सोमवार, 25 जनवरी 2010

सारे जहाँ से अच्छा....


गणतंत्र दिवस

आज गणतंत्र दिवस है. इधर विद्यालय में बच्चों के सांस्कृतिक कार्यक्रमों की रिहर्सल चल रही थी, और उधर मेरा मन एक बार फिर बचपन की यादों को टटोल रहा था. याद आ रहे थे वे तमाम गणतंत्र दिवस- स्वतंत्रता दिवस जो हमने बचपन में जिए थे...............
कैसी उमंग होती थी हमारे मन में ! कितना जोश, कितना उत्साह.... लगता था, शहीद भगत सिंह या आज़ाद के बाद तो बस हमीं हैं देश के असली सपूत.
२६ जनवरी की तैयारी जितनी विद्यालय में चलतीं, उससे ज्यादा घर में दिखाई देतीं. कई दिन पहले से गुनगुनाये जाने वाले देशभक्ति के गीत , २६ तक आते-आते जोर-शोर से गाये जाने लगते.
आज़ादी के किस्से सुनते - सुनते लगता की काश! हम भी उस वक्त होते तो देश के लिए शहीद होते!!!
मेरे माँ-पापा दोनों ही शिक्षण कार्य से जुड़े रहे और बेहद सिद्धांतवादी माने गए , लिहाज़ा स्कूल और उससे जुड़े हर कार्य को हमें भी बड़ी ईमानदारी से निभाना पड़ता था. ये अलग बात है, की इन जिम्मेदारियों को हम भी बखूबी निभाते थे.
तो इधर २५ जनवरी आती , और उधर हमारी यूनिफ़ॉर्म तैयार होने लगती. खूब कड़क प्रेस किया जाता. प्रेस करने का काम मेरी छोटी दीदी करतीं, और मैं वहीँ खड़े हो , अपनी प्रेस हो रही शर्ट का कॉलर छू - छू के देखती की खूब कड़क हुआ या नहीं. स्कर्ट की एक-एक प्लेट सहेज के प्रेस की जाती.
इस काम से संतुष्ट होने के बाद मैं अपने जूते चमकाती. पॉलिश करने वालों की तर्ज़ पर खूब ब्रश रगडती.
पूरी यूनिफ़ॉर्म हैंगर पर लटकाती, और उसके ठीक नीचे जूते रख देती.
इस दिन सुबह चूंकि मम्मी, पापा दोनों दीदियों, मुझे सबको एक साथ स्कूल के लिए निकलना होता था , तो तैयार होने का टाइम भी एक ही होता. खासी बमचक मच जाती. उन दिनों हमारे घर में एक ही बाथरूम था, और स्कूल तो सबको नहा के ही जाना होता था , ख़ास तौर पर गणतंत्र या स्वतंत्रता दिवस के दिन . ये दिन तो सबसे पावन त्यौहार की तरह होते थे. लिहाजा इन दिवसों पर बिना नहाए कैसे चलेगा? ध्वज-वंदन कैसे होगा? सो भले ही कडाके की सर्दी में पांच बजे उठना पड़े, नहाना तो है ही. खैर फटाफट नहा के हम यूनिफ़ॉर्म में सज धज के ठीक साढे छह बजे स्कूल के लिए निकल जाते.
हमारे शहर के मुख्य चौराहे से स्कूल की "प्रभात-फेरी" शुरू होती थी. जो मेरे समकालीन हैं , वे इस प्रभात-फेरी को समझ रहे होंगे. यहाँ से आरम्भ होने वाली इस प्रभात-फेरी में , क्रमशः शहर के सभी स्कूल जुड़ते जाते. विद्यार्थी अपने-अपने स्कूल का बैनर लिए नारे लगाते आगे बढ़ते जाते. लगभग पूरे शहर का चक्कर लगाने के बाद सब अपने-अपने स्कूल पहुँच जाते., जहाँ बाद में सांस्कृतिक कायर्क्रम संपन्न होते.

