपन की सैर कर आये और कमेन्ट पढ़ कर बी बी सी की भी सैर हो गयी. हम तो बी बी सी खास कर ईला अरुण की बहन रमा पाण्डेय जो तब वहां न्यूज़ रीडर थी उनकी न्यूज़ व आवाज़ के लिए सुना करते थे

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  21. रेडियो सिलोन .... बिनाका गीत माला फिर सिबाका गीत माला .... आपकी फरमाइश ,... झुमरीतलैया ..... बहुत से गहरे एहसास, बचपन की यादें .... बड़े बड़े रेडियो, बुश का ट्रान्सिस्टर (मैने बुश कंपनी में ६ महीने काम किया था) ... बहुत देर तक खामोश बैठने का दिल कर आया आपकी पोस्ट पढ़ कर ......

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  22. वंदना जी, यह कहानी लगता है हम सब की है जो इस उम्र के लोग है, आप के लेख को पढ कर ऎसा ही लगा, बस फ़र्क इतना है कि मै आपने को आप की दीदी की जगह पाता हुं ओर छोटे भाई को आप की जगह कि भागो ओर देखो आवाज कहा तक जाती है, वो सारे गीत, वो सारे प्रोगराम आज भी दिल मै बसे है, आप का धन्यवाद इस अति सुंदर लेख के लिये

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  23. पुराने दिनो को याद कराने के लिये बहुत बहुत धन्यवाद वन्दना जी. वो कागज़ की कस्ती वो ...... उन दिनो अल सुबह रेडियो, रेडियो नेपाल के शिव गीत से आरम्भ होता था जो बी बी सी लन्दन हिन्दी सर्विस, रेडियो डायच वैले जर्मनी और देर रात विविध भारती के गीतो से खत्म होता था. बी बी सी लन्दन हिन्दी सर्विस से जब श्रोताओ के लिये ग्रीटिंस आते थे तो उसे हम बताते ही नही थे जताते भी थे. हा हा हा...वो भी क्या दिन थे.

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  24. Ameen Sayani ji ka naam to maine MSc me aake suna.. yani bahut late.. tab pata chala ki itni naamcheen shakhshiyat hain ye...
    sundar sansmaran

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  25. प्रेम कि जगह औपचारिकता ने ले ली है. सब के लिए नहीं कह रही, लेकिन अधिसंख्य रिश्ते अब औपचारिक ही हो गए हैं. बड़े-छोटे का भेद तो कब का ख़त्म सा हो गया है.
    ______________________________
    Bahut sahi likha apne, par iske liye bhi to ham hi jimmedar hain.

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  26. रिश्तों में जब केवल औपचारिकता रह जाती है तो वे केवल वहाँ संबंध ही रह जाते हैं. आपसी प्यार और आदर होना जो ज़रूरी था अब वो बहुत कहीं पीछे छूटता जा रहा है.

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  27. रेडियों की बात कुछ और है. रेडियो स्वछंद पक्षी का सा है आज भी. जितनी विविधता इस माध्यम में है वह कहीं और कहां. यही कारण है कि ये आज भी जीवित ही नहीं है विकास भी कर रहा है...( भले ही कुछ उथले उद्घोषक इसके रास्ते का रोड़ा हों )

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  28. ०- धन्यवाद रचना जी.
    ०- दिगम्बर जी.
    ०- राज जी.
    ०- संजीव जी.
    ०- दीपक जी.
    ०- आकांक्षा जी.
    ०- अनिलकान्त जी.
    ०- काजलकुमार जी.

