रविवार, 24 जुलाई 2016

इतना अविश्वास ठीक नहीं......

लाइट गए आधा घण्टा हो गया था। बिजली दफ्तर फोन लगाया तो पता चला लाइट तो चालू है। लगा, स्कूल का फ़्यूज़ उड़ गया क्या? एकबारगी मन में ये भी आया, कि जिस लड़के को बिल दिया था, उसने शायद बिल जमा न किया हो, सो लाइट काट ही दी गयी हो. उस लड़के को फोन लगाया और डपटा कि समय से बिल क्यों नहीं जमा करते? उसने भी धीरे से कहा कि मैम, बिल तो मैं पन्द्रह तारीख को ही जमा कर आया था. थोड़ी ही देर में वो मुझे रसीद भी दे गया. कुछ महीने पहले इसी लड़के ने बिल जमा किया था, लेकिन कम्प्यूटर में फ़ीड नहीं होने के कारण लाइट कट गयी, और रसीद भी इसने ला के नहीं दी थी, सो इस बार ये खुद भी संशय में था. खैर! मैने ये मान लिया था कि लाइट काट दी गयी है. तभी  ऑफिस के ठीक बगल वाली क्लास के एक बच्चे ने टीचर को बताया- "मैम मैं जब टॉयलेट जा रहा था तो मैंने खट की आवाज़ के साथ मेन स्विच नीचे गिरता देखा है। " मैम ने डाँट लगाई- "अच्छा! अपने आप गिर गया मेन स्विच? ज़रूर तुमने बदमाशी की है। बोलो, तुमने ही गिराया है न मेन स्विच?" बच्चा लगातार मना कर रहा है। 
"नो मैम, मेन स्विच तक मेरा हाथ नहीं पहुंचता. फिर मैं क्यों करूंगा ऐसा? मैने नहीं किया."
लेकिन टीचर थीं, कि अब उसे धमकाने के मूड में आ चुकी थीं. 
"सही-सही बताओ, किसने किया, वरना तुम्हारी ही पिटाई होगी." पूरी क्लास सन्नाटे में थी. सब क्लास के शैतान बच्चों की तरफ़ कनखियों से देख रहे होंगे, ये मैने ऑफ़िस में बैठे-बैठे महसूस किया. तभी उस बच्चे की फ़िर आवाज़ आई- " नो मैम . मैं सही कह रहा हूं."
 बच्चे की रुआंसी आवाज़ सुन के मैं क्लास में पहुंची। उस बच्चे की आंखें बता रही थीं, कि वो सच बोल रहा है. क्न्जम्शन बढने पर मेन स्विच अपने आप गिर के पावर कट करता है, ये भी मुझे मालूम था. सो मैने तत्काल उस बच्चे का बचाव करते हुए  सारे बच्चों को मेन स्विच न छूने की हिदायत दे के मामला शांत किया। 
बच्चे के चेहरे और मेन स्विच की ऊंचाई से ज़ाहिर था कि ये हरक़त उसने नहीं की होगी। सोच रही थी, कि खुद ही इस घेरे में फंस जाने के बाद , आगे से मालूम होने पर भी कोई बात न बताने की क़सम, उस बच्चे ने और शायद क्लास के दूसरे बच्चों ने भी खाई हो.... इतना अविश्वास ठीक नहीं। जाने अनजाने, सच को छुपाये रखने की आदत हम बड़े ही तो नहीं डाल रहे बच्चों में? 

गुरुवार, 5 मई 2016

स्वर्गलोक में खलबली....!

