शुक्रवार, ६ नवम्बर २००९

बांधवगढ की सैर और शेर के दर्शन

दीपावली
मई में अचानक ही राजा (डॉ.सुजीत शुक्ल ) का फोन आया, बांधवगढ़ चलना है. मैंने कहा की मई में तो मेरे "ग्रीष्मकालीन भ्रमण कार्यक्रम" तय हैं. रिज़र्वेशन भी हो चुके हैं. राजा बोला " चलो, जून में चलते हैं. लेकिन इसके आगे नहीं. अपने कार्यक्रम १० जून तक समेट लो, भैया से भी बोलो छुट्टियां तैयार रखें. कोई बहाना नहीं. "

अधिकार सहित दिए गए इस आदेश की अवहेलना संभव थी क्या? अपने डेढ़ महीने के कार्यक्रम को एक महीने में समेटा और १० जून को वापस आ गए, सतना. ११ जून को राजा ,और मेरी बुआ सास (राजा की मम्मी) मुंबई से सतना पहुँच गए. अगले दिन हमें बांधवगढ़ के लिए बड़े सबेरे निकलना था.

बांधवगढ़ पहुँचने के लिए विन्ध्य पर्वत श्रृंखला को पार करना होता है. इतने घने और हरे जंगल पूरी पर्वत श्रृंखला पर हैं, कि मन खुश हो जाता है.
बांधवगढ़ पहुँचने के लिए विन्ध्य पर्वत श्रृंखला को पार करना होता है. इतने घने और हरे जंगल पूरी पर्वत श्रृंखला पर हैं, कि मन खुश हो जाता है. हमारी गाडी पहाडियों पर सर्पिल रास्तों से होती हुई आगे बढ़ रही थी. इतना सुन्दर दृश्य!! वर्णनातीत ! इसी पर्वत श्रृंखला में है मोहनिया घटी, जहाँ पहली बार सफ़ेद शेर मिला, इसीलिए उसका नाम मोहन रखा गया.


सुबह १० बजे हम बांधव गढ़ पहुंचे. राजा ने पहले ही सत्येन्द्र जी के रिसोर्ट में बुकिंग करा ली थी. हम सीधे वहीं पहुंचे, जहाँ सत्येन्द्र जी और उनकी ब्रिटिश पत्नी "के" ने हमारा आत्मीय स्वागत किया.

ये रिसोर्ट इतनी खूबसूरत जगह पर है कि यहाँ से बाहरी दुनिया का अहसास ही नहीं होता. लगता है कि हम बीच जंगल में हैं. अलग-अलग बने खूबसूरत कॉटेज घाना बगीचा, आम्रपाली के अनगिनत पेड़, और उन पर लटके बड़े-बड़े असंख्य आम...अनारों से लादे वृक्ष...बहुत सुन्दर स्थान. मन खुश हो गया. देर तक सत्येन्द्र जी और के दोनों ही हमारे साथ गप्पें करते रहे. लंच के बाद सत्येन्द्र जी ही हमें नेशनल पार्क कि पहली साइटिंग पर ले गए. और जंगल के बारे में अमां जानकारियां दिन. अद्भुत ज्ञान है उन्हें जंगल और जंगली जीवों का. पहले दिन तो हम जंगल कि खूबसूरती ही देखते रह गए...हिरन और चीतल जैसे जानवर भी मिले. शेर के पंजों के निशान भी मिले...... इतने घने जंगल............क्या कहें...