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  29. वाह वंदना जी , उन दिनों की तो बात ही और थी और उन दिनों की याद में आपकी लिखी इस पोस्ट के लिए सिर्फ़ इतना ही कहूं कि मेरे द्वारा पढे गए इस साल के सबसे सुंदर कुछ पोस्टों में से एक

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  30. बड़ी ही दिलचस्प और हृदय से लिखी गयी पोस्ट। हमारा फिलिप्स का नन्हा ट्रांजिस्टर तो हमेशा हमारे झोले का हिस्सा बना रहता है मैम। हम फौजियों के लिये इस ट्रांजिस्टर से बड़ा साथी और कोई नहीं है।

    कुछ टिप्पणियां बड़ी रोचक हैं और आपकी प्रतिटिप्पणी भी... :-)

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  31. ०- अजय जी इतनी तारीफ़? कुछ ज़्यादा नहीं लग रही? वैसे हम तो खुश हुए ही तारीफ़ पढ के, बहुत-बहुत धन्यवाद.
    ०- धन्यवाद गौतम जी. टिप्पणियां यदि दिल से की जातीं हैं तो वे इसी प्रकार रोचक हो जाती हैं. कई बार तो पोस्ट से भी ज़्यादा रोचक.

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  32. रेडियो सीलोन तो हमारे घर में बुधवार रात आठ बजे बिनाका गीत माला सुनने के लिए ही सुना जाता था और उस ट्यून करने के लिए आधे घंटे पहले से ही मशक्कत शुरु कर दी जाती थी। वहीं रेडियो पाकिस्तान हम शारजाह से आने वाली कमेंट्री और ग़ज़लों को सुनने के लिए लगाते थे।

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  33. पुराने दिनों को याद दिलाने के लिए आभारी हूँ !
    शुभकामनायें !

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  34. प्रगति और विकास। मुझे लगता है ये दो शब्‍द पिछली सदी के सबसे भ्रामक शब्‍द रहे हैं। गंभीरता से सोचें इस विषय पर, फिर सोचें, फिर सोचें। इन दो शब्‍दों के पीछे भागते हुए हम जहॉं आ पहुँचे हैं उसने एक नैसर्गिक व्‍यवस्‍था को कहॉं पहुँचा दिया है इसका एहसास अभी शायद न हो लेकिन वो दिन अधिक दूर नहीं है जब हमें पीछे मुड़कर देखना ही होगा कि हम जहॉं थे वहॉं से कहॉं पहुँच गये इस स्‍वर्णमृग का पीछा करते हुए। वस्‍तुत: ये प्रगति और विकास मारीचि के मृग हैं जो दखिते कुछ और हैं औश्र होते कुछ और। प्रश्‍न केवल परस्‍पर संबंधों तक सीमित न रहकर, संपूर्ण निसर्ग से जुड़ा हुआ है।
    आपने सरल शब्‍दों में बात कह कर चिंतन को प्रस्‍फुटित किया है और यही शायद सार्थक लेखन है।
    साधुवाद।

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  35. आज ही यह रचना पड़ी...और आँखें भीग गयीं...यह आंसू ख़ुशी के भी हैं कि चलो मुद्दत के बाद कोई आवाज़ की दुनिया में अपना सा मिला...और उदासी के भी के अब कहाँ गए वे दिन.....!

    कुल मिलाकर इतनी अच्छी रचना के लिए बधाई हो...आप ने तो शब्दों में ही पूरे का पूरा नक्शा खींच दिया..उन दिनों का...!

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  36. सबसे पहले तो आपको आकाशवाणी में फीचर प्रसारण की बधाई ......जानकर खुशी हूँ आप आकाशवाणी में भी प्रोग्राम देती हैं .....उस रिकार्डिंग को कभी ब्लॉग पे भी सुनाइए .....रेडियो के दिनों की खूब चर्चा की आपने ....बहुत बढ़िया लिखती हैं आप ......!!

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  37. सुंदर पोस्ट.
    ..हमारे घर में भी एक फिलिप्स का चार बैंड का ट्रांजिस्टर था ..लेकिन सच तो यह है कि पिताजी के ऑफिस जाने के बाद हम ५ भाइयों में उसके लिए पर्याप्त जंग होती थी..सबसे छोटा होने के कारण मेरे हाथ अंत में लगता था. हाँ, क्रिकेट की कमेंट्री सब चाव से सुनते थे!.. पिताजी तो बस समाचार..
    वो भी क्या दिन थे..आपने बहुत कुछ याद दिला दिया.