स्वर्गलोक में आज बड़ी हलचल थी. हलचल क्या, अफ़रा-तफ़री सी मची थी. किसी को किसी से बात करने की फ़ुरसत तक न थी. हमेशा आराम फ़रमाने, नाच-गान में मस्त-व्यस्त रहने वाले इन्द्रदेव भी अपना मुकुट उतारे, माथे पे हाथ धरे बैठे थे. सुन्दरियां एक ओर सहमी सी खड़ी थीं और सुरा अपने सुराहीदार पात्र  से उचक-उचक के बाहर देखने की कोशिश में थी कि अब तक उसे पिया क्यों नहीं गया?
“टनन..टनन..टनन..टुनुक टन टनन….. घंटी की आवाज़ आनी क्या शुरु हुई, लगा जैसे स्वर्गचाल आ गया. इंद्रदेव को अपना सिंहासन डोलता सा लगा. जबकि वे खुद उस पर बैठे ही नहीं थे. वे तो बाहर पड़े मूढे पर बैठे थे. ये खयाल आते ही उनके माथे पर पड़ी तमाम चिंता की शिकनों में से दो-चार गायब हो गयीं. लम्बी सांस ले के वे उठे और इधर-उधर चहलकदमी करने लगे.  जो देवता सो रहे थे, घंटी की आवाज़ सुन पलंग से नीचे गिरते-गिरते बचे. देवियों ने अपने हाथ का काम छोड़, कान घंटी की आवाज़ पर लगा लिये. कुछ  देवता जाग रहे थे लेकिन घंटी की आवाज़ सुन सोने का नाटक करने लगे. कानों में जबरन एयर प्लग ठूंस लिये. कुछ जो अपने महल  से निकल के अगले के महल तक जा रहे थे, घंटी-ध्वनि कानों में पड़ते ही, बदहवास से अपने महल की ओर वापस दौड़ पड़े.
भक्त की इस घंटी ने उनका जीना हराम कर दिया था. और आज नौबत ये आ पहुंची थी….
नारद जी बहुत देर से ये पूरा नज़ारा स्वर्गलोक के एक कोने से ले रहे थे.ये खलबली देख के उन्हें साल भर पहले धरती पर शिक्षक दिवस के दिन होने वाली अफ़रा तफ़री याद आ गयी. कैसे तो सारे स्कूल उल्टे सीधे हो गये थे… जब उनसे रहा न गया तो सीधे इंद्र के पास पहुंचे. नारद जी को देखते ही इंद्रदेव के चेहरे से गायब हुई शिकनों ने फ़िर वापसी कर ली. नारद जी भांप गये, आखिर अन्तर्यामी जो ठहरे, लेकिन फ़िर भी उन्हें ऐसी शिकनों की आदत थी सो अनदेखी करते खुद ही आसन ग्रहण कर लिये और इंद्रदेव की तरफ़ मुखातिब हुए- “ क्या बात है महाराज! आज यहां बड़ी हलचल मची है… कोई खास बात?? इंद्रदेव तो जैसे इस प्रश्न का ही इंतज़ार कर रहे थे. फट पड़े- “ देखिये मुनिवर, मेरा मुंह न खुलवाइये. एक तो आपने धरती से लेकर स्वर्ग तक खलबली मचा दी और अब पूछ रहे हैं कोई खास बात? इतने भोले न हैं आप कि हमें बताना पड़े बात.. आखिर क्यों किया आपने ऐसा?” अब नारद जी अचकचाये-“ हें!! मैने किया? क्या कर दिया भाई? आपलोगों की तो आदत ही बन गयी है मुझे फंसाने की. कुछ करूं तो और न करूं तो भी. “
“अच्छा! कह तो ऐसे रहे हैं जैसे कुछ जानते ही नहीं.”- इंद्र ने मुंह बिचकाया जो इंद्राणी को एकदम पसंद न आया. बहस में हस्तक्षेप करते हुए बोलीं-“ अब यदि आप समस्या बता ही देंगे तो कौन सा आपका सिंहासन छिन जायेगा. बता दीजिये.”
“देवी, सिंहासन तो छिनवाने की पूरी तैयारी कर दी है नारद महराज ने. अब तुम क्या जानो.” इंद्र बिचके मुंह से बोले. “वही तो…. पत्नियों को बस महल में सजी-धजी पुतली बना के बिठाये रखिये. कोई काम की बात हो, तो फटाक से कह दीजिये- अब तुम क्या जानो. हुंह” इंद्राणी को सचमुच गुस्सा आ गया था. स्वर्ग में औरतों की स्थिति पर वे पहले ही नाखुश थीं. इंद्राणी को रूठते देख इंद्र थोड़ा नरम पड़े. “ प्रिये, तुम तो बस मनवाने के लिये रूठती रहती हो. अभी बिल्कुल टाइम न है मेरे पास मनाने का. सो रूठने का प्रोग्राम पोस्ट्पॉन कर दो.”
“और सुनो महराज, ये खलबली उस चिट्ठी ने मचाई है जो आप विष्णु जी को दे आये हैं. आखिर क्या ज़रूरत थी चिट्ठी सीधे वहां पहुंचाने की? थ्रो प्रॉपर चैनल काम करना रास नहीं आता न आपको? अब आपका तो कुछ नहीं, लेकिन देवताओं को देखिये, कैसे  औंधे-सीधे हुए जा रहे. बेचारों को हाथ हिलाने की आदत नहीं, और आज पूरे के पूरे हिल डुल रहे. दौड़ भाग रहे.   सुना है चिट्ठी में सब देवताओं के नाम मेल जाने की बात है, सो सब लैपटॉप जुगाड़ रहे. स्मार्ट फ़ोन की खेप मंगाई है धरती से लेकिन धरती वाले बहुत भाव खा रहे, कह रहे यहीं नहीं पूज रहे, आपको क्या भेजें? कुछ इंसानों ने तो यहां तक कह दिया की हमारी सुनी है कभी जो हम आपकी सुनें? हमें दी मांगी हुई चीज़? फ़िर हम काहे दें स्मार्ट फ़ोन? सो देवतागण दूसरा जुगाड़ बना रहे. यहीं अंतरिक्ष में लटके सैटेलाइट से सीधा कनेक्शन करवा रहे, यहां की रंगशाला में. आखिर देखें तो माज़रा क्या है. वैसे खोज तो संजय की भी मची है. वही मिल जाता तो क्या कहने थे. सारी झंझट खतम हो जाती. सबके मेल बिना कम्प्यूटर/इंटरनेट के पढ के बता देता.” नारद जी पर बरसने से शुरु हुई इंद्रदेव की बात धीरे-धीरे स्वगत कथन में बदल गयी.
अब नारद जी धीरे से बोले- “ महाराज, मैं तो ब्रह्मा जी का संदेशा ले के आया हूं. विष्णु जी ने वो चिट्ठी टीप लगा के आगे फ़ॉरवर्ड कर दी. सो मामला अब ब्रह्मा जी के हाथ में है. आप सबको आज शाम चार बजे मीटिंग के लिये बुलाया गया है कैलाश पर्वत पर.
“कैलाश पर्वत पर!! जाने क्या सूझता है ब्रह्मा जी को भी.. अब बड़े हैं सो मैं कुछ ऊटपटांग शब्द नहीं बोल रहा वरना मन तो पच्चीसों सुनाने का है. शिव जी को तो ठंड लगती नहीं, उन्हें फ़र्क नहीं पड़ेगा. विष्णु जी हर तरह के मौसम के आदी हैं. खुदई आगे बढ के नारायण पर्वत हथियाये थे बद्रीनाथ में, मने उन्हें भी बर्फ़ से कोई एलर्जी नहीं है. लेकिन हम लोगों की तो सोचो. ये तीनों विभूतियां तो वहां पत्थरासीन हो जायेंगीं, शिवजी के साथ, लेकिन उस पिरामिड सरीखे कैलाश पर्वत पर हम सब कहां रहेंगे जानते हैं न मुनिवर? देखा तो है आपने. जहां-तहां पूरे पर्वत में बर्फ़ के बीच जगह बना के हाथ जोड़े नंगे बदन खड़े रहेंगे. ऐसे में उनके  भाषण पर कम, ठंड पर ज्यादा ध्यान रहेगा. दांत अलग किटकिटायेंगे. और अगर ज्यादा ज़ोर से किटकिटाये तो शोर मचाने का आरोप लगाने में देर न लगेगी उन्हें. इस पर्वत से अच्छा तो धरती का रामलीला मैदान है, जहां कम से कम दर्शक बैठ तो पाते हैं. “ इंद्रदेव कैलाश की ठंड अभी से महसूस करने लगे थे.मौका देख के  नारद जी तत्काल अन्तर्ध्यान हो गये क्योंकि उन्हें मालूम था कि लोग अधिकारियों के खिलाफ़ तो कुछ बोल नहीं पाते, सूचना लाने वाले को ही आड़े हाथों लेते हैं.
