सोमवार, 14 दिसंबर 2009

याद न जाये, बीते दिनों की...

भाग- दौड़
कैसी भाग-दौड़ की ज़िन्दगी हो गई है.....|घड़ी के साथ उठना, घड़ी के साथ सोना, घड़ी के साथ आना- घड़ी के साथ जाना........|

इंसान न हुआ, घड़ी हो गया। घूमता रहता है, काँटों की तरह। हर वक्त " समय ही नहीं मिलता...", "फुरसत ही नहीं है...." जैसे जुमले मुंह पर सवार रहते हैं। और ये सच भी है। आज बड़े हों या बच्चे, सब इस कदर व्यस्त हो गए हैं की किसी को किसी की बात सुनने तक का टाइम नहीं।

मेरे घर में चार सदस्य हैं, और हम चारों अतिव्यस्त। बिटिया सुबह से लेकर रात तक पढ़ाई, स्कूल, ट्यूशन होमवर्क, मैं व्यस्त, पतिदेव अपनी फैक्ट्री में इतने व्यस्त की सुबह निकलते हैं और रात में आते हैं। मैं अपने काम पर सुबह सात बजे से जुटती हूँ, तो रात नौ बजे फुरसत होती हूँ। केवल अम्मा जी ( सास जी) फुरसत में होतीं हैं, तो उन्हें टीवी व्यस्त रखता है।

कमोबेश यही हाल हर परिवार का है। हमारी तरह सब अपने परिजनों का चेहरा रात में ही देख पाते हैं। अच्छा हुआ जो प्रकृति ने रात का विधान किया!!

आज के बच्चों को जब देखती हूँ, तो मुझे मेरा बचपन बहुत शिद्दत से याद आने लगता है।

कितना निश्चिन्त ..... कितना मासूम.... न पढ़ाई का ऐसा कमरतोड़ बोझ, न ट्यूशन की चिंता। स्कूल से आये तो बैग एक तरफ़ उछाला और जूते दूसरी तरफ....."मम्मे.....खाना......" का आदेश प्रसारित करती आवाज़ घर में गुंजाती।

इधर खाना अभी शुरू ही होता , कि उधर परदे के दोनों ओर से साथियों के चेहरे झांकने लगते। इशारे होने लगते कि जल्दी-जल्दी खाओ। मैं भी हबड़-तबड़ खाती। दौड़ के आधे-अधूरे हाथ धोती, और "मम्मे.....खेलने जा रहे हैं...." का एलान करती भाग जाती। पीछे से मम्मी आवाज़ देती रह जातीं।

हमारे खेल भी निराले थ॥ आज की तरह इलेक्ट्रोनिक का ज़माना तो था नहीं सो जो भी खिलौने थे अधिकतर खुद के तैयार किये उत्पाद होते थे। घर के आँगन में गुड्डे-गुड़ियों के बाकायदा घर बने हुए थे, जिन पर मेरी बड़ी दीदियों और उनकी सहेलियों का कब्ज़ा था, लेकिन दीदी की छुट्टी शाम को होती थी, सो तब तक उनकी गुड़ियों से हम खेलते। लेकिन गुड़ियों से हम बहुत देर तक नहीं खेलते थे , कारण मेरी मित्र -मंडली में लड़के भी थे, जो गुड़ियों से खेलना पसंद नहीं करते थे। किसी प्रकार मन मार के घर के गुड्डे से काम कराते रहते थे।
भाग-दौड़
दूसरा और हमारा बहुत प्रिय खेल था- "घर-घर"। तब हर घर में निबाड़ से बुने पलंग ज़रूर होते थे, जिन्हें गर्मियों में आँगन में बिछाया जाता था, इन्हीं पलंगों को खड़ा करके इनके घर बनाए जाते। मम्मी की साड़ियाँ पहनी जातीं। बाकायदा मम्मी, पापा, बच्चे, चाचा-चाची, पडोसी, बाई, सब्जी वाला, और टीचर जैसे रोल बांटे जाते। दीदियों की मौजूदगी में जब भी ये खेल खेला जाता तो मेरी बड़ी दीदी हमेशा टीचर बनतीं और हम सब को खूब मारतीं। मैं हमेशा सब्जी वाली बनती, और ढक्कनों से बनाई गई तराजू में कंकड़, पत्थर और पत्तों की सब्जी बेचती।

