मंगलवार, 14 अप्रैल 2009

कि उनका देखना देखा न जाए........

चुनाव के रंग अब अपने शबाब पर हैं। आचार संहिता के चलते चुनाव-प्रचार पर तो लगाम है, लेकिन कुछ ऐसे परिवर्तन दिखाई दे रहे हैं कि उनका ज़िक्र किए बिना चैन कहाँ....
फरवरी माह में नगरनिगम सतना ने आम जनता को चेताया था, कि एनिकट में केवल एक हफ्ते का पानी शेष है, इसलिए अब पानी कि सप्लाई सप्ताह में दो दिन ही की जायेगी। चलो ठीक है, पानी मिले यही क्या कम है! मार्च में चुनाव की तारीखें घोषित होने के पहले तक लोगों को हफ्ते में दो दिन ही पानी मिल रहा था। लेकिन इधर प्रत्याशियों की घोषणा हुई और उधर व्यवस्थाओं में परिवर्तन दिखाई देने लगे। इधर पन्द्रह दिनों से रोज़ पानी सप्लाई हो रहा है।
पानी रोज़ मिल रहा है ये तो अच्छा है, लेकिन सवाल ये उठता है, की जब एनिकट में पानी था ही नहीं तो ये पानी जो अब सप्लाई हो रहा है कहाँ से आ रहा है? इसके पहले जनता को जल- संकट का सामना क्यों करना पड़ रहा था? क्या जल-प्रदाय व्यवस्था इसी प्रकार सुचारू नही की जा सकती?
अब दूसरा संकट बिजली का है। साल भर से यहाँ पाँच घंटे की विद्युत् कटौती हो रही है। बीच-बीच में अघोषित कटौती अलग से। पूछने पर जवाब मिलता है, कि अधिक खपत के कारण लाईट अपने आप 'ट्रिप' हो जाती है, जनता लाचार ,क्या कहे जब अपने आप ट्रिप होती है...........लेकिन इधर चुनाव घोषित होते ही देख रही हूँ कि लाईट सुबह दो घंटे फिर दोपहर में केवल एक घंटे ही काटी जा रही है। अघोषित कटौती बंद। लाईट अब 'ट्रिप' क्यों नहीं हो रही??? खपत कम हो गई क्या?? वैसे भी किसी मंत्री को आना होता था तो लाईट कभी भी ट्रिप नही होती थी। ये सारे मुगालते तो केवल जनता के लिए हैं।
अब देखना ये है, कि चुनाव के बाद क्या होता है?

6 टिप्‍पणियां:

  1. वंदना जी,

    जहाँ तब बात रही किसी के मशहूर होने की और फिर ब्लॉग लिखने की यह तो अभिव्यक्ती को नया आयाम देने का प्रयास है.

    रही बात इस पोष्ट की तो यही कहना चाहूंगा की केवल पैनी नजर ही नही रखती हैं बल्कि विचारों को सवालों में बदल दागती भी हैं.

    विचारोत्तजक लेख के लिये बधाईयाँ

    मुकेश कुमार तिवारी

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  2. वंदना जी चिंता मत करो चुनावों के बाद एक एक यूनिट का गिन गिन कर बदला लिया जाएगा जितनी बिजली अब मिल रही है उतने समय के कट लगा करेंगे

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  3. आपकी चिन्‍ता मे मै बराबर का सझीदार हु,लेकिन अफशोस की इस देश मे लोग इस तरह नही सोचते,चुनाव के वाद क्‍या होना है हर मतदाता जानता है,लेकिन अपने अपने कारणो से वह लाचार है

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  4. हमारे नेताओं से सम्बंधित ये पंक्ति –

    बस एक ही उल्लू काफ़ी है वीरान गुलिस्तान करने को
    हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजाम ऐ गुलिस्तान क्या होगा | --(अज्ञात)
    आपकी विश्लेषात्मक नज़र के लिए बधाई , वाकई सामाजिक परिस्थितियों पर पैनी नज़र

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  5. मुकेश जी,मोहन जी,मनोज जी और गौरव जी, आप सब का शुक्रिया.वैसे इन हालातों के शिकार तो हम सभी हैं.चुनाव के पहले जितना ऐश करना है, कर लें फिर वही रोना.....

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