देवतागण तीन बजे से ही अपने अपने यानों और सवारियों पर सवार हो के कैलाश पर्वत को कूच करने लगे थे. कइयों ने अपने पद से इस्तीफ़ा लिख के अपने-अपने पीताम्बर/नीलम्बर/श्वेताम्बर की अंटी में खोंस लिया था. इस्तीफ़ा लिखने वाले खासतौर से वे देवता थे, जिनका मेल देखने का कोई जुगाड़ जम नहीं पाया था. जल्दी उड़ान भरने वाले देवताओं ने सोचा था कि वे कैलाश पर्वत पर सबसे आगे की लाइन घेर लेंगे, लेकिन ये उनकी गलतफ़हमी थी. बहुत सारे बिना सवारियों वाले  देवता, दूसरों से लिफ़्ट ले के पहलेई पहुंच गये थे और  आगे की लाइन पर कब्जा जमा चुके थे. बहुत सारे देवता इंद्र के उडान भरते ही एरावत हाथी के पांव से लटक के चेन बना लिये और एरावत के लैंड करने से पहले ही मनचाही जगह पर पांव छोड़-छोड़ के लैंड करते चले गये. ऐसी हरकत पर  बड़े देवताओं ने इसे  नीच कर्म घोषित करते हुए  फ़िर छोटों को अपनी ज़ात दिखा देने का फ़िकरा कसा. और “ कितनी ही सुविधाएं दो इनको, कितनी ही योजनाएं लागू करो इनके लिये, रहेंगे ये छोटे के छोटे” वाला ताना मारा.
खैर. किसी प्रकार सब अपनी अपनी जगह पर खड़े हुए. त्रिमूर्ति कैलाश पर बने पत्थरासन पर विराजमान हो चुकी थी. नारद जी ने सभा शुरु होने की औपचारिक घोषणा की, और ब्रह्मा जी का इशारा पाके बात आगे बढाई.
“ उपस्थित देवियो/देवताओ. जैसा कि आप सब जानते हैं, ये मीटिंग एक बेहद गम्भीर चिट्ठी को लेकर बुलाई गयी है. ये चिट्ठी पृथ्वीलोक से किसी अनन्य भक्त ने भेजी है. यदि परमादरणीय परमपिता ब्रह्मा जी की अनुमति हो, तो मैं इस चिट्ठी का मजमून बांचूं.” ब्रह्मा जी ने हाथ उठाकर चिट्ठी पढने का इशारा किया. नारद जी ने गला खंखार के पढना शुरु किया-
“ आदरणीय त्रिमूर्ति,
सादर प्रणाम. अत्र कुशलम तत्रास्तु. आगे समाचार यह है कि चूंकि चिट्ठी का फ़ॉर्मेट यही है सो मुझे मजबूरीवश “अत्र कुशलम तत्रास्तु” लिखना पड़ा. वरना स्थिति तो ये है कि यहां कुछ भी कुशल नहीं. देश में क्या हो रहा, सो तो आप मुझसे ज़्यादा जानते हैं, सो देश की बात नहीं करनी मुझे. अपन तो सीधे मुद्दे की बात करेंगे. और मुद्दा ये है कि  हम जाने कितने सालों से आप की पूजा कर रहे. हर देवी/देवता को मना रहे लेकिन आप लोग हो कि सुनतेई नईं. आज तक हमारी कोई ख्वाहिश पूरी की? विश्वास न हो तो अपने इच्छापूर्ति रजिस्टर में देख लीजिये. दिखा हमारा नाम?  नहीं न? पिछले दिनों कितना जरूरी काम था हमारा. लेकिन किसी ने न सुनी. हम तो पेटी का भी इंतज़ाम किये थे लेकिन जब कोई सुने तब न? तो हम आज आपको पत्र के माध्यम से नोटिस देते हैं कि हमारी कोई भी इच्छा पूरी क्यों नहीं की गयी. आपके यहां भी धरती की तरह भर्राखाता है क्या? आपकी सरकार भी झूठे वादे करती है क्या? मुझे तो यही लगता है कि  पृथ्वीलोक का असर आपके स्वर्ग में भी हो गया है. उम्मीद है, मेरी चिट्ठी का जवाब जल्दी से जल्दी देंगे अन्यथा मुझे मजबूरन न केवल कानून का , बल्कि किसी और धर्म के देवता का सहारा लेना पड़ेगा.
पुनश्च: - सभी देवताओं से मेरी अर्ज़ी पहुंचने बावत पूछताछ की जाये.
थोड़े लिखे को बहुत समझना. सबको  यथायोग्य कहें.
उत्तर की प्रतीक्षा में
आपका अनन्य भक्त
चिट्ठी पढ के नारद जी ने जैसे ही तहा के ब्रह्मा जी को सौंपी, सभा में सबकी आवाज़ों ने भिनभिनाहट का रूप ले लिया . तभी शिवजी ने अपना त्रिशूल ठोंका. आवाज़ें धीमी होते-होते बंद हो गयीं. ब्रह्मा जी के बायें सिर ने नारद जी को आंखों से इशारा किया, देवताओं से जवाब तलब के लिये.  नारद जी ने देवताओं को इशारा किया उत्तर देने के लिये. इशारा पाते ही सारे देवता त्राहिमाम त्राहिमाम चिल्लाने लगे. कुछ कह रहे थे कि उन्हें मेल मिला ही नहीं तो कुछ कह रहे थे कि उनके पास लैपटॉप नहीं था सो वे मेल चैक ही नहीं कर पाये. शोर इतना बढा कि ब्रह्मा जी के तीनों सिर घूम गये. शिव जी का तीसरा नेत्र खुलने वाला है ऐसा भांप के नारद जी ने बात सम्भाली और देवताओं में से किसी एक को आ के सबकी समस्या बताने को कहा. विष्णु जी ने इंद्रदेव की तरफ़ इशारा किया तो नारद जी ने उन्हें ही तलब कर लिया.
त्रिमूर्ति के आगे आ के इंद्रदेव ने हाथ जोड़ के कहना शुरु किया- “हे त्रिदेव, सभी देवताओं का कहना है कि उन्हें जो मेल मिला है वो खाली था. उस मेल में कुछ लिखा ही नहीं था फ़िर वे क्या मनोकामना पूरी करते? लगभग ८० प्रतिशत देवता हैं जो मेल चैक कर चुके हैं और उनके मेल में कुछ भी नहीं लिखा है. केवल मेल आईडी उनकी डली है.  कुछ देवताओं के पास सीसीटीवी कैमरे की सुविधा है, सो मेरी विनती है कि इस फ़ुटेज़ को देखने के बाद ही हमारे लिये दंड तय किया जाये.”  अबकी विष्णु जी ने प्रोजेक्टर लगाने को कहा. तत्काल कैलाश पर्वत की सफ़ेद बर्फ़ को प्रोजेक्टर के स्क्रीन की तरह तैयार किया गया. फ़ुटेज़ चालू हुआ. लेकिन ये क्या?... ये भक्त तो आसमान की ओर हाथ उठा के लगभग घूमता हुआ जोर जोर से घंटी बजाता  सारे देवताओं से अपनी मुराद पूरी करने को कह रहा. कई देवताओं ने अपना नाम सुनते ही तथास्तु कहने को हाथ भी उठाया, लेकिन तब तक भक्त दूसरे देवता से विनय करता पाया गया. दूसरे देवता ने हाथ उठाया ही था, तथास्तु का “त” बोल भर पाया कि भक्त तीसरे देवता की चिरौरी करने लगा…
पूरा फ़ुटेज़ देखने के बाद इंद्रदेव बोले- देखा भगवन? कैसे कोई इसकी मनोकामना पूरी करे? ये किसी एक के पास टिकता ही नहीं…. सो सब उसकी इच्छा पूरी करने का भार अगले को सौंप देते हैं. बल्कि ये मान लेते हैं कि अगले ने उसकी इच्छा पूरी कर दी होगी. अब बतायें, हम सब कहां दोषी हैं?”
माजरा त्रिदेव की समझ में भी आ गया था. मुस्कुराते हुए नारद जी से बोले- मुनिवर, जो व्यक्ति  किसी एक की भक्ति नहीं कर सकता, किसी एक पर भरोसा नहीं कर सकता उस बेपेंदी के लोटे की कोई इच्छा पूरी कर पाना हमारे वश में नहीं. सो हे नारदमुनि, ऐसी चिट्ठियों को धरती पर ही मंडराने दिया कीजिये . और अगर गलती से ऊपर आ भी गयीं, तो फ़ाड़ के डस्टबिन में डाल दिया कीजिये. इतनी बड़ी सभा जोड़ने की आगे से कोई जरूरत न है. पूरी सभा में से “ त्रिदेव” त्रिदेव” के नारों की आवाज़ तब तक उठती रही, जब तक वे अन्तर्ध्यान न हो गये.




शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

राजनर्तकी की छवि से मुक्ति दिलाने की सार्थक कोशिश है-" एक थी राय प्रवीण"

बुंदेलखंड का इतिहास बहुत समृद्ध है. तमाम कहानियां इसके अतीत में समाहित हैं. यूं तो ऐतिहासिक उपन्यास हमेशा ही रोचक होते हैं लेकिन उनकी रोचकता तब और बढ जाती है जब कथा किसी महत्वपूर्ण राज्य के  नामी गिरामी राजा की प्रेमकथा पर आधारित हो. प्रेम हमेशा से जीवन में उमंग और उत्साह का संचार करने वाला तत्व रहा है, सो जब कथाएं प्रेम पर आधारित होती हैं, तो पाठक का आनन्दित होना लाज़िमी है.
पिछले दिनों श्री गुणसागर सत्यार्थी जी द्वारा रचित ऐतिहासिक उपन्यास “एक थी राय प्रवीण” पढने का सुयोग जुटा. इस उपन्यास से पहले,  राय प्रवीण पर आधारित एक और उपन्यास- “ओरछा की नर्तकी”  मैं पढ चुकी हूं,  वो भी अद्भुत लिखा गया है, लेकिन उस उपन्यास में राय प्रवीण को दरबारी नर्तकी साबित किया गया है, जबकि सच ये है कि राय प्रवीण कभी दरबारी नर्तकी रही ही नहीं. और इस सत्य को बहुत प्रामाणिक तरीक़े से प्रस्तुत करता है उपन्यास- “एक थी राय प्रवीण”.
यह उपन्यास बरधुआं की पुनिया से  ओरछा की राय प्रवीण होने तक का सफ़रनामा बहुत विस्तृत और रोचक तरीके से प्रस्तुत करता है. आमतौर पर ऐतिहासिक उपन्यास बोझिल होने लगते हैं लेकिन सत्यार्थी जी ने इस उपन्यास की रोचकता को उसकी मौलिकता के साथ आरम्भ से अन्त तक बरक़रार रखा.
   यह एक अफ़सोसनाक  सत्य है कि अब तक, राय प्रवीण पर जितना भी लिखा गया, जितने भी उपन्यास लिखे गये, उन सब में उन्हें राजनर्तकी के रूप में वर्णित किया गया. अब चूंकि राजनर्तकी, उस पर राजा इंद्रजीत सिंह की प्रेमिका. तो उपन्यासकारों ने स्वयमेव मान लिया कि यदि कोई नर्तकी प्रेमिका भी है, तो उसकी स्थिति क्या मानी जायेगी? ज़रा स्तरीय भाषा में हम भले ही उसे राजनर्तकी लिखें, लेकिन अन्तत: राजनर्तकी का क्या स्थान होता था दरबार?एक नर्तकी जो राजा की प्रेमिका भी हो को क्या उपाधि दी जा सकती है? रखैल से ज़्यादा कुछ नहीं. चलताऊ भाषा में हम इस रिश्ते को यही नाम देते हैं. लेकिन सत्यार्थी जी का उपन्यास – “एक थी राय प्रवीण” इस मिथक को पूरी तरह नकारता है, और राय प्रवीण को उनकी भार्या के रूप में स्थापित करता है. हां ये सच है कि राय प्रवीण घोषित पत्नी का दर्ज़ा पाने के पहले ही मृत्यु को प्राप्त हो गयीं. कवि केशव की शिष्या, जिसे स्वयं केशवदास ने राय प्रवीण नाम दिया, कितनी कुशल कवियित्री, नर्तकी, गायिका और चित्रकार थी ये आप इस उपन्यास के माध्यम से जान सकेंगे.
उपन्यास इंद्रजीत की कछौआ यात्रा और  पुनिया की सुरीली आवाज़ के आकर्षण के साथ शुरु होता है. बरधुंआ नाम के एक छोटे से गांव के बहुत गरीब लुहार की बेटी है पुनिया. बिना मां की इस बेटी को ईश्वर ने बहुत सुरीला  गला दिया है. पिता भी संगीत प्रेमी है. किस प्रकार राजा इंद्रजीत इस गरीब बालिका का गायन सुनने के लिये कछौआ में समारोह के दौरान पुनिया का भी गायन रखवाते हैं और वहीं प्रसाद देते हुए प्रसन्न हो भगवान को चढाई जाने वाली माला पुनिया के गले में डाल, उसके आंचल में मिठाई का दोना रख देते हैं. पुनिया ने इस हार को ही वरमाला मान लिया और खुद को राजा इंद्रजीत की पत्नी. आगे की कथा आप उपन्यास में ही पढ्ने का आनन्द है. पुनिया की संघर्ष गाथा और कला के उच्च शिखर पर पहुंचने का सिलसिलेवार वर्णन किया है सत्यार्थी जी ने. सौतिया डाह के चलते रावरानी ने जब अकबर तक राय प्रवीण की खबर भेजी, और अकबर ने जब उसे दरबार में तलब किया तो इंद्रजीत प्रवीण को वहां भेजने के सख्त विरोधी थे. ऐसे में चंद पंक्तियों से राय प्रवीण ने उन्हें समझाया-
 ''आई हों बूझन मंत्र तुमें, निज सासन सों सिगरी मति गोई,
प्रानतजों कि तजों कुलकानि, हिये न लजो, लजि हैं सब कोई। 
स्वारथ और परमारथ कौ पथ, चित्त, विचारि कहौ अब कोई। 
जामें रहै प्रभु की प्रभुता अरु- मोर पतिव्रत भंग न होई।“
 इस पद को पढ के कौन राय प्रवीण को राजनर्तकी या रखैल मानेगा? सत्यार्थी जी ने ऐसे तमाम पद/दोहे इस उपन्यास में उल्लिखित किये हैं जो राजा इंद्रजीत सिंह और राय प्रवीण के रिश्ते को स्पष्ट करते हैं. उपन्यास राय प्रवीण के संघर्ष  को पूरी प्रामाणिकता के साथ सिद्ध करता चलता है. इसीलिये इस उपन्यास को मात्र एक उपन्यास कहना ग़लत होगा. ये सत्यार्थी जी द्वारा रचित शोढ ग्रंथ है. एक ऐसा उपन्यास जिसे आने वाले समय में संदर्भ ग्रंथ के रूप में इस्तेमाल किया जायेगा.  ऐतिहासिक उपन्यास तब प्रामाणिक हो जाते हैं जब उन्हें गहन शोध के बाद लिखा जाता है. इस उपन्यास में भी सत्यार्थी जी के चालीस वर्षों की मेहनत है. छोटे से छोटा तथ्य भी उन्होंने जुटाया, ऐसा तथ्य जो राय प्रवीण की  राजनर्तकी की छवि को मिटा सके. और उनकी मेहनत रंग लाई है. इस उपन्यास को पढने के बाद लोग राय प्रवीण की राजनर्तकी की छवि  को तोड़ पायेंगे.
पूर्व में एक उपन्यास पढा था – “ ओरछा की नर्तकी”  ये उपन्यास इक़बाल बहादुर देवसरे द्वारा रचित है. बहुत बढिया उपन्यास है, लेकिन राय प्रवीण को पूरी तरह राजनर्तकी के रूप में स्थापित करता हुआ. जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है. सत्यार्थी जी ने ऐसे तमाम मिथकों को तोड़ने का सार्थक प्रयास किया है. उपन्यास बहुत रोचक शैली में लिखा गया है. लोक भाषा का समावेश उपन्यास को पात्रों के निकट ले जाने के साथ-साथ उसमें विश्वसनीयता पैदा करता है. ओरछा बुन्देलखंड की प्रमुख रियासतों में से एक है. सो बुन्देली भाषा का  प्रयोग उपन्यास को ज़्यादा प्रामाणिक और आत्मीय बनाने में सफल हुआ है.
उपन्यास की सम्वाद शैली बहुत प्रभावी है, लेकिन कहीं-कहीं बहुत लम्बे सम्वाद हैं, जो पाठक को बोझिल करने लगते हैं. कई लम्बे सम्वाद उपन्यास की मांग के अनुसार हैं. फिर भी लम्बे सम्वादों से बचना उचित होता. लम्बे सम्वाद , उपन्यास की कसावट में सेंध लगाने का काम करते हैं.
“एक थी राय प्रवीण” के रचयिता श्री गुण सागर सत्यार्थी जी का स्थायी निवास कुण्डेश्वर- ज़िला टीकमगढ, म.प्र. में है. आपका जन्म सन- १७ अगस्त सन १९३७ को चिरगांव-झांसी में हुआ. आप मुंशी अजमेरी के पौत्र हैं. सो लिखने का गुण विरासत में मिला, जिसे परम्परा के रूप में वे आगे बढाते रहे हैं. आपने मेघदूत का बुंदेली में काव्यानुवाद किया, जो कालिदास अकादमी उज्जैन द्वारा किया गया.  चौखूंटी दुनिया, नाव चली बाल महाभारत सहित  लगभग ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. तमाम क्षेत्रीय पत्रिकाओं का सम्पादन भी आपके खाते में है. लगभग बीस पांडुलिपियां अभी प्रकाशन के इंतज़ार में हैं. बुन्देलखंड की इस विभूति को पढना ही अपने आप में बुन्देलखंड को जान लेने जैसा है.
नेशनल पब्लिशिंग हाउस-दिल्ली से प्रकाशित “एक थी राय प्रवीण” भी आने वाले समय में बहुत महत्वपूर्ण पुस्तक साबित होगी, ऐसा मेरा विश्वास है. शुभकामनाओं सहित