दूसरे दिन सुबह चार बजे हम उठ गए और साढे चार बजे जंगल कि तरफ अपनी सफारी में निकल लिए. किस्मत अच्छी थी............दो राउंड के बाद ही शेर के दर्शन हो गए.
हमने तय किया यहां खडे-खडे मौत का इंतज़ार करने से अच्छा है, अपने काटेज़ की तरफ़ जाना. हमारे कौटेज़ डाइनिंग स्पेस से कम से कम सौ कदम दूर......जंगल का मज़ा देने वाले इस रिसोर्ट पर कोफ़्त हो आई
आराम फरमाता शेर......हम बांधवगढ में थे और अलस्सुबह ही हमें शेर के दर्शन हुए थे। उसकी गुर्राहट कानों में अभी भी गूंज रही थी। शाम की साइटिंग के बाद हमने कुछ शौपिन्ग की और रात दस बजे के आस-पास अपने रिसोर्ट पहुंचे। साढे दस बजे वेटर ने डिनर लगा दिये जाने की सूचना दी। हम सब डाइनिंग स्पेस की तरफ बढे। डाइनिंग स्पेस.... पर्यटकों को जंगल का अहसास दिलाने के लिये पूरा रिसोर्ट ही घने जंगल जैसा था , लेकिन ये स्पेस तो केवल आधी-आधी दीवारों से ही घिरा था. खैर... हम डिनर के लिये पहुंचे.अभी हम खाना प्लेटों में निकाल ही रहे थे, कि कुछ गहरी सी, गुर्राहट सी सुनाई दी. सब ने सुनी, मगर किसी ने कुछ नहीं कहा.एक बार...दो बार...तीन बार.... अब बर्दाश्त से बाहर था.... आवाज़ एकदम पास आ गई थी। मेरी बेटी ने पहल की- बोली ये कैसी आवाज़ है? अब सब बोलने लगे- हां हमने भी सुनी... हमने भी.... खाना सर्व कर रहे वेटर ने बेतकल्लुफ़ी से कहा-अरे ये तो बिल्ली की आवाज़ है. अयं...ऐसी आवाज़ में बिल्ली कब से बोलने लगी!!!
दीपावली
नहीं.....ये बिल्ली नहीं है.....गुर्राहट और तेज़ हो गई.... अब दीवार के उस पार शेर और इस पार हम....जंगल से लगा हुआ रिसोर्ट...हदबंदी के लिये बाड तक नहीं.....हम सब तो थे ही, मेरी भांजी भी साथ में....हे ईश्वर!!! दौड के दोनों बच्चों को किचन में बंद किया. अब सारे वेटर भी डरे हुए....बोले- हां शेर आ तो जाता है यहां...... पिछले दिनों एक लडके को खा गया था.... काटो तो खून नहीं.......टेबल पर जस का तस पडा खाना..... हमने तय किया यहां खडे-खडे मौत का इंतज़ार करने से अच्छा है, अपने काटेज़ की तरफ़ जाना. हमारे कौटेज़ डाइनिंग स्पेस से कम से कम सौ कदम दूर......जंगल का मज़ा देने वाले इस रिसोर्ट पर कोफ़्त हो आई. कल तक जिसकी तारीफ़ करते नहीं थक रहे थे, आज वही मौत का घर दिखाई दे रहा था. खैर....धीरे-धीरे उतरे.... एक-दूसरे का हाथ पकडे किसी प्रकार कौटेज़ तक पहुंचे. आह.... सुकून की लम्बी सांस...... पूरी रात आंखों में कटी. सबेरे जब हम फिर साइटिंग के लिये पहंचे- लोगों को कहते सुना- रात बोखा( मेल टाइगर का नाम) शहर की तरफ़ आया था!!!!!!!!!!

42 टिप्पणियाँ:

kshama ६ नवम्बर २००९ ९:२४ PM  

Baandhav gadh kaa to naam bhi nahee suna tha, aur aapne sair karva dee...padhte, padhte mujhe hamara Dudhva National Park kaa bhraman yaad aa gaya, jahan hamse keval 10/15 feet kee dooreepar sher ne chhalang laga dee thee..

Mishra Pankaj ६ नवम्बर २००९ १०:०१ PM  

बहुत सुन्दर ऐसा लगा जैसे हम खुद घूम रहे हो ..

शिवम् मिश्रा ६ नवम्बर २००९ १०:५६ PM  

क्या बात है ... आनंद आ गया आपकी यात्रा के बारे में पढ़ कर पर हाँ........ बाघ वाली घटना ने तो हमारे भी रोंगटे खड़े कर दिए ! पर जंगल की सैर पर जाये और बाघ या शेर का भय ना हो तो क्या मज़ा !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ६ नवम्बर २००९ १०:५७ PM  

वन्दना अवस्थी दुबे जी!
इस साहसिक यात्रा समस्मरण को लगाने के लिए,
आपका आभार!

Vinay Prajapati 'Nazar' ६ नवम्बर २००९ ११:०६ PM  
यह पोस्टलेखक के द्वारा निकाल दी गई है.
Vinay Prajapati 'Nazar' ६ नवम्बर २००९ ११:०६ PM  

आपने शब्दों की जादूगरी से दृश्य उत्पन्न कर दिये
--
चाँद, बादल और शाम

वन्दना अवस्थी दुबे ६ नवम्बर २००९ ११:२६ PM  

क्षमा जी, बांधवगढ मध्य प्रदेश का सबसे खूबसूरत टाइगर रिज़र्व है. कभी आइये तो हम सब घूमने चलें.सत्येन्द्र जी तो हैं ही वहां.