गणतंत्र दिवस
कमोबेश यही तरीका आज भी विद्यालयों में अपनाया जा रहा है, लेकिन त्यौहार मनाये जाने की मूल भावना नदारद सी लगती है. प्रभात-फेरी जैसी चीज़ मुझे तो लम्बे समय से, या कहूं की जबसे मेरा शहर छूटा तब से दिखाई नहीं दी. शायद ये परंपरा ख़त्म कर दी गई है. निजी विद्यालयों और अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों के चलन के बाद बहुत सी विद्यालयीन प्रथाएं समाप्तप्राय हैं. बच्चों के दिलों से देशप्रेम का जज्बा नदारद है. शायद उन्हें कुछ ज्यादा ही आज़ाद हिंदुस्तान मिल गया............हमारे बचपन में तो फिर भी बहुत सी देशप्रेम की कथाएं सुनाई जाती थीं, लेकिन आज बच्चे केवल उन्हीं शहीदों को जानते हैं, जिन पर फिल्में बन चुकीं हैं . अधिकाँश बच्चे आज़ादी के आन्दोलनों या उससे जुड़े शहीदों के बारे में, इतिहास में एक पाठ के रूप में ही पढ़ते हैं. शहादत की कहानियां सुनाने वाला कोई नहीं रहा. हमारे समय में माँ, नानी या दादी से कहानियां सुनने का चलन था, जिनमें हमें देश से जुडी अनेक कहानियां मिल जातीं थीं. लेकिन आज? आज आज न वे कहानी सुनाने वाले रहे न सुनने वाले. जहाँ एक ओर बच्चे टीवी या कम्प्यूटर में व्यस्त हो गए हैं, तो वहीँ दादी-नानियाँ भी टीवी के धारावाहिकों में व्यस्त हैं. अब यदि कोई बच्चा कहानी सुनाने को कहता भी है, तो बड़े उसे -" बहुत कहानियां आती थीं बेटा, लेकिन अब सब भूल गए" कह के टरका देते हैं.
समझ में ही नहीं आता की गलती बच्चों की है या बड़ों की? कोई भी भावना तब तक घर नहीं कर सकती, जब तक की उसका सम्प्रेषण सही तरीके से न किया गया हो. हमारे अभिभावक न केवल खुद देश के प्रति समर्पित रहे बल्कि हम में भी बचपन से ही देश प्रेम की भावना जागृत की. लेकिन क्या आज की इस नई पीढ़ी में हम देश-प्रेम का वास्तविक जज़्बा देख पा रहे हैं? अगर नहीं तो दोष किसका है? आज के जिस हिंदुस्तान को बच्चे देख रहे हैं उसे वे कैसे प्यार करें? गले तक भ्रष्टाचार में डूबा.....रोज़ व्यभिचार की तमाम खबरें.....हम खुद ही अपने देश को धिक्कारते नहीं रहते क्या? वो भी बच्चों के ही सामने? " क्या देश है ये" " विदेशों में देखो......" जैसे वाक्य या तुलनाएं हम अक्सर ही नहीं किया करते क्या? तब बच्चे भी बिना ये जाने की ऐसे वाक्य हम देश की चिंता में बोल रहे हैं, दोहराते हैं, और देशप्रेम तिरोहित होता जाता है.
खैर............आज ज़रुरत है नई पीढ़ी में नए सिरे से देश प्रेम और देश चिंता के बीज बोने की, ताकि आने वाली नई पौध आजीवन स्वतन्त्र और सम्मानित रह सके.
जय हिंद.
गणतंत्र दिवस की अनेकानेक शुभकामनाएं.

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31 टिप्‍पणियां:

  1. बचपन के तमाम पल याद आ गये जब हम स्कूल में गणतंत्र दिवस मनाते थे। प्रभात फ़ेरी के दिन भी याद आ गये। सुन्दर पोस्ट।
    आपको भी गणतंत्र दिवस मुबारक।

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  2. vandana ji,badhai ho,gantantra divas ki bhi aur is sundar rachna ke liye bhi,sach hai aaj ke bachchon ko azadi paros di gayi hai ,unhen pata hi nahin iska moolya kya hai,lekin ham zyada bade doshi hain jo jante boojhte bhi sab kuchh bhool baithe hain .

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  3. वंदना जी, आदाब
    एक गंभीर चिन्तन प्रस्तुत किया है आपने
    आपका लेख पढ़कर याद आया कि वाकई,
    कहां खो गयी वो प्रभात फेरियां?
    आपका यह कथन भी कड़वा सत्य है,
    कि हम बच्चों के सामने देश को लेकर
    नकारात्मक चर्चा अकसर कर बैठते हैं
    और, बच्चे इसी माहौल में पलकर
    देश प्रेम की भावना से विमुख हो रहे हैं..
    बहरहाल, आज के दिन, ये सब भूलकर
    आईये राष्ट्रीय पर्व मनायें..
    गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
    शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

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  4. पोस्ट बहुत बढ़िया लिखी है आपने!
    नया वर्ष स्वागत करता है , पहन नया परिधान ।
    सारे जग से न्यारा अपना , है गणतंत्र महान ॥

    गणतन्त्र-दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!

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  5. गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें!

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  6. गणतंत्र दिवस की ६० वीं वर्षगाँठ पर आपको हार्दिक शुभकामनायें।
    इस दिन स्कूली बच्चों का उत्साह और योगदान देखते ही बनता है।

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  7. Vandana Di
    Gantantra Divas ki badhai..