उपन्यास: एक थी राय प्रवीण
लेखक: गुण सागर सत्यार्थी
प्रकाशक : नेशनल पब्लिशिंग हाउस
4230/1 अंसारी रोड, दरियागंज
नई दिल्ली- 110002
मूल्य : ७२५ रुपये मात्र




शनिवार, 9 अप्रैल 2016

सोलह दिनों तक चलने वाला एकमात्र त्यौहार है-गणगौर


बचपन में जब गणगौर का त्यौहार आता, तो हम सबमें सबसे ज़्यादा  उत्साह टेसू (पलाश) के फूलों से रंग बनाने के लिये होता. हमारे छोटे से शहर में टेसू के पेड़ बहुतायत हैं, सो फूल मिलने में दिक्कत न होती. हम अपनी फ़्रॉक की झोली बना के उसमें ढेर सारे फूल भर लाते. ताज़े- चटक नारंगी रंग के फूल… मम्मी  एक बड़ी सी थाली में पानी भर के सारे फूल डाल देतीं. जब तक कथा समाप्त होती, फूलों के रंग से पूरा पानी नारंगी-लाल हो उठता. एक बार फिर फूलों को मसल के मम्मी सारा रंग निचोड़ लेतीं, और कथा के अन्त में सब पर ये रंग डाला जाता. तब इस रंग के डाले जाने का पौराणिक महत्व नहीं मालूम था, ये हमारे मौज-मज़े का सामान होता था. हमारा सारा ध्यान तो इस रंग और पूजा के लिये बने पकवानों पर लगा होता था.  लेकिन इतना है, कि मुझे उन दिनों घर में होने वाली सारी पूजाओं में, गणगौर की पूजा बहुत अलग सी, और बहुत अच्छी लगती थी. आज भी लगती है. 
गणगौर….. गण यानि शिवभक्त और गौर यानि पार्वती. पार्वती से बड़ा शिवभक्त भला कौन हुआ है !! लेकिन गौरा के नाम के साथ गण लगने और इस पूरे शब्द  के “गणगौर” बनने की अलग कथा है.  इस शब्द के उत्पत्ति पार्वती द्वारा किये गये एक व्रत के बाद हुई. पार्वती ने शिव को प्राप्त करने के लिये  जो व्रत किये, ये भी उनमें से एक है. वैसे तो गणगौर विभिन्न प्रांतों में मनाया जाता है, लेकिन सबसे ज़्यादा उत्साह और रीति रिवाज़ के साथ इसे राजस्थान में मनाया जाता है. तो आइये जानते हैं इस व्रत की विहि. व्रत को करने का विधान ताकि जो महिला इसे शुरु करना चाहे, वो कर सके, विधान जान सके.
गणगौर पूजन कब और क्यों?
गणगौर का त्यौहार एकमात्र ऐसा त्यौहार है जो चैत्र नवरात्रि के मध्य आता है. नौदुर्गा की तृतीया को आने वाले इस त्यौहार का विशेष महत्व इसलिये भी है क्योंकि चैत्र नवरात्रि का यह दिन  देवी के चंद्रघंटा स्वरूप को समर्पित है. चंद्रघंटा तंत्रमंत्र की स्वामिनी हैं. इनकी अर्चना से अलौकिक वस्तुओं की प्राप्ति होती है. नवरात्रि के तीसरे दिन, यानि चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को गणगौर माता की पूजा की जाती है. इस दिन पार्वती के अवतार के रूप में “गणगौर माता” और शिव के अवतार के रूप में “ईशर जी” की पूजा की जाती है.  कहा जाता है कि पार्वती ने शिव को पति के रूप में पाने के लिये तपस्या की. शिव प्रसन्न होके प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा. पार्वती ने वरदान में शिव को ही मांग लिया. और वरदान फलित हुआ, शिव पार्वती के विवाह के रूप में. तबसे कुंआरी कन्याएं इच्छित वर पाने के लिये और सुहागिनें अपने सौभाग्य के लिये इस व्रत को करती चली आ रहीं. गणगौर पूजा की शुरुआत चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया से आरम्भ हो जाता है. महिलाएं सोलह दिन तक इस पूजा के विधान का पालन करती हैं. सुबह जल्दी उठ के ऊब चुनने जाती हैं. उस दूब से थाली में रखी मिट्टी की गणगौर माता की मूर्ति को छींटे देती हैं. आठवें इन लड़कियां कुम्हार के यहां जा के मिट्टी लाती हैं, और फिर इस मिट्टी से ईशर जी की प्रतिमा के साथ साथ पार्वती के मायके का परिवार भी बनाती हैं. गणगौर की जहां पूजा की जाती है, उसे पीहर और जहां विसर्जन किया जाता है उसे ससुराल माना जाता है.
गणगौर की मूर्ति को पूजा के दिन सुन्दर वस्त्रों से सजाया जाता है. पकवान बनाये जाते हैं जिनमें मीठे और नमकीन  गुना –फूल होते हैं. कई जगह इन्हें गनगौरे भी कहते हैं. एक थाली में टेसू के फूलों से रंग तैयार किया जाता है. थाली को गणगौर की मूर्ति के ठीक नीचे रखा जाता है ताकि उसमें गौर की छाया दिखाई दे. कथा के बाद यह रंग सब पर उलीचा जाता है. गणगौर की मूर्ति से सिंदूर ले के विवाहिताएं अपनी मांग भरती हैं. और फिर भोजन ग्रहण करती हैं. यह निराहार रहने वाला व्रत नहीं है.
कैसे करें पूजा?
थोड़े बहुत विभेद के साथ इस त्यौहार की पूजन विधि लगभग सभी जगह समान है. गणगौर की मूर्ति स्थापना कर एक थाली में अख्शत, चंदन, हल्दी सिंदूर, अगरबत्ती, धूप, कपूर और फूल-ऊब आदि रखी जाती है. यह थाली होली के दूसरे इन ही तैयार कर ली जाती है. अब इसी में मिट्टी से गणगौर माता की मूर्ति भी बना के रखते हैं. पूजा के कमरे में या जिस स्थान पर पूजा करनी हो, बालू से एक चौकोर बेदी बना के वहीं ये थाल स्थापित किया जाता है. पार्वती को सुहाग का समस्त सामान चढाया जाता है, जैसे कि हम हडतालिका तीज को चढाते हैं. फूल, धूप, दीप नैवेद्य अर्पण करने के बाद कथा कही जाती है और बाद में सभी महिलाएं भोग ग्रहण करती हैं. माता का सिंदूर लेती हैं.
राजस्थान का विशिष्ट त्यौहार
राजस्थान का यह खास उत्सव है. इस दिन भगवान शिव ने पार्वती को. तथा पार्वती ने  समस्त स्त्री समाज को सौभाग्य का वरदान दिया था. राजस्थान से लगे ब्रज के सीमावर्ती इलाकों में यह त्यौहार धूमधाम से मनाया जाता है. इस दिन यहां गणगौर माता को चूरमें का भोग लगता है.  
उमंग और उत्साह का पर्व है गणगौर
सोलह दिन तक चलने वाला यह एक मात्र त्यौहार है. पहले के ज़माने में जब मनोरंजन के साधन नहीं हुआ करते थे, तब लोग अपने उत्सव का बहाना इन त्यौहारों में खोज लेते थे. सोलह दिन बेहद मस्ती, उत्साह और उमंग में निकलते थे महिलाओं के. राजस्थान में आज भी सोलह दिन तक दूब से दूध का छींटा दिया जाता है गौरा को.
गणगौर की कथा
भगवान शंकर  तथा पार्वती जी नारदजी के साथ भ्रमण को निकले। चलते-चलते वे चैत्र शुक्ल तृतीया के दिन एक गाँव में पहुँच गए। उनके आगमन का समाचार सुनकर गाँव की श्रेष्ठ कुलीन स्त्रियाँ उनके स्वागत के लिए स्वादिष्ट भोजन बनाने लगीं। भोजन बनाते-बनाते उन्हें काफ़ी विलंब हो गया किंतु साधारण कुल की स्त्रियाँ श्रेष्ठ कुल की स्त्रियों से पहले ही थालियों में हल्दी  तथा अक्षत लेकर पूजन हेतु पहुँच गईं। पार्वती जी ने उनके पूजा भाव को स्वीकार करके सारा सुहाग रस उन पर छिड़क दिया। वे अटल सुहाग प्राप्ति का वरदान पाकर लौटीं। बाद में उच्च कुल की स्त्रियाँ भांति भांति के पकवान लेकर गौरी जी और शंकर जी की पूजा करने पहुँचीं। उन्हें देखकर भगवान शंकर ने पार्वती जी से कहा, 'तुमने सारा सुहाग रस तो साधारण कुल की स्त्रियों को ही दे दिया। अब इन्हें क्या दोगी?'
पार्वत जी ने उत्तर दिया, 'प्राणनाथ, आप इसकी चिंता मत कीजिए। उन स्त्रियों को मैंने केवल ऊपरी पदार्थों से बना रस दिया है। परंतु मैं इन उच्च कुल की स्त्रियों को अपनी उँगली चीरकर अपने रक्त का सुहागरस दूँगी। यह सुहागरस जिसके भाग्य में पड़ेगा, वह तन-मन से मुझ जैसी सौभाग्यशालिनी हो जाएगी।'
जब स्त्रियों ने पूजन समाप्त कर दिया, तब पार्वती जी ने अपनी उँगली चीरकर उन पर छिड़क दिया, जिस जिस पर जैसा छींटा पड़ा, उसने वैसा ही सुहाग पा लिया। अखंड सौभाग्य के लिए प्राचीनकाल से ही स्त्रियाँ इस व्रत को करती आ रही हैं।
तो इस उल्लास-उमंग से भरपूर गणगौर व्रत को आप भी करें, बिना किसी विशेष आडम्बर के. शुभकामनाएं, आप सबको.
                            