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  38. vanadna ji bahut sateek sawal hai
    ki badlaawa kya waqayi rishte mein zaruri hai
    bahut tezi se ghat rahi hai aatmiyata......

    bachpan aur radio .... purane din
    achcha laga padhna

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  39. ०- धन्यवाद मनीष जी. बिनाका गीतमाला के आखिरी पायदान पर आने वाले गाने यानि सरताज़ गीत के आन के ठीक पहले पौने बजे मेरे पापा रेडियो मांग लेते थे. दीदी को कई बार प्रसाद बोलते सुना है मैने, कि हे भगवान यदि आज पापा जी रेडियो न मांगें तो हम प्रसाद चढायेंगे..

    ०- धन्यवाद सतीश जी.
    ०-अतिशय प्रशंसा के लिये धन्यवाद कपूर साहब.
    ०- मुझे भी बहुत खुशी हुई कथूरिया जी.
    ०- धन्यवाद हरकीरत जी. पहले विभागीय और अब केवल कलाकार के रूप में जुडी हूं आकाशवाणी से. लेकिन बहुत याद आते हैं वे दिन.
    ०- धन्यवाद देवेन्द्र जी. मेरे पापा तो अभी भी खबरें रेडियो पर ही सुनते हैं. उनका ट्रान्जिस्टर हमेशा उनके साथ रहता है.
    ०- धन्यवाद श्रद्धा जी.

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  40. ...सबसे सुखद ये कि उसे कहीं भी ले जाया जा सकता था. लाईट होने या न होने का भी कोई चक्कर नहीं था....
    .....बिलकुल सच कहा.....पुरानी यादों मे ले जाने के लिये शुक्रिया.... प्रभावशाली अभिव्यक्ति !!

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  41. संस्मरण पढ़ कर आनंद आ गया.
    पुराने दिनों की बातें.
    बुश का रेडियो और मर्फी का भी ये दो ब्रांड बहुत ही प्रसिद्द थे.
    मेरे मायके में अभी भी है मम्मी को उनकी शादी में मिला था..
    सुबह ६ बजे वंदना कार्यक्रम से शुरू हो कर धीमा धीमा बजने लगता था.
    रेडियो पर मेरा कब्ज़ा सबसे ज्यादा रहता था लेकिन सब के घर में होते चेनल बदलने की अनुमति नहीं थी'
    तो अकेले में खूब चेनल छेड़े जाते थे..एक दिन मैं ने यह देखने के लिए रेडियो पीछे से खोल दिया कि इस में पीछे कोई बैठा होता है क्या?..आवाज़ कहाँ से आती है?बिजली का जोरदार झटका भी लगा ..डर गयी ..लेकिन मन में उत्सुकता बनी रही जब तक सही अकल नहीं आ गयी.समय बदला और पहला दिन आकाशवाणी में जा कर सब खुद से देखना और पहली रेकॉर्डिंग का अनुभव तो भूलाये नहीं भूलता .क्या क्या याद दिला दिया आप ने!
    -------------
    -रिश्तों में आते बदलाव प्रगति का ?? नहीं... बदलते समय का सूचक हैं,

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  42. silon ke gane achhe hua karate thae ham rat bhar jag kar suna karte thae aaj bhe yo gane sunaye padate hai to man jhom jaata hai

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  43. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  44. आज इस पोस्ट को पढ़ पाया। महाशिवरात्रि पर्व के निकल जाने का अफ़सोस हो रहा है। पहले पढ़े होते तो उसकी बधाई ही दे देते।

    सुन्दर पोस्ट है। हमारे यहां तो कभी रेडियो/ट्रांजिस्टर भी नहीं आ पाया। पड़ोसियों के यहां के रेडियो/ट्रांजिस्टर सुनते थे। हमें याद है वेस्ट इंडीज में हुये कई मैच की कमेंट्री मैंने अपने एक पडो़सी अंकल के रेडियो पर उनको सुबह पांच-छह बजे जगाकर रेडियो लगवाकर सुने।

    लेख में कहानी का छटा सी है।लिहाजा सुनते समय जो भाव दीदी के चेहरे पर आते, मैं भी सप्रयास उन्हीं भावों को अपने चेहरे पर लाती. एक बोलता हुआ शब्द चित्र सा है

    रेडियो से शुरू करके मामला रिश्तों पर लाकर पटक दिया। जय हो।

    सुन्दर पोस्ट बधाई!