० धन्यवाद पंकज जी.

०-शिवम जी, दिल दहलाने वाली रात थी वो. लेकिन इस शेर कांड ने हमारी यात्रा का मज़ा दोगुना कर दिया.

०-धन्यवाद शात्री जी और विनय जी.

Ismat Zaidi ७ नवम्बर २००९ १२:४० AM  

ab tum dravni kahaniyan bhi likhne lageen.kya manzar kheencha hai tum ne wah !lekin ab wahan jaane ke liye das baar sochna padega,lekin tum to anubhavi ho tumhare saath hi jayenge.

आनन्द वर्धन ओझा ७ नवम्बर २००९ २:०२ AM  

चलो ज़िन्दगी लम्बी बीती, निस्बत भी कम न थी; लेकिन बांधवगढ़ नसीब में कहाँ था ? आज ये हसरत भी पूरी हुई. तुम्हारे शब्दों की डोर पकडे हम भी हो आये वहां; खुदा खैर करे, शेरों की दहाड़ मैंने भी साफ़ सुनी ! अरे भई, तुम्हारे शब्द तो बोलने भी लगे ... बधाई !
--आ.

अनूप शुक्ल ७ नवम्बर २००९ ८:११ AM  

जून की घटना का विवरण नवम्बर में। इत्ता डर गये आप लोग शेर से। जय हो।

ऐसे राजा (डा.शुक्ल ) सबके घर-परिवार में हों जो जबरियन शेर दर्शन करा दें।

आप लोग अपने भी कुछ फोटो लगाइये अगली पोस्ट में!जंगल की भी।

अच्छा लगा आपके अनुभव बांचकर। शुक्रिया।

Harkirat Haqeer ७ नवम्बर २००९ ८:११ AM  

बहुत खूब....!!

ऐसी रोमांचक रातें नसीब वालों को हासिल होती हैं .....खतरों के बिच ही तो ज़िन्दगी है .....!!

ओम आर्य ७ नवम्बर २००९ १२:५० PM  

मै हरकीरत जी के बातो से पूरी तरह से सहमत हूँ .......और आपने काफी रोमांचक सफर काराये इसके लिये बहुत बहुत शुभकामनाये !

mark rai ७ नवम्बर २००९ १:२२ PM  

thanks for travelling of bandhav garh
..........kaaphi jaankari mili..

ज्योति सिंह ८ नवम्बर २००९ ११:०१ AM  

bina pahunche hi sampooran aanand utha liya .bahut sundar varnan kiya hai .har manzar saamne aa khada hua shaandar safar .aanand ji ki kahi baate bhi kafi dilchshp hai .

ज्योति सिंह ८ नवम्बर २००९ ११:०४ AM  

anup ji tippani padhkar bina hanse raha nahi gaya ,jawab nahi wah kya kahne ?

दिगम्बर नासवा ८ नवम्बर २००९ ४:५१ PM  

AAPKA YATRA VRATAANT PADH KAR LAGA KI HUM BHI SAATH SAATH SAIR KAR RAHE HAIN .... CHITR BHI BAHOOT SUNDAT HAIN ...

Babli ९ नवम्बर २००९ ७:२२ AM  

वंदना जी आपकी टिप्पणियों के लिए बहुत बहुत शुक्रिया! आप शुद्ध शाकाहारी हैं इसलिए आपके लिए मैंने खासकर करेले की सब्जी बनाकर पोस्ट की है! आपको अच्छा लगा इस बात के लिए धन्यवाद!
बहुत बढ़िया लिखा है आपने! इतना रोमांचक सफर कराया की क्या कहूं ! ऐसा लगा जैसे मैं ख़ुद घूमकर आई हूँ! आपकी लेखनी को सलाम!

शरद कोकास ९ नवम्बर २००९ ९:१९ AM  

मुझे वही किस्सा याद आ गया कि " शेर अगर आपके सामने आ जाये तो आप क्या करेंगे ?" और उसका उत्तर " हम क्या करेंगे ..जो करना है शेर करेगा " गनीमत इस किस्से को सामने देखने से बच गई आप .. वैसे यह एड्वेंचर तो है जो आपने कर दिखाया ।

अर्कजेश ९ नवम्बर २००९ १०:४४ PM  

सैर और शॆर दोनॊं बढिया रहे !