गुरुवार, 17 मार्च 2016

कच्चे ख़्वाबों की पक्की ख़्वाहिशें…….


जो अपने होते हैं, उन्हीं का काम सबसे पीछे होता है.  कारण, यहां औपचारिकता नहीं होती. उलाहना होता है, लेकिन नाराज़गी नहीं होती. ऐसा ही कुछ हुआ “निवेदिता-अमित” के साथ. किताब तो जनवरी के पहले हफ़्ते में ही मिल गयी थी, लेकिन…. खैर. 
“कुछ ख्वाब-कुछ ख्वाहिशें” अचानक ही छप के सामने आ गयी, बिना किसी सुन-गुन के. निवेदिता श्रीवास्तव और उनके पतिदेव अमित श्रीवास्तव की मिली जुली पुस्तक है ये. ये दोनों ही ब्लॉग जगत और सोशल मीडिया के चर्चित नाम हैं.  इस संयुक्त प्रयास को देख, एकबारगी राजेन्द्र यादव और मन्नू भंडारी का संयुक्त उपन्यास, “एक इंच मुस्कान” याद आ गया. बहुत दिनों के बाद  पति-पत्नी की संयुक्त किताब देखने को मिली, खुशी हुई.
अपनी बात में ’निवेदिता-अमित’ लिखते हैं-
“ बड़ी-बड़ी इमारतों के सामने छोटे-छोटे घरोंदे भी ज़्यादा देर टिक तो नहीं  पाते, परन्तु जब तक आंखों के सामने रहते हैं, लुभाते बहुत हैं. आप सबको यह कविताएं तनिक सा लुभा पाएं, बस इतना सा ख्वाब है और यह पूरा हो जाये, बस यही ख्वाहिश है.”
बड़ी मासूम सी इच्छा है,  बहुत  ही विनम्रता से व्यक्त की गयी. ऐसी विनम्र चाह पर कौन न वारी जाये….
“कुछ ख्वाब-कुछ ख्वाहिशें” को दो हिस्सों में बांटा गया है. पहला हिस्सा निवेदिता के नाम है. इसमें पृष्ठ संख्या 15 से लेकर 62 तक निवेदिता की रचनाएं हैं. हर पृष्ठ पर एक रचना यानि कुल पैंतालीस कविताएं.  निवेदिता की शब्द यात्रा ’अनकहे शब्द’ से होकर, सिरहाना मिल जाये, तुमने कहा था, जैसे पड़ावों से होती हुई आगे बढती है तो निगाहें अचानक ही “सीता की अग्नि परीक्षा” पर ठिठक जाती हैं. शानदार कविता है ये.
“आज मैं तुम्हारा परित्याग करती हूं,
जाओ फिर से मेरी स्वर्ण प्रतिमा बना साथ बिठाओ
मैं जनकपुर की धरती से उपजी
आज फिर धरती में ही समा जाती हूं”
कमाल की पंक्तियां रच डालीं हैं निवेदिता ने. पन्ने फिर पलटने शुरु करती हूं. पृष्ठ दर पृष्ठ आगे बढती हूं आंखें फिर अटकती हैं- “ कल्पवृक्ष” पर .
“सबकी कामनाएं
पूरी करने में
 अपनी कितनी सांसे
कभी न ले पाता होगा  
धड़कन औरों की
सहेजते सहेजते
अपने लिये धड़कना
याद न रख पाता होगा.”
बहुत गहरी बात. ऐसी चिन्ता प्रकृति और  समाज से बराबरी का प्रेम रखने वाला व्यक्ति ही लिख सकता  है.  एक और कविता “ख्वाब” भी बहुत सुन्दर तरीक़े से लिखी गयी है.
ख्वाब
कभी मुंदी
और कभी खुली
पलकों से भी
सांस-सांस जिए जाते हैं.”
सुन्दर कविता है ये. एक और कविता है, “उसने कहा” ये भी बहुत सुन्दर है.