इसके अलावा हम बच्चे दोपहर में अपने घर की बाउंड्री में कंचे खेलते, गुल्ली-डंडा खेलते, और शाम होते ही "नमक-पाला" जैसा भारी दौड़ भाग वाला खेल खेलते। अँधेरा होते ही "आइस-पाइस" (आई-स्पाई) खेल जमता जो मम्मी की आवाज़ पर ही ख़त्म होता।

घर आते बैग उठाते, होमवर्क करते, कुछ थोडा बहुत याद भी करते और बस हो गई पढ़ाई।

रविवार को मम्मी-पापा दोनों घर पर होते , लिहाज़ा हमें कंचे या गुल्ली-डंडा खेलने का मौका नहीं मिलता, इस दिन हम सभ्य बच्चों की तरह कायदे में रहते और केवल लूडो, सांप-सीढ़ी या कैरम जैसे खेल खेलते। कैरम तो हमारे पापा भी साथ में खेलते थे और क्या खूब खेलते थे। आज भी वे बहुत बढ़िया खेलते हैं।
भाग-दौड़
शैतानियाँ भी हमारी काम न थीं. ये अलग बात है की घर में हम हमेशा सबसे शांत और कोमल बच्ची के रूप में गिने गए, लेकिन गुपचुप शैतानियाँ हमने भी खूब कीं। वैसे हम बहनों में मेरी बड़ी दीदी सबसे ज्यादा शैतान थीं। अपने ग्रुप की लीडर। जो बच्चा उनकी बात न माने उसकी खैर नहीं। दूसरे मोहल्ले की लड़कियों को ललकारती की दम है तो शाम को मंदिर में मिलना। और फिर अपनी फौज के साथ उस टोली की जो दुर्गत करतीं , उसके हम चश्मदीद गवाह है। चूंकि हम छोटे थे, सो हमें मंदिर के अन्दर बंद कर दिया जाता और खुद मंदिर के चबूतरे पर घमासान में जुट जातीं।

ऊंचे-ऊंचे इमली के पेड़ों पर सरपट चढ़ जातीं , साइकिल पर करतब दिखातीं। सर्कस देख के आने के बाद घर में बाकायदा सर्कस होता। अस्थाई झूला बाँधा जाता और उस पर उल्टा लटकाया जाता।

मेरी दीदी कहीं भी जातीं, साथ में मुझे ले जाना अनिवार्य था। मैं मन मारके जाती। दीदी भी कहाँ ले जाना चाहती थीं, लेकिन क्या करें? उस समय माँ के आदेश को टाला नहीं जाता था।

बड़ी दीदी के बाल बेहद लम्बे और खूबसूरत थे। कहीं जातीं तो मम्मी उनकी छोटी बना देतीं। लेकिन दीदी घर से ज़रा आगे पहुँचते ही अपनी चोटी खोल देतीं। मेरी उपस्थिति का भान होते ही मुझे मम्मी से न बताने के एवज में दस पैसे की रिश्वत दी जाती।

ऐसी ही रिश्वत तब भी दी जाती जब दोनों दीदियाँ अपनी सहेलियों के साथ फिल्म देखने का प्रोग्राम बनातीं । मुझे पुछल्ले की तरह फिर लटकाया जाता, फिर रिश्वत दी जाती, लेकिन इस बार फिल्म न जाने के लिए रिश्वत दी जाती। मेरा मन वैसे भी फिल्म देखने में तब लगता नहीं था। शायद ज्यादा छोटी थी। कुछ समझ में तो आता नहीं था, सो टॉकीज़ के प्रोजेक्टर रूम के बाहर की बालकनी में फिल्म के कटे हुए टुकड़े बीनती रहती। ऐसे में रिश्वत लेकर फिल्म जाने से मुकर जाना फायदे का सौदा होता था।
भाग-दौड़
एक रिश्वत और कभी नहीं भूलती............दीदी और उनकी सहेलियां "सूरज" फिल्म देख के लौटी। मेरी दीदी और उनकी मंडली के बीच बहुत लोकप्रिय खेल था, "गुलाम-चोर-डंडा। ये खेल उसी ऐतिहासिक मंदिर के मैदान में उगे विशालकाय बरगद के पेड़ के इर्द-गिर्द होता, जहाँ घमासान हुआ करते थे। वहीँ दीदी की मित्र उषा जोशी रहतीं थीं। वे भी अपने भाइयों समेत इस खेल में शामिल होतीं थीं। उस वक्त की सबसे अच्छी बात यही थी की लड़के-लड़कियों के बीच विभाजन रेखा नहीं थी। सब मिलजुल के खेलते थे। बराबरी से लड़ते थे। तो उषा दीदी के बड़े भैया भी गुलाम चोर डंडा खेलते थे। जिस रोज़ ये सब सूरज फिल्म देख के आये, उसके अगले दिन जब खेल जमा, तो हमने देखा की प्रकाश भैया मेरी खूबसूरत दीदी को देख के गा रहे हैं-" चेहरे पे गिरी जुल्फें, कह दो तो हटा दूँ मैं, गुस्ताखी माफ़.........." हालाँकि मैं कुछ नहीं समझी, लेकिन इस गीत और दीदी के बीच मैं फिर मौजूद थी। मूसरचंद की तरह। बहुत बाद में समझ आया, जब दीदी ने खुद मज़े ले लेकर ये किस्सा सुनाया। आज भी इस किस्से को और भी कई किस्सों को वे बड़ा रस ले के सुनातीं हैं।

