गुरुवार, 9 अप्रैल 2009

घमंड

"भीषण झंझावात किसी वृक्ष को आमूल विध्वस्त कर,

हमारे मार्ग को अवरुद्ध कराने इसलिए नहीं डालता ,

कि हम अपनी यात्रा पूरी न कर सकें;

वह तो वृक्ष को उखाड़ कर इसलिए हमारे पथ को अवरुद्ध कर देता है,

कि क्षण भर हमें रोक कर वह यह तो पूछ ले

कि आख़िर हम अपने आप को समझते क्या हैं???"

8 टिप्‍पणियां:

  1. Aakhir hum apne ko samajhte kya hai.....

    Sunder aur satya lekhan ke liye badhai....likhte rahiye....

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  2. रिश्ते-नाते और उसूल खाक भर है.
    मोहब्बत अब सिर्फ़ मजाक भर है.
    अरे,सबकी निगाहें गोल-गोल पे
    संवेदना महज बकबास भर है.
    धज्जियाँ भर लगी हरेक शै की
    असल में अच्छाई बात भर है.
    तरस आए इश्क में चूर लोगों पे
    मजा इसमे डाल-पात भर है.
    समझाए कोई नादान जवानी को
    इश्क बस विरह-विलाप भर है
    लुटने --लूटाने का दौड़ है अभी
    सत्य-ईमान-धर्म नकाब भर है.
    वक़्त अभी है जान ले दुनिया को,ये
    नई बोतल में पुरानी शराब भर है.
    रचना की तिथि---०९/०४/०९
    बेला---- सुबह की

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  3. waah waah, kavita bahut hi achchi hai....vriksh ke maadhyam se badi baat keh di

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  4. बहुत खूब। कहते हैं कि-

    वह पेड़ जो तन के खड़ा था जड़ से उखड़ गया।
    वाकिफ नहीं था वो हवा के मिजाज से।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
    कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

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  5. "आख़िर हम अपने आप को समझते क्या हैं?"
    वदना अवस्थी दूबे जी!
    यही तो विडम्बना है कि हम घमण्ड में चूर हैं।
    उन पेड़ों से भी शिक्षा नही लेते जो झंझावात के
    जरा से तूफान में ढह जाते हैं।
    कम शब्दों में सुन्दर अभिव्यक्ति।
    बधाई।

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  6. आप सबने इतने सुन्दर शब्दों में टिप्पणियां कर मेरा हौसला बढाया है,कि धन्यवाद जैसे औपचारिक शब्द से उनका महत्व कम नहिं करना चाहती. स्नेह बनाये रखें.

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