“शुक्रिया तुम्हारा
तुमने तोड़े मेरे सपने
और मैं समझ गयी
टूटे सपने भी जीवंत होते हैं”
बढिया कविता है.  अब पेज़ नम्बर 65 से 112 तक अमित जी का हिस्सा है.
अपनी पहली ही रचना में लिखते हैं-
“मुड़े-तुड़े कागज़ अक्सर होते हैं खत मोहब्बत के
लफ़्ज़ जिसके हरेक जुगनू होते हैं ’उन’ नज़रों के”
प्रेम की बरसात इस कविता से जो शुरु हुई तो, लिखते क्यूं हो?, ईद, कुछ्ख्वाब, और गुनाह हो गया, हाफ़िज़ खुदा, लालटेन सी ज़िन्दगी, पैमाइश लफ़्ज़ों की, कहानी एक जो़ए की, केहि विधि प्यार जतऊं, विद्योत्तमा लौट आओ फिर एक बार, से होती हुई आलिंगन ज़िन्दगी का, गुनगुने आंसू और क्यों लिखूं  कविता पर जाकर ही रुकती है. अमित जी की कई कविताएं बहुत सुन्दर हैं.
“जलाता हूं रोज़
थोड़ा-थोड़ा खुद को
रोशनी तो होती है
पर इर्द-गिर्द
कालिख भी होती है.
बहुत सुन्दर कविता है ये. एक सच्चे कवि जैसी लेखनी के दर्शन होते हैं यहां, जबकि मैं उन्हें बस यूं ही, शौकिया कविताई करने वाला कवि माने बैठी थी.
देखा है मैने अक्सर लब तुम्हारे
कुछ कहने से पहले
हो जाते हैं आड़े-तिरछे
क्या खूब लिख गये अमित जी.
मैं काट रहा हूं
वह शाख
जिस पर बैठा हूं
ये भी बहुत शानदार कविता है. तो कुल मिला के  इस संग्रह में 86 कविताएं हैं, जिनमें से कुछ अच्छी हैं, कुछ बहुत अच्छी हैं, और कुछ ऐसी भी हैं, जिन्हें ओबारा लिखा जाये तो कमाल हो जाये. इस संग्रह को पढते हुए सबसे खास बात ये कि निवेदिता की कविताओं में जहां प्रेम की कविताएं कम, विरह, नाराज़गी, उलाहना जैस भाव भी आये हैं, वहीं अमित जी की  कविताओं का स्थाई भाव प्रेम है. अधिकांश कविताएं प्रेम के ही विभिन्न आयाम प्रस्तुत करती हैं.  एक और बात, वो शायद अधिसंख्य पाठकों ने महसूस की हो, ये पुस्तक एक आत्मीय स्पर्ष सा देती है. रचनाएं बहुत सधी हुईं, मंझी हुई हैं ऐसा मैं नहीं कहूंगी. कुछ कविताओं को छोड़ दें, तो अधिकतर कविताएं अपने कच्चेपन के दौर से गुज़र रही हैं, लेकिन इनका यही कच्चापन आकर्षित करता है.  लेखन में गज़ब की मासूमियत है. उम्मीद है, निवेदिता-अमित अपनी ये मासूमियत बरक़रार रखते हुए अगली पुस्तक में और भी पुष्ट कविताएं ले के आयेंगे. हिन्दयुग्म प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक का मूल्य है सौ रुपये जो  पाठकों को खुश कर देने वाला है. कवर पेज़ अच्छा है. मगर इससे भी अच्छा है पुस्तक का पृष्ठ भाग. छपाई सुन्दर है.  पुस्तक कुल ११२ पृष्ठ की है. एक बार फिर निवेदिता-अमित को हार्दिक बधाई.
पुस्तक: कुछ ख्वाब कुछ ख्वाहिशें
(कविता संग्रह)
लेखक: निवेदिता-अमित
प्रकाशक: हिन्दयुग्म प्रकाशन
१, ज़िया सराय, हौज खास, नई दिल्ली-११००१६
मूल्य: १०० रुपये मात्र
ISBN- 978-93-84419-33-2



बुधवार, 17 फ़रवरी 2016

किसानों के साथ की गयी तपस्या का नाम है “अकाल में उत्सव”