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  45. vandanaji ,,,,bahut dhanyavaad..
    aapne bachpan ke din aur wo tamaam qisse yaad dilva diye jo is nanhe-se transistor ke sath jude hue haiN
    vivid-bharti par vigyaapan prasaarn sewa shuru hui to gaano ke beech un dhuno ko sun`ne ke liye hi khushu hoti...
    urdu service ka taamil-e-irshaad to aaj bhi maiN koshish kr ke sun hi letaa hooN....radio Ceylone pr ek programme 'anokhe-bol' bhi hua karta tha...aur bhi jaane kya kuchh
    aur isi lekh ke maadhyam se aapne kuchh shistaachaar aur hamari sanskriti ki baateiN bhi kar daaleeN...jo lagta hai dhire-dhire bs yaad kar lene ki baateiN hi reh gayi haiN...
    aabhaar .

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  46. खूबसूरत संस्मरण..बस यादें ही रह जाती हैं.


    ........................
    "शब्द-शिखर" पर इस बार अंडमान के आमों का आनंद लें.

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  47. aapke saath saath bahut see beeten baaten yaad aa gaee...net par aana zara kam ho pata hai...iseelie der ho gaeee..

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  48. आप ने तो जीवन का एक पूरा कल खंड ही जीवंत कर दिया -शुक्रिया

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  49. 0- धन्यवाद श्याम जी
    ०- धन्यवाद अल्पना जी. मेरी मम्मी सेवानिवृत शिक्षिका हैं, उनकी सुबह की सारी तैयारियां भी रेडियो के साथ ही होतीं थीं, क्योंकि सुबह वंदना के बाद सारे कार्यक्रम ५-५ मिनट के होते थे. लिहाजा उन्हें घडी नहीं देखनी पडती थी.
    ०- धन्यवाद संजय जी.
    ०-धन्यवाद मानव विकास आध्यात्म और विकास
    ०- कोई बात नहीं अनूप जी. आप आये यही क्या कम है? किसी न किसी बहाने से मौज ले ही लेते हैं आप.
    ०- मुफ़लिस साहब, तामील-ए-इरशाद कार्यक्रम और उसके प्रस्तोताओं की खूबसूरत आवाज़...कभी न भूलने वाले दिन हैं ..धन्यवाद
    ०-धन्यवाद आकांक्षा जी. हम ज़रूर अन्डमान आयेंगे. और जब आयेंगे, तब आम तो खिलायेंगी ही न आप?
    ०-जी हां शेफाली जी. मुझे शिकायत है आपके देर से आने पर.
    ०-धन्यवाद अरविंद जी.

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  50. danyavad vandana jee aap ne mera blog dekha aap tipani de mera nam akhilesh pal hai mere profile par sari jaan kaari hai

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  51. खूबसूरत यादों का खजाना, जिसे पढ़ने के लिये मैं देर से पहुंची क्षमा चाहूंगी, बधाई ।

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  52. अतीत की अपनी एक सुन्दरता होती है..यादों में बस कर हमेशा मोहक ही लगता है..हो सकता है जब अतीत वर्तमान के रूप में जिया जा रहा हो उतना मोहक न हो पर अतीत बन जाने के बाद उन अहसासों की खूब सूरती बढ़ जाती है..क्योंकि अतीत के कडवे हिस्से दिमाग डिलीट कर देता है...सीलोन विविध भारती बी बी सी..और ट्रांजिस्टर ...इससे मोहक शाद ही कुछ रहा हो..टी वी आया तो धीरे धीरे यह कब हाथो से फिसल कर तहखाने में चला गया पता ही नहीं चला....!
    बेहतरीन प्रस्तुति!