कहाँ से कहाँ पहुँच गई। बात कर रही थी आज के बच्चों और उनकी व्यस्तताओं की। आज की शिक्षा-प्रणाली ने बच्चों को कोल्हू का बैल बना दिया है। पढाई हमारे समय में भी होती थी, लेकिन पाठ्यक्रम का अनावश्यक बोझ नहीं होता था। तब के पढ़े हुए हम आज के बच्चों को पढ़ा रहे हैं, मतलब हमारी शिक्षा में कोई कमी नहीं है। वर्ना आजके बच्चों को पढ़ा ही न पाते। समय के साथ-साथ बदलाव होगा ही, लेकिन अनावश्यक बदलाव की क्या ज़रुरत है? आज पता नहीं कितनी अतिरिक्त किताबें कोर्स में लगा दी जातीं हैं, जिन्हें पूरी तरह पढाया भी नहीं जाता, लेकिन पेपर होता है। बच्चे के लिए तनाव पर्याप्त।

पहले रिज़ल्ट फर्स्ट डिवीज़न, गुड सेकण्ड , सेकंड डिवीज़न, थर्ड डिवीज़न जैसा बोला जाता था। लेकिन अब? अब तो पर्सेंटेज बोला जाता है. पहले ६०-६५ बहुत था, अब ८० भी कम गिना जाता है। बच्चा दिन-रात ९० -९५ की दौड़ में जुटा रहता है। पढ़ाई का तनाव, होम वर्क का तनाव, परीक्षाओं का तनाव, क्लास में रैंक बनाए रखने का तनाव ऊपर से माँ- बाप की इच्छाओं का तनाव। "बेटा, फलाना प्रतिशत आना ही चाहिए. " और " हम तुम्हारे लिए पानी की तरह पैसा बहाते हैं, और तुम पढ़ तक नहीं सकते?"
भाग-दौड़
आजके बच्चे जिस दौर से गुज़र रहे हैं, उसमें उन्हें तनाव के अलावा और कुछ नहीं मिल रहा। मनोरंजन के नाम पर टीवी या फिर नेट की दुनिया। लड़के तो फिर भी बाहर कुछ खेल-कूद ही लेते हैं, लेकिन लडकियां? अब मिलजुल के खेलने का समय नहीं रहा। इनडोर गेम्स के लिए ही अकेले लड़कियों को भेजते माँ-बाप डरते हैं। मेरी बिटिया खुद कत्थक सीखती है। दो अन्य बच्चियों के साथ शाम को डांस-क्लास जाती है. लेकिन जब तक लौट नहीं आती, मेरे प्राण उसी में अटके रहते हैं। समय बदला है, बदलाव ज़रूरी भी हैं, लेकिन ये बदलाव सुखद हैं? क्या इन्हें सुखद नही बनाया जा सकता? बच्चों का बोझ कुछ काम नहीं किया जा सकता? वे भी खुली सांस ले सकें? अपना बचपन जी सकें?

44 टिप्‍पणियां:

  1. Behad achha laga ye sansmaran padhna...sach kahun..mere paas itnee adhik fursat hai,ki, mujhe wyast logon pe rashk hota hai!

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  2. समय बदला है, बदलाव ज़रूरी भी हैं, लेकिन ये बदलाव सुखद हैं? क्या इन्हें सुखद नही बनाया जा सकता? बच्चों का बोझ कुछ काम नहीं किया जा सकता? वे भी खुली सांस ले सकें? अपना बचपन जी सकें?

