गुरुवार, 11 जून 2009

राज कर रही है तीन बेटों की माँ?

कल अपने कुछ मेहमानों को छोड़ने स्टेशन गई थी। तभी वहाँ मैंने देखा की एक जर्जर बुढ़िया किसी प्रकार अपने पैर घसीटती संकोच सहित भीख मांग रही है। हालाँकि इसमें नया कुछ भी नहीं है। सैकड़ों बुजुर्ग महिलायें इस प्रकार भीख मांग रहीं हैं। लेकिन मेरे लिए नई बात ये थी की ये वही बूढी अम्मा थी जिसने कई सालों तक हमें हमारे ऑफिस में चाय पिलाई थी।
जाति से कुलीन ब्राह्मणी इस अम्मा के तीन बेटे हैं। तीनों अच्छा-भला कमा रहे हैं। थोडी बहुत ज़मीन भी है। बूढी अम्मा के पति की मृत्यु बहुत पहले हो गई थी , सो अम्मा ने ही अपनी चाय की दूकान के ज़रिये अपने पाँच बच्चों का भरण-पोषण किया। उन्हें पढाया-लिखाया भी। बड़ा लड़का सरकारी नौकरी में है, बीच वाला किसी फैक्टरी में है और तीसरा प्रैस में काम करता है। अम्मा तीसरे के पास ही रहती थी, क्योंकि दो बड़े पहले ही उसे निष्कासित कर चुके थे। लेकिन अब इस तीसरे ने भी उसे घर से निकाल दिया था। जबकि अम्मा घर का पूरा काम करती थी । उम्र अधिक हो जाने के कारण दुकान ज़रूर नहीं चला पाती थी। घर का काम भी अब उतनी फुर्ती से नहीं कर पाती थी। लिहाज़ा उसे घर में रखने योग्य नहीं समझा गया.

अम्मा की मैं हमेशा मदद करती रहती हूँ। वे भी मुझे अपनी बेटी की तरह प्यार करती हैं। मैंने हमेशा कहा है, की वे मेरे पास आके रह सकती हैं। यदि नहीं तो कम से कम यहाँ आकर खाना तो खा ही सकती है ,जिसे खिलाने में उनके तीनों लड़के अब असमर्थ हो गए हैं। लेकिन लड़कों का मोह उन्हें आज भी छोड़ता नहीं। तीन बेटों की माँ यदि भीख माँगने पर मजबूर हो तो बेहतर है, की ऐसे बेटे पैदा ही न हों।
सोचने को मजबूर हूँ, की तमाम बेटों के कारनामे पढ़ने-देखने के बाद भी लोग बेटों की पैदाइश ही क्यों चाहते है?

25 टिप्‍पणियां:

  1. बेटे की चाहत आप कत्तई मत रखियेगा ,हम भी नहीं रखेंगे

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  2. अलका जी,बेटे की चाहत न मुझे कभी थी,न है और न होगी.मेरी एक बेटी है, और वही हम दोनों के लिये सब कुछ है.

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  3. यही तो विडम्बना है।
    एक माँ तीन बेटों को पाल सकती है,
    परन्तु तीन बेटे एक बूढी माँ को
    दो जून की रोटी भी नही दे सकते।
    सम्वेदनशील पोस्ट के लिए बधाई।

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  4. बेटियाँ जोड़ती है ,उनमे ममता का वास होता ,किसी तरह भी लड़के उन जैसे नहीं हो सकते |

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  5. लड़कों का आलम आपने देखा, बिटिया का आलम कुछ दिनों पहले चला, ये समाज है। यहाँ सब चलता है की प्रवृत्ति ने ही सह कुछ चलता कर दिया।
    एक विचार इससे इतर,
    सभी बेटे बुरे नहीं होते, सभी बेटियाँ स्नेही नहीं होतीं। सोच का फर्क है और वैसे भी इस समय समाज में लड़को को कोसने और बेटियों को बढ़ाने का चलन हो गया है।
    वैसे एक प्यार सी बेटी हमारे भी है और जो सभी की चाह, मन्नतों से आई है।
    फिलहाल समाज का सही चेहरा आपने दिखाया है, इसका दूसरा पहलू भी आप दिखाइयेगा।

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  6. सुनकर बहुत दुःख होता है वंदना जी! मैं तो यहाँ अपने पापा मम्मी को देखने के लिए तरस गयी हूँ! पता नहीं लोग बडे होने के बाद इतने बेदर्द कैसे हो जाते हैं! यही समय है जब हमारे माता पिता को हमारे सहारे की ज़रुरत है! हमे तो खुश होना चाहिए कि उनकी अछी तरह देखभाल करने का मौका मिला है!

