मंगलवार, 24 मार्च 2009

औरत

पहले बेटी,

फिर बहू,

पत्नी और मां कहलाई है,

रिश्तों के इस

भंवरजाल में,

अपनी पहचान गंवाई है।

इसमें भी वो खुश थी, लेकिन फिर भी उसे क्या मिला?-

नाम गंवाया,

धाम गंवाया,

अपने मन का हर काम गंवाया,

फिर भी देखो

आज तलक,

उसने घर का विश्वास न पाया.

12 टिप्‍पणियां:

  1. पहिचान हमने बनाने ही कब दी,थोड़े बडी हुई गुडिया का खेल सिखा दिया ,मन दे डर बिठा दिया ,पढने नहीं भेजा ,गावं से बाहर,रात के अँधेरे में निकलने नहीं दिया ,डिवेट,भाषण प्रतियोगिता में भाग नहीं लेने दिया ,स्पोर्ट ,एन सी सी ज्वाइन नहीं करने दी ,केम्प में जाने नहीं दिया ,होस्टल में रखने के नाम पर डर गए लडकी की जात है अकेले कैसे भेजें ,फौज में फार्म भरने नहीं दिया; ,चूल्हा ,चक्की में उलझा दिया ,मतलब जिस जिले या गावं में रहते है वहां की सारी सुबिधाये उपलध करदी शिक्षा ,कम्पुटर ,सिलाई ,कडाई,चित्र बनाना मगर बाहर भेजने के नाम पर डरते रहे ,इसके लिए न समाज दोषी है ,न कोई और /हम ही दोषी है

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  2. आप की रचना अच्छी लगी,लिखते रहिये....शुभ कामनाएं

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  3. Reality in crude form no doubt.Its true my friend even in 20th century and hopelessely increasing day by day .
    I share yr concerns
    regard
    Dr.Bhoopendra

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  4. aurat khud nahi jaanti aurat kya chij hai,
    vo to hiran ki tarah murkh hai,jo kasturi ki mahak me pagal hoke van-van bhatakti hai,jabki use nahi malum kasturi usi ka he,uske andar.aur jo pahchan leti he apne chhipe is kasturi ko vo aurat mard ban jati hai,tab nam-kam-dham sabkuchh hasil kar leti hai,jise pane ki hasrat har kisi ko hai chahe ho istri ho ya purush

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  5. मेरे ब्लौग पर तशरीफ़ लाने, और रचना को सराहने के लिये बहुत बहुत आभारी हूं.

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