    वन्दना जी!
    यह जैनरेशन गैप है। सभी कुछ तो बदल गया है नई पीढ़ी का!
    शायद इसका इलाज यही है कि हम देखते रहें और देखते रहें। इसके अतिरिक्त कर भी क्या सकते हैं।

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  3. sach hi hai yaad na jaaye beete dino ki ,is yaad ke saath main bhi apne beete dino ki yaad me ghus gayi ,bahut hi rochak

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  4. दिलचस्प संस्मरणात्मक विवरण...के साथ.... आज के सवालों से मुठभेड़ करता यह आलेख बहुत अच्छा लगा।

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  5. इसीलिए इधर इंडिया में वैज्ञानिक पैदा नहीं होते ।
    अपने बचपन के समय का बढिया खाका खींचा है आपने ।

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  6. शुक्रिया वंदना जी,
    बात 'कहां' से शुरू करके 'कहां' पहुंचाने के लिये.
    ये है 'पत्रकार' वाले फन का शानदार प्रदर्शन
    बच्चों के बोझ का सवाल आज वाकई यक्ष प्रश्न बन चुका है.
    लेकिन जवाब किसी के पास नहीं, यहां सब प्रतिस्पर्धा में शामिल हैं
    आज बचपन तो जैसे 'बड़ों' के सपनों का खिलौना बनकर रह गया है
    शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

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  7. सरलतम शब्दों में बचपन के दिनों का सुन्दर चित्रण ही नहीं बचपन पर खतरों की भी अच्छी खबर ली है .

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  8. सुन्दर संस्मरण..परिवर्तन तो नियम है..साथ कदम ताल करना मजबूरी!!

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  9. vandana kaise itna achchha likh leti ho ,thodi der lag gayi bachpan se wapas aane men ,lekin wo yaaden dimagh ko taaza kar gayin ek sphoorti bhar gayeen ,
    ye sach hai bachpan to kahin kho gaya hai bachche pareekshaon ke tanav se beemar pad jaate hain,koi raasta abhi to nahin soojh raha hai .baharhal badhai ki patr ho tom .

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  10. बचपन की सुन्दर तस्वीर खींची है आपने कई बार सोचती हूँ जैसे हम अपने बचपन के बारे मे इतना कुछ अपने बच्चों को बताते हैं लेकिन हमारे बच्चे अपने बच्चों को क्या बतायेंगे? वो मस्ती अब खि सी गयी है। अच्छी पोस्ट है शुभकामनायें

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  11. बहुत बढ़िया लिखा है। कैसे भी हो, कुछ भी करें बच्चों के लिए मस्त हो खेलने का समय निकालना ही होगा।
    घुघूती बासूती

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  12. o क्षमा दी, कभी आप भी इतनी ही व्यस्त थीं, ये क्यों भूल रही हैं?
    o सच है शास्त्री जी.हम देखने के अलावा कर ही क्या सकते हैं?
    o धन्यवाद ज्योति.
    o धन्यवाद मनोज जी.
    o तारीफ़ के लिये शुक्रिया अर्कजेश जी.
    o धन्यवाद शिखा जी.
    o सच है शाहिद जी. आज के बच्चों को देख के तकलीफ़ होती है.
    o धन्यवाद सामू जी.
    o धन्यवाद मिराज़ जी.
    o जी हां समीर जी. ये मजबूरी ही है.
    o इस्मत चने के झाड पे चढाना छोडोगी नहीं?
    o सच है निर्मला जी. हमारे पास तो बहुत है सुनाने के लिये .लेकिन इन बच्चों के पास कुछ भी सुनाने लायक नहीं.
    o

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  13. वन्दना जी..मज़ा आ गया और गर्मी के दिनों मे वो बैतूल के दिन याद आ गये जब हम लोग ऐसे ही ढेर सारे खेल खेलते थे । बस अब वो बचपन के दोस्त ..पता नहीं कहाँ कहाँ है जो मिलते है उनसे तो बाते होती है और जो गुम हो गये सो .. । ऐसे दिनो को याद करने मे मज़ा आता है मन करता है फ्फिरसे बच्चे बन जायें । कल ही मै अपने पड़ोस के बच्चों के साथ कंचे खेल रहा था और भौरा ( लट्टू) हाँ मेरे पास मेरा खुद का लट्टू और डोरी अभी तक है .. देखिये किसी दिन पोस्ट लिखता ही हूँ (प्रेरणा के लिये धन्य्वाद)

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  14. वाह,वाह! क्या मजे से टहलाते हुये अपना बचपन जी लिया आपने। बचपने के संकट पर बड़ी समझदारी से नजर मारी। देखा जाये तो
    तब के पढ़े हुए हम आज के बच्चों को पढ़ा रहे हैं, मतलब हमारी शिक्षा में कोई कमी नहीं है। वर्ना आजके बच्चों को पढ़ा ही न पाते।
    लिखकर अपनी तारीफ़ भी कर ली। बहाने से अपनी तारीफ़ करने को क्या कहते हैं?
    सुन्दर पोस्ट!