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  53. आप ने तो पुराने दिन याद करा दिये । जो अब चाह कर भी आ नही सकते ।

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  54. ०- धन्यवाद अखिलेश जी.
    ०- धन्यवाद सदा जी.
    ०- प्रकाश जी
    ०- धन्यवाद अन्जना जी.
    ०- धन्यवाद कविता जी.

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  55. संस्मरण पढ़ कर अच्छा लगा, कुछ संस्मरण रोमांचित करते हैं, गर्व का अनुभव कराते हैं, संस्कार को आकार दे जाते हैं, विश्वास की गहराई को अनजाने समझा जाते हैं, श्रद्धा के प्रतिफल साकार हो उठाते हैं.
    आपका संस्मरण भी कुछ ऐसा ही आभास दे गया................ हार्दिक आभार.

    टिपण्णी में भाई महफूज़ जी का भी लगे हाथों संस्मरण विस्तार से पढ़ने को मिला, शुरू में तो मुझे भी हंसी आई, पर माँ की जल्द जुदाई की बात ने ग़मगीन कर दिया, सच ही कहा उन्होंने कि न जाने क्यों ऊपर वाला अच्छे लोगों को जल्दी क्यों जुदा कर देता है........................

    पर महफ्फूज भाई के संस्मरण से जो एक बात मुझे समझ में आई वह यह कि जल्दीबाज़ी के काम के प्रतिफल कितने बुरे हो सकते हैं....... कुछ विचार कर ही कुछ करना अच्छा है.............

    बिना विचारे जो करे, सो पाछे पछताए.

    एक बार पुनः आभार, देरी से टिपण्णी के लिए मेरी मजबूरियां जिम्मेदार, जिससे आप भली भांति अवगत हैं.

    चन्द्र मोहन गुप्त
    जयपुर

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  56. बाप रे..62 टिप्पणियों के बाद अब मैं लिखूँ भी तो क्या लिखूँ । अब इससे प्रेरित होकर रेडियो पर एक नई पोस्ट ही लिख्नना पडेगा ।
    आप बार बार अपने बचपन के बहाने हमे अपने बचपन की भी याद दिलाती हैं ।
    और इन स्मृतियों को आर्काइव मे जमा रखिये । शहर के बहुत से बच्चे पूछते हैं । गनीमत अब एफ.एम. आ गया है तो रेडियो फिर से जन्म ले रहा है ।
    और एक मुफ्त की सलाह जिसे मानने के लिये आपको पैसे खर्च करने पड़ेंगे ..एक ट्रंज़िस्टर खरीद लीजिये अच्छा सा । मुझे तो जब भी आकाशवाणी से कविता- कहानी पाठ का चेक मिलता था मै ऐसी ही चीज़े खरीद लेता था , रेडियो, टेप, वाक्मैन, एलेक्ट्रोनिक डायरी ,फाउंटेन पेन ...आदि

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  57. वाह वंदना जी, पढ़ कर मेरी आँखे भी बचपन में डूब गयी. कितनी प्यारे संस्मरण, है इस रेडियो वाली पोस्ट में. विशेषकर दीदी के सामने आपका भोला सा बचपन.

    आज भाई बहन के रिश्ते भी औपचारिक से होने लगे... बहुत अच्छा लगा आज आपको पढ़कर...

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  58. बचपन के वह दिन कहाँ लौट के आते हैं ..बहुत अच्छा लग इसको पढना शुक्रिया

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  59. अपना रूपक तो आप नही सुन पायीं पर उसी बहाने से कितनी पुरानी यादें ताजा कर दीं । रेडियो सीलोन और बिनाका गीत माला के बिना किसकी बुधवार की शाम(8-9) बीतती थी तब ।

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  60. SACHMUCH KAMAAL KE YAADEN CHUNCHUNKAR LAATEE HAIN AAP SAB APNEE-APNEE SEE LAGTEE HAIN...