    Aapka ye post ham sabhi ko apne bachpan me le jayega..aise bhi yaadon ko koi yaad kara de to samay kuchh der ke liye ruk jata hay..

    Aaj ki bhag daud me rango ko anvaw karne ka jahan time nahi bachta wahin
    aapka post padh kar aisa laga ki mai bada kayon hua..Aaj bachpan ka samay hota to kitni mastiyan hoti..
    Kayonki Aaj Gantantra Divas hay..

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  8. बीते दीनो की याद ताज़ा कराती आपकी पोस्ट पढ़ कर बहुत अच्छा लगा .... सचमुच ये आज की ज़रूरत है की देश प्रेम का जज़्बा हम अपने बच्चों में भरें ........... आपको गणतंत्र दिवस की बहुत बहुत बधाई .......

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  9. बचपन के तमाम पल याद आ गये जब हम स्कूल में गणतंत्र दिवस मनाते थे। प्रभात फ़ेरी के दिन भी याद आ गये। सुन्दर पोस्ट।
    आपको भी गणतंत्र दिवस मुबारक।

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  10. वंदनाजी,
    सहजता से लिखी गई इस पोस्ट में महत्त्व का प्रश्न मुखर हुआ है ! नई पौध को देश-प्रेम के नाम पर हम कुछ भी नहीं दे रहे ! जिन दिनों का आपने ज़िक्र किया है, उससे पंद्रह-बीस वर्ष पहले तो बच्चों की रगों में देश-प्रेम की स्वाभाविक रवानी होती थी, जब छुटपन में मैं नेपाली का गीत गाता था--
    'शंकरपुरी में चीन ने सेना को उतारा,
    चौवालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा !'
    कहना होगा--'तेन दिवसा गताः !'
    इस प्रेरक आलेख के लिए आभार और साधुवाद !!
    वन्देमातरम !!!
    --आ.व्.ओ.

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  11. वाह बहुत ही सुन्दर आलेख ! आपको और आपके परिवार को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें!

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  12. समझ में ही नहीं आता की गलती बच्चों की है या बड़ों की?
    ...कहीं न कहीं सभी जिम्मेदार हैं. उस ज़माने के बच्चे ही न आज बड़े हैं! राष्ट्रीय पर्व को ईद और दिवाली की तरह मनाया जान चाहिए लेकिन आज, आज यह सिर्फ सरकारी या सामजिक संस्थाओं का पर्व बन कर रह गया है. जन-जन का जुड़ाव हो तो कई समस्याएं स्वतः समाप्त हो जाएँ.
    ..अच्छी पोस्ट के लिए बधाई. गणतंत्र दिवस की ढेर सारी शुभकामनाएँ.

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  13. sach hi kaha padhkar mujhe bhi bachpan ke din yaad aa gaye aur bahut saari baate is avasar se judi hui ab to lagta hai kitna badal gaya sabhi kuchh ,bahut pyaari rachna saath hi gantanra divas ki badhai .

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  14. कुछ बचपन की यादें घिर आईं...

    गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें!

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  15. bahut hu rochak aur bhaavpoorn
    sansmaran likha hai aapne....
    maazi ki galiyoN meiN ghoomna ho gayaa..!!
    aaj ke bachchoN ko jo parosaa ja rahaa hai,,,unheiN lagta hai k zindgi is se aage hai hi nahi,,,bs yaheeN tk hi hai,,,,
    prathaaeiN sachmuch gumm ho rahi haiN
    aapka aabhaar...is jagran bhare aalekh ke liye .

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  16. बचपन में 26 जनवरी और 15 अगस्त पर झंडा फहराने का उत्साह अब तक बरकरार है । आपके बचपन की यह उमंग भरी बातें पढ़कर हमें भी अपना बचपन याद आया , वो एन.सी.सी. की परेड और शहर भर में मार्च .और बँटने वाली मिठाई और मस्ती सबकुछ ।

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  17. बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति के लिये आभार एवं शुभकामनायें ।

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  18. वंदना जी,बहुत ही अच्छी लगी आपकी ये पोस्ट....बचपन के दिन याद करा गयी...एक पावन भावना रहती थी मन में...पूजा की तरह...आज बच्चों में यह सब देखने को नहीं मिलता ,इसके दोषी तो हम ही हैं.मैं भी अक्सर सोचती हूँ...हमने शिवाजी,राणा प्रताप,रामायण सबके किस्से कहानियों के रूप में ही सुन लिए थे...फिर चंदामामा,नंदन,पराग जैसी पत्रिकाएं भी ऐसी भावनाएं भरने में कामयाब होती थीं.
    पर एक बात जानकर आपको ख़ुशी होगी..यहाँ मुंबई में मेरे बच्चों के स्कूल में प्रभात फेरी निकलती है...और सिर्फ 15th Aug और 26th Jan को ही नहीं...'पेड़ लगाओ अभियान' ..इन सब पर भी.ये तो स्कूल पर निर्भर है...उन्हें ये जारी रखनी चाहिए.बच्चों का उत्साह देखते ही बनता है.