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  15. o धन्यवाद मिराज़ जी.
    o शरद जी, हम आपकी इस पोस्ट का इन्तज़ार करेंगे.
    o अनूप जी, खूब मौज ले ली, अब बस कीजिये.

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  16. बचपन की यादों को आपने ऐसे संजोया की उन गलियों से हम भी हो आये, बहुत ही अच्‍छा लिखा आपने, बधाई ।

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  17. सरलतम शब्दों में बचपन के दिनों का सुन्दर चित्रण ही नहीं बचपन पर खतरों की भी अच्छी खबर ली है .

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  18. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  19. आपके लेख ने अपना बचपन भी याद दिला दिया...
    .. 'कहाँ से कहाँ पहुंच गई' --लिखकर, जब आपने आज का संदर्भ जोड़ा तो होश में आया...
    आज के हालात ने बच्चों के हाथ से उनका बचपन तो छीन ही लिया है और भी बहुत कुछ छीने जा रहा है...
    'हम दो हमारे दो' ने तो कई रिश्तों को सिर्फ कहानी में ही समेट कर रख दिया है।
    पहले घर में बच्चे होते और होती थीं दादी-नानी
    गीतों के झरने बहते थे झम-झम झरते कथा-कहानी
    शाम ढले अब सूने घर में बस्तों से झरते हैं बच्चे
    ------------------------------------------!
    बदलाव सुखद नहीं है मगर करें क्या बदलाव वक्त की नीयति है.
    हाँ, इसे कुछ हद तक सरल जरूर बनाया जा सकता है...
    बशर्ते इंसान अपनी अंधी दौड़ में इस तरफ भी ध्यान दे।

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  20. o धन्यवाद सदा जी.
    o धन्यवाद संजय जी.
    o सच है देवेन्द्र जी. एकल परिवार और छोटे परिवार की अवधारणा ने रिश्तों को सीमित कर दिया है.

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  21. उफ़्फ़ वो जमाना , वो खेल ,वो बातें आपने तो सेंटी कर दिया एक दम उन दिनों की याद दिला के सब कुछ अब सिर्फ़ यादों में ही बसा हुआ है

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  22. एक समय था जब अजय कुमार झा मेरी पोस्ट पर सबसे पहले टिप्पणी करते थे...अब न्यौता देना पडता है..है न अजय जी?

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  23. समय बदल रहा है ........ और इस बदलाव को हम सबसे ज़्यादा महसूस करते हैं क्योंकि ये हमारी आँखों के सामने हो रहा है ..... शायद आने वाली पीडी इसको महसूस न करे ...... आपने बचपन की यादों को दिल से निकाला है .... उन खेलों को अब याद करके बस मन मसोस कर रह जाते हैं ........ बीते दिनों को याद कर के रह जाते हैं .... अपनी भावी पीडी में उनको नही देख पाते ..........

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  24. बहुत सुंदर और उत्तम भाव लिए हुए.... खूबसूरत रचना......

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  25. इसके अलावा हम बच्चे दोपहर में अपने घर की बाउंड्री में कंचे खेलते, गुल्ली-डंडा खेलते, और शाम होते ही "नमक-पाला" जैसा भारी दौड़ भाग वाला खेल खेलते। अँधेरा होते ही "आइस-पाइस" (आई-स्पाई) खेल जमता जो मम्मी की आवाज़ पर ही ख़त्म होता................
    ..bahut hi achcha....aisha laga ki ham bhi inme hi hai...

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  26. वंदना जी ,
    आपके बचपन को पढ़ अच्छा लगा .....खास कर दीदी का किस्सा ....हम तो और भी मजा किया करते थे .....स्कूल दूर था ट्रेन में आते जाते ....न जाने नित कितने ही किस्से बनते ........सच .....बोहोत मज़ा आता था .....!!

    राजा जी तो अभी भी नीचे बैठे मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं ..... ....!!

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  27. o धन्यवाद दिगम्बर जी.
    o धन्यवाद संध्या जी.
    o धन्यवाद भास्कर जी.
    o धन्यवाद मार्क जी.
    o हरकीरत जी, मन घूम-फिर के बचपन की ओर चला ही जाता है. और राजा जी? अरे बैठा रहने दें उन्हें..वो भी क्या याद करेंगे..