रंजना [रंजू भाटिया] १० नवम्बर २००९ १:३२ PM  

लफ्जों के माध्यम से आपने वहां की सही सैर करवा दी ..रोमांचक है यह सफ़र ...शुक्रिया

Nirmla Kapila १२ नवम्बर २००९ २:२१ PM  

बहुत सुन्दर शब्दों के बहाव मे साथ साथ बहे जा रहे थे शुभकामनायें

Shobhana १२ नवम्बर २००९ ६:५२ PM  

vandnaji apne to sachmuch dara diya
bahut jeevant sansmaran aur bahut sundar bhasha sheli.
abhar

Mrs. Asha Joglekar १४ नवम्बर २००९ ६:१३ AM  

वाह आपके साथ शेर का डर और बांधव गढ की खूबसूरती दोनों को जान लिया ।

विनोद कुमार पांडेय १६ नवम्बर २००९ ११:०३ PM  

यात्रा का सुंदर विवरण..बढ़िया लगा साथ ही साथ यह ख़ौफ़ का मंज़र भी बढ़िया प्रस्तुत किया आपने..धन्यवाद

ajay saxena १७ नवम्बर २००९ ७:०३ PM  

कही जंगल का राजा शहर के राजा को वंदन करने तो नहीं आया था ....? ...पढ़ते पढ़ते सिहरन से दौड़ गयी शरीर में ..हम भी अपने परिवार के साथ जब तब बारनवापारा के जंगल के चक्कर लगते रहते है ...दुबारा जायेंगे तो सचेत रहेंगे...शानदार पोस्ट ...

योगेन्द्र मौदगिल २२ नवम्बर २००९ ७:३० PM  

hum to gazal ke sheron me hi uljhe rahe....aap ne asli dekha..... badhai....

singhsdm २३ नवम्बर २००९ १२:३४ PM  

बोखा का आना डरावना तो रहा होगा मगर रोमांचक भी कम नहीं रहा होगा.....बांधवगढ़ का यात्रावृतांत बहुत ही बढ़िया लगा.....

Rohit Jain २५ नवम्बर २००९ ४:२८ PM  

Baandhavgadh........ Purani yaadein taza ho gain ghar baithe..........

Rohit Jain २५ नवम्बर २००९ ५:०५ PM  

Baandhavgadh........ Purani yaadein taza ho gain ghar baithe..........

शहरोज़ २६ नवम्बर २००९ ३:०६ AM  

शुभ अभिवादन! दिनों बाद अंतरजाल पर! न जाने क्या लिख डाला आप ने! सुभान अल्लाह! खूब लेखन है आपका अंदाज़ भी निराल.खूब लिखिए. खूब पढ़िए!

Arvind Mishra २६ नवम्बर २००९ ७:२७ PM  

मुझे तो शेर की मौजूदगी का अहसास हो गया पढ़ते हुए -शेरिनी (दिल ) संस्मरण !

अभिषेक प्रसाद 'अवि' २८ नवम्बर २००९ ७:४२ PM  

baandhavgarh main ja chuka hun... aapne har kone kee yaad taaja kar di...

http://ab8oct.blogspot.com/
http://kucchbaat.blogspot.com/

हरकीरत ' हीर' २ दिसम्बर २००९ १०:२७ PM  

इसे अभी तक आपने बांध रखा है छोड़ा नहीं अभी .......??

डॉ टी एस दराल ३ दिसम्बर २००९ ६:३१ PM  

रोंगटे खड़े कर देने वाला अनुभव।
ऐसा ही एक अनुभव हमारा भी रहा , लेकिन ज़रा हट के।
किसी पोस्ट में ---आएगा।
आभार इस रोचक संस्मरण का।

गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' ४ दिसम्बर २००९ २:३९ PM  

रिपोर्ट बेहतरीन कुछ और फोटो की गुंजाइश थी

KAVITA RAWAT ८ दिसम्बर २००९ ४:४७ PM  

बांधवगढ ke sahasik yatra sansmaran ke liye dhanyavaad. Bahut achha laga isi bahane bandhavgarh ko jana, kyonki abhi tak jana nahi hua....
Badhai

kshama ११ दिसम्बर २००९ ९:०६ AM  

Vandanaji..."bikhare sitare"pe comment ke liye tahe dilse shukriya...kharab tabiyat aur kharab comp...donoke chalte agli post nahi likh payi!Jald hi likhungi!

संजय भास्कर १६ दिसम्बर २००९ ६:१५ PM  

सैर और शॆर दोनॊं बढिया रहे !

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