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  7. आपकी बात सौ प्रतिशत सही है कुमारेन्द्र जी.सब लडके बुरे नहीं होते .जल्दी ही इसका दूसरा पहलू भी लिखूंगी. धन्यवाद.

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  8. अरुणा जी यदि यही बात सारे बच्चों को समझ में आ जाये,तो कोई बुजुर्ग कभी बेसहारा नहीं हो पाये.

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  9. bete aur betiyaan dono kabhi sahi kabhi galat honge...kisi bhi tarah ka bhedbhaav karna naasamjhi hai....

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  10. सजल जी,भेदभाव रहित व्यहार की ही तो अपेक्षा की जा रही है.

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  11. लानत है ऐसे बेटों पर. जब तक आप जैसे लोग हैं, ऐसी माँ की तकलीफ कुछ कम रहेगी.

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  12. वंदना जी ,
    आपको हमारी कविता 'मैं और वो' अच्छी लगी धन्यवाद.
    मुझे अपनी बेटियों पर नाज़ है.
    [राकेश 'सोऽहं']

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  13. मार्मिक ---
    सुन्दर अभिव्यक्ति ---

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  14. हाँ ..एक और ऐसी ही बदकिस्मत माँ याद आ गयी ..जिसके 4 बेटे थे ..लेकिन घरसे धक्के मारके निकली गयी ...!

    आज उसकी एक बहू वही दिन देख रही है ..! खैर , बहूके दिन इतने बुरे नही ...इस सास ने तो अपने जवान पती की मौत के बाद बेटों को पढाया लिखाया ...!छोटा बेटा केवल 4 साल का था ,जब वो विधवा हुईं थीं ..!
    सबसे पहला धक्का उसी ने मारा...!
    और हम जात पात की बात करते हैं...तकरीबन ५० साल पूर्व, इस सास को मेरी दादी ने खून दिया था..दादी मुस्लिम परिवारकी थीं...!अपने परिवारसे जब जब वो महिला निजात पाना चाहतीं, हमारे घर दौडी चली आती...!

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  15. aaj se 25 saal pahle jab ham logo(main aur mere mitro ki)tab main sabse kahta thaa. ladki kaisi bhi hi 2025 saal me apne ghar chali jaayengi aur budhape me kuchh to khyaal rakhegi lekin agar kahin ladkaa nikamma nikal gayaa to kabra me jaane tak jaan khaayega. mere tark ko kai baar sach saabit hote dekh chukaa hun. aapne to pratyaksh me hi dekha he ki ek nahin 3-3 ladko se use niraashaa haath lagi.Kisko dosh de?
    satyendra

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  16. सत्येन्द्र जी आपकी बात ही सही लगती है मुझे. कभी आप सतना आये तो इस बूढी अम्मा से ज़रूर मिलवाऊंगी.

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  17. वंदना जी आपका कथन सही | कई मामलों मैं लड़कियां अपने भाइयों की अपेक्षा माँ-बाप के प्रति ज्यादा समर्पित होती है |

    कुछ ऐसी भी लड़कियां दिखी जो me, my husband & my kid से आगे कुछ सोचती ही नहीं |

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  18. Bahut Barhia... isi tarah likhte rahiye...

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  19. आज़ादी की 62वीं सालगिरह की हार्दिक शुभकामनाएं। इस सुअवसर पर मेरे ब्लोग की प्रथम वर्षगांठ है। आप लोगों के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष मिले सहयोग एवं प्रोत्साहन के लिए मैं आपकी आभारी हूं। प्रथम वर्षगांठ पर मेरे ब्लोग पर पधार मुझे कृतार्थ करें। शुभ कामनाओं के साथ-
    रचना गौड़ ‘भारती’

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