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  28. वंदनाजी,
    सुन्दर-सरस रचना ! बाल-चिंता के साथ शिक्षण-चिंतन भी; विशिष्ट ये कि २५-३० साल पहले का बचपन कितना आह्लाद्पूर्ण था, तफसील से उसका रोचक बयान पढने को मिला ! उसके १५-१८ साल पहले तो बचपन के और भी मज़े थे...
    हाँ, मेरे लिए ये जानना दिलचस्प था कि आपकी बड़ी दीदी साहिबा का बाल्य-काल ऐसा शैतानियों भरा था, जुझारू था और दबंग भी था ! अब तो उनके लब पे जवाब भी देर से उपजते हैं ! तो क्या मैं ये मान लूँ कि उनके बचपन ने मेरी दहलीज़ पे दम तोडा था ?
    बहरहाल, ये तस्किरा बहुत पसंद आया... बधाई लें !
    सप्रीत--आ.

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  29. सबसे पहले आपका आभार । अब आपके लेख की बात करें । यह संस्मरण बहुत ही बढ़िया लगा , साथ ही आज की भाग- दौड़ की जिंदगी के साथ विगत काल की तुलना भी आपने बखूबी दर्शाया है । शुभकामनाएं।

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  30. कैसी भाग-दौड़ की ज़िन्दगी हो गई है.....|घड़ी के साथ उठना, घड़ी के साथ सोना, घड़ी के साथ आना- घड़ी के साथ जाना........|

    बहुत सुंदर रचना है।

    pls visit...
    http://dweepanter.blogspot.com

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  31. वंदना जी बचपन याद दिला दिया आपने। अच्छा लगा पढ़कर। शुक्रिया।

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  32. vandana ji pehli baar apko padha.aur pehla hi lekh bachpan ke jule jhula gaya.bahut si masoom baato ka guldasta raha ye lekh.sath me jo aaj k serious mattar baccho par padhayi k badhte bojh per jo likha usme me bhi aapke sath hu..mera beta school jata he to bhari basta dekh kar kayi baar me majak to karti hu ki nalaayko k baste bhari lekin is me in bichare baccho ki kya khushi hai vo to moderanisation ki maar aur competition ki maar jhail rahe hai...aur sath me ham maa-baap bhi.

    ek sudrad lekh k liye badhayi.

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  33. sabse pahle Dhanyawad aapko ki aap ne humari kavita ko sahara
    hum aapke tahe dilse shukragujar hai

    bite dino ki yade hum bhul nahi sakte kabhi-----

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  34. समय के बदलाव को कितने सुंदर तरीके से आपने बताया है । आपके बचपन की बातों से हम भी पहुंच गये थे अपने बचपन में । आज समय और पैसा दोनों की ही किल्लत है ।

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  35. अंतिम सवालों ने अजीब तरीके से छुआ। इतने लंबे आलेख को इतनी रोचकता से और प्रवाह बनाये रखना, आपकी लेखनी का कमाल है।

    सूरज फिल्म से कई सारी यादें जुड़ी हुई हैं। खास कर उसका गीत "बहारों फूल बरसाओ" को लेकर।

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  36. बहुत कुछ याद आ गया इसको पढ़ कर अंत तक बांधे रखा आपके लिखे ने शुक्रिया

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  37. बहुत खूब अच्छी अच्छी रचना
    बहुत बहुत आभार

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  38. samay kabhi peeche mud kar nahi dekhata..dekhate to ham he aour aaklan karte he...vese yakeen maaniye aaj ki peedi jab ham jesi hogi tab vo bhi kuchh isi prakaar se kahte-likhate dikhhai degi jesa ham kahte-sunaate he..andaaz alag ho saktaa he magar hotaa yahi he. kher..bahut sundar lekhan he aapka.

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  39. बचपन के अपने दिन याद आ गए!
    बचपन में मेरी भी बहुत सहेलियां थीं और मैं उन्हीं के साथ खेलता था.जब ऐसे ही खेल हुआ करते थे जिसमें हम मगन रहते थे.
    दर असल सखा मेरे नाम मात्र को थे.जो थे वो लड़ाके!!!!

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  40. bachapan ko bahuit sundar shaili me yad kiya gaya hai. pathak ko apana bachapan yaad aayega hi. mujhe bhi yaad aa gya. aapke blog ko dekhana sukhad rahaa.

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