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  19. बहुत ही जरुरी सवाल है की क्या आज हम अपने बच्चों में देशप्रेम की भावना पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं ?

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  20. वंदना जी, बच्चों के लिये २६ जनवरी का मतलब है ’सामूहिक रटंतालय’ से एक दिन की छुट्टी। और हम सब भी जिम्मेदार हैं कि इन को विरासत में आजादी के संग्राम के बारे में नहीं बता सके, क्योंकि ऐसी चीजों से शायद हमारे बच्चे ’रैट रेस’ में कुछ फ़ायदा न उठा सकें। इस ’गणतंत्र दिवस’ की परेड यूं समझिये बच्चों को जबरन बैठाकर दिखायी लेकिन ये जबरदस्ती महज दस से पंद्रह मिनट की थी, उसके बाद तो बच्चों को खुद ही मजा आने लगा। हम सब अनावश्यक रूप से इतने व्यस्त हो गये हैं कि अपने परिवार के लिये ही क्वालिटी टाईम नहीं निकालते तो इन्हें अपनी संस्क्रति और इतिहास के बारे में क्या मालूम चलेगा क्योकि सुलभ तो हैं कार्टून चैनल और मनोरंजन के तमाम ग्लैमरस साधन और हमीं लोग बच्चों को धकेल देते हैं इस तरफ़। दही अच्छी चाहिये तो दूध भी अच्छा होना चाहिये।

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  21. प्रभात फेरी मैने भी नही देखी बर्षों से ।आपका कहना ठीक है कि आज आवश्यकता हैदेश प्रेम और देश चिन्ता के बीज बोने की,मगर ये काम करेगा कौन आप आज का माहौल देख ही रही है उच्च पद से लेकर निम्न पदतक आफ़ीसर्स और मुख्य से लेकर छुट भैया नेता तक ।स्कूल और कालेज का हाल आप देख ही रही है ।मै कोई निराशाबादी बात नही कर रहा क्योंकि मै जानता हूं कि The pessimist sees difficulty in every opportunity. The optimist sees the opportunity in every difficulty आपका लेख अच्छा लगा जो बचपन की यादों से जुडा हुआ है

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  22. त्यौहार मनाये जाने की मूल भावना नदारद सी लगती है....
    बच्चे भी बिना ये जाने की ऐसे वाक्य हम देश की चिंता में बोल रहे हैं, दोहराते हैं, और देशप्रेम तिरोहित होता
    जाता है.

    Aapki baat se puri tarah sahmat hoon.

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  23. दोष किसका है? यक्ष प्रश्न है।
    इसे सुलझाना जरूरी है।

    प्रमोद ताम्बट
    भोपाल
    www.vyangya.blog.co.in

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  24. बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति के लिये आभार एवं शुभकामनायें ।
    ek baar dobara...

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  25. संस्मरण आप के ....मगर ना जाने हमें भी कहाँ लिए जाते हैं .बहुत अच्छा लेख.
    और सही कहा है आप ने--'आज ज़रुरत है नई पीढ़ी में नए सिरे से देश प्रेम और देश चिंता के बीज बोने की, ताकि आने वाली नई पौध आजीवन स्वतन्त्र और सम्मानित रह सके.'

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  26. wah kya chitra ukera hai vandanaji aapnee...mein to chitra hi kahunga...yaad aagaya bachpan...aaya hai mujhe phir yaad o jalim gujara zamana bachpan ka...mujhe theek theek yaad hai..mein 4std mein tha..ek subah school jane ka mera dil nahi kar raha tha..samajh mein nahi aa raha tha kya bahana banaoo. tabhi mere dimag mein ek bahana aaya..mein badi masoomiyat se maa se ja kar bola kal 26 jan hai. mam ne kaha tha parade ki taiyari karni hai isliye aaj bacchon ko school nahi aana hai..itna sunte hi door khade mere papa jor se thaka laga kar hasne lage..us samay to nahi samajh saka ki o kyon hans rahein hai..salon baad samajh mein aaya.. aapka lekh padh kar o pal phil se taro taza ho gaya...kash o din phir aate...vandana ji aapne sapane jaga diye...

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  27. बहुत शानदार रही यादों की पिटारी।

    जय हिन्दी
    ,

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  28. Is sansmran ke shuruati bhaag ne to bachpan ka jazba yaad dila diya...lekin antme man dukhi ho gaya..tyohar kya,ek saza mil rahi ho is tarah se ye din manaye jane lage hain..afsos!
    Bahut hi sundar post hai...jaise samne baith batcheet ho rahi ho..

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