    -PRIYADARSHINI

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  61. ०- धन्यवाद पी सिंह जी
    ०- धन्यवाद चन्द्रमोहन जी
    ०- धन्यवाद शरद जी.
    ०- धन्यवाद मनु जी.
    ०- धन्यवाद सुलभ जी.
    ०- धन्यवाद रंजना जी.
    ०- धन्यवाद आशा जी.
    ०- धन्यवाद प्रियदर्शिनी जी.

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  62. आप सभी को ईद-मिलादुन-नबी और होली की ढेरों शुभ-कामनाएं!!
    इस मौके पर होरी खेलूं कहकर बिस्मिल्लाह ज़रूर पढ़ें.

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  63. वाह वंदना जी !
    बड़ी पुरानी यादें दिला दी आपने , बिनाका गीत माला पर अमीन सायानी की कशिशदार आवाज जितनी सूनी थी शायद आजतक किसी को नहीं सुना !
    होली और मिलाद उन नबी की शुभकामनायें !

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  64. वंदनाजी,
    आपने तो उन पुराने दिनों की याद दिला दी, जब होशगर होने के बाद से मैंने अपने घर में रखे सात बैंड वाले रेडियो के कान उमेठने शुरू कर दिए थे. आपके लेखन की सबसे बड़ी विशेषता मुझे यह लगती है कि बिना किसी लब्बो-लुबाब के आप अपनी बात लिख जाती हैं, जो पाठकों को सीधe पहुँचतi है ! न हींग-फिटकिरी, न मिर्च-मसाला सीdhi-सच्ची भावनाएं सटीक और बहुत-बहुत असरकारक होती हैं ! यह आलेख भी वैसा ही प्रभाव डालने वाला है ! बधाई !!
    सप्रीत--आ.

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  65. ये पोस्ट नही है वन्दना जी
    हम सबका बचपन है
    बचपन जिसमे अभाव थे पर खुशिया थी

    रश्मि जी हमेशा ये कहती है कि आप चौथी पारी मे ही खेलना क्यू पसन्द करते हो (सबसे आखिर मे टिपियाना)

    बता दू या राज रहने दू

    चलो बता देता हू
    चौथी पारी मे कम रन बनाओ तब भी जीत हमारे हाथो होती है

    होली की बहुत बहुत शुभकामना

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  66. वंदना,
    अब आशीर्वाद के सिवा और क्या है देने के लिए ? होली पर बहुत-बहुत आशीष ! तुम्हें, उमेशजी को और प्यारी बिटिया विधु को !!
    स्नेह सहित--आनंद.

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  67. तब रेडियो सिर्फ़ मनोरंजन का साधन नहीं, एक ताक़त हुआ करता था. सामाजिक बदलाव में भी इसने बड़ी भूमिका निभाई है. पर अब तो......

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  68. To this day, I have vivid memories of our first radio receiver set which was a self-assembled one bur with excellent looks and reception with a magic eye giving green light. I still remember " Loma time, it's eight A.M." being announced in the morning. There was a daily program of old songs from 7.30 A.M. to 8 A.M. A song by K.L.Sehgal was a must and on the first of every month a song " Aaj peheli tareek hai " was played. Urdu service was a favourite with me during my college days.
    Thanks for reviving old memories.

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  69. वंदना जी
    डेढ़ साल बाद पोस्ट पढ़ रहा हूँ। सारे पाठकों की तरह मेरा भी बचपन रेडियो के साथ बीता। एकाद बार अति रेडीयो प्रेम की वजह से पिटाई भी हुई.. खैर।
    आपकी पोस्ट ने बचपन याद दिला दिया।
    महफ़ूज भाई की टिप्पणी ने गमगीन कर दिया। उनकी पूज्य माताजी को श्रद्धान्जली।
    आपकी यह पोस्ट हम रेडियोनामा पर प्रकाशित करना चाहते हैं उसके लिए आपकी अनुमति चाहिए।
    sagarnahar @ gmail.com

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