पिछले दिनों लगातार ऐसी किताबें हाथ आईं, जिनके शीर्षक चमत्कृत करते थे. इन किताबों ने खुद को पढने के लिये न केवल आमंत्रित किया, बल्कि पढने पर मजबूर कर दिया. ऐसा ही शीर्षक है – “अकाल में उत्सव” . कैसा विरोधाभासी शीर्षक है न!! आप पन्ने पलटे बिना रह ही नहीं सकते, और अगर एक बार पन्ना पलट लिया, तो उपन्यास पढे बिना नहीं रह सकेंगे, ये मेरा दावा है.
पंकज सुबीर.. जी हां यही हैं इस उपन्यास के रचयिता. पंकज सुबीर का परिचय देना बेमानी होगा क्योंकि अब यह नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं. पंकज,  एक ऐसे उपन्यास के रचयिता, जिसे केवल उपन्यास कहना गलती होगी. ये आत्मकथा है सैकड़ों/हज़ारों किसानों की. व्यथा कथा है आत्महत्या को मजबूर होने वाले किसानों की. और कच्चा चिट्ठा है प्रशासनिक तंत्र का. पोल खोलता है व्यवस्था की. पंकज सुबीर पहले भी ऐसे विषयों पर  उपन्यास/कहानियों का सृजन कर चुके हैं, जिन  पर लिखने से आमतौर पर लोग हिचक जाते हैं.  एक साथ दो ,बिल्कुल विपरीत माहौल जीने का नाम है अकाल में उत्सव. एक ज़िन्दगी रामप्रसाद की और दूसरी प्रशासन की. इन दोनों परिवेशों को बखूबी जिया है पंकज ने.
                                                         कहानी शुरु होती है “सूखा पानी” नामक  गांव के परिचय के साथ. गांव का परिचय यानि गांववासियों का परिचय.  उपन्यास की कथा गांव के एक छोटे किसान रामप्रसाद, उसकी पत्नी कमला , और ज़िला प्रशासन के साथ-साथ आगे बढती है. रामप्रसाद छोटा किसान कैसे हो गया, ये विवरण इतने रोचक और सिलसिलेवार  तरीक़े  से लिखा गया है, कि पाठक को न केवल रामप्रसाद  की ज़मीन खत्म होते जाने का कारण समझ में आता जाता है, बल्कि ऐसे ही अन्य किसानों के छोटे किसान होते जाने का कारण भी समझ में आने लगता है. निरक्षरता कितना बड़ा अभिशाप है, ये भी इस उपन्यास के माध्यम से समझा जा सकता है. गांवों में आज भी नयी पीढी से ठीक पहले वाली पीढी पूरी तरह अशिक्षित/निरक्षर है. सेठ महाजन पैसा उधार दे के किस तरह ब्याज वसूल रहे, कितना चुकता हो गया, कितना बाक़ी है, ये वो आज भी महाजन का बताया/समझाया ही जान पाता है. ब्याज वसूली का जो तरीक़ा महाजन से समझा दिया वही उसके लिये अन्तिम सत्य बन जाता है.
कई स्थानों पर पंकज ऐसा लिख गये हैं, कि आंखें बरबस उस पंक्ति पर बार-बार घूमती हैं. एक जगह वे लिखते हैं-
“पिता कहीं नहीं जाता, वह अपने सबसे बड़े बेटे में समा जाता है. उसे अपने स्थान पर पिता कर देता है. तो रामप्रसाद भी जब अपनी बहनों के अरवाज़े पर सुख-दुख  में जाकर खड़ा होता था, तो वह रामप्रसाद नहीं होता था, वह होता था उन बहनों का पिता.”
पिता की सारी ज़िम्मेदारियां निभाने वाले भाई की स्थिति तो देखिये, सब करने के बाद भी श्रेय किस तरह छोटे की तरफ़ चला जाता है-
 “ रामप्रसाद तो आकर बड़े बुज़ुर्गों में बैठ जाता और कारज का सामान भागीरथ को सौंप देता कि जा बाई से पूछ कर जहां जो करना है, कर दे. रामप्रसाद उधर बैठा रहता और इधर बहन भागीरथ के गले लग कर शुकराने के आंसू उसके कंधे पर बहा देती.”
इतना सच्चा चित्रण!! पढते हुए लगता जैसे ये तो हमारा ही भोगा हुआ सच है…
उपन्यास में एक तरफ़ रामप्रसाद की व्यथा है, कर्ज़ है, दुनिया भर के ऐसे खर्चे हैं, कि बीवी के पांव की तोड़ी तक बेच के पूरे न हो पा रहे, तो दूसरी तरफ़ प्रशासन को मिलने वाले ऐसे फ़ंड हैं, जिन्हें किसी न किसी प्रकार ठिकाने लगाना ही है. लाखों की राशि किस प्रकार निचले पायदान से लेकर ऊपर तक ठिकाने लगायी जा रही है, ये पढने योग्य है. जो भी प्रशासनिक कार्यों से जुड़े हैं, या जिनका साबका इन विभागों से पड़ता रहता है वे इस उपन्यास की सच्चाई को बहुत बेहतर तरीक़े से समझ पायेंगे. और मुझे लगता है कि कभी न कभी आमजन का पल्ला इन दफ़्तरों/बाबुओं/नेताओं से पड़ता ही है.
व्यवस्था पर करारा व्यंग्य करते हुए पंकज लिखते हैं-
“ सरकारी व्यवस्था शेर के शिकार करने समान होती है. जब शेर अपने शिकार से पेट भर खा लेता है, तो  बाक़ी का शिकार अपने से छोटे जानवरों , मतलब गीदड़ों आदि के लिये छोड़ देता है. गीदड़ भी जब पेट भर लेते हैं, तो फिर अपने से छोटे लकड़बग्घों, गिद्धों आदि के लिये छोड़ देते हैं. कुल मिलाकर यह कि जब ऊपर वालों का पेट भर जायेगा तब नीचे वालों का रास्ता खुलेगा. सरकारी व्यवस्था मांसाहारी प्राणियों की व्यवस्था से बहुत मिलती जुलती है.”
व्यवस्था पर इतनी बड़ी शाब्दिक चोट!!! बहुत हिम्मत चाहिए ऐसा सच लिखने के लिये. पंकज बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने पूरा उपन्यास ही ऐसे कड़वे सच के आधार पर रचा.
उपन्यास में ज़िन्दगी कभी रामप्रसाद के कच्चे,सुविधाहीन घर से गुज़रती है, तो कभी कलेक्टर के बंगले से. दोनों जगहों का माहौल उभर के सामने आता है. एक तरफ़ जहां अभाव में भी ज़िन्दगी की मिठास दिखाई दे जाती है, वहीं दूसरी तरफ़ सुख-सुविधा सम्पन्न बंगले पर रसहीन, बनावटी जीवन दिखाई देता है. ये फ़र्क़ घर और मकान के फ़र्क़ जैसा ही है. उपन्यास के श्रीराम परिहार, राकेश पांडे, मोहन राठी, रमेश चौरसिया, दिनेश रघुवंशी जैसे पात्र एकदम अपनी अगल-बगल के पात्र लगते हैं. यहां सभी नाम काल्पनिक हैं, लेकिन इन पदों पर आसीन हर व्यक्ति का चरित्र एक खांचे में फिट है, उसी खांचे को पंकज ने बखूबी उभारा है.
उपन्यास के कई हिस्से बहुत मार्मिक हैं. कई जगह आंसुओं का सैलाब उमड़ता है,. कभी आंसू बह जाते हैं, और कभी आंख, नाक और गले को नमकीन करते रहते हैं. खास तौर से कमला का तोड़ी उतार के देना और रामप्रसाद का उसे बेचने ले जाना.
“रामप्रसाद ने गमछे का एक कोना ढिबरी पर रखा और उस पर ताकत लगायी. पेंच घूम गया. पेंच के घूमते ही मानो समय का एक पूरा चक्र घूम गया, चक्र जो कमला के ब्याह  के आने से अब तक चला था. पेंच खोल कर कमला ने तोड़ी को उतारा और दोनों तोड़ियां रामप्रसाद के गमछे में लपेट दीं. गमछे में लिपटी तोड़ियों को उठाकर माथे से लगाया और कुछ देर लगाए रही, तब तक, जब तक भरभरा के रो नहीं पड़ी वो.”
कमला के साथ-साथ मैं भी भरभरा के रो पड़ी थी…
“”रामप्रसाद चुपचाप  उकड़ूं बैठा, घुटनों पर सिर रख कर तोड़ी को पिघलाये जाने की प्रक्रिया को देख रहा था. पिघलने की उस प्रक्रिया को बाहर निकलने से रोकते हुए जो उसके अन्दर घट रही थी. जैसे ही कारीगर ने तोड़ी के किनारे पर लगी चांदी के स्क्रू या ढिवरी को एक प्लास टाइप के काटने वाले औज़ार से ताकत लगा कर काटा, वैसे ही रामप्रसाद के मुंह से निकला- “निरात (आहिस्ता) से…..”
उफ़्फ़…… कोमल भावना का कैसा अद्भुत चित्रण!!! पढते हुए मन करने लगता है कारीगर के हाथ से तोड़ी छुड़ा के रामप्रसाद को दे दूं….
ये जो मैने यहां कोट किये, ये तो चंद उदाहरण हैं. पूरी किताब ऐसे ही ताने-बाने से बुनी गयी है. किसान की मनोदशा और उसकी अपनी स्थिति का अन्दाज़ा बहुत छोटे-छोटे से वाक्यों में ज़ाहिर कर देते हैं पंकज-
“बात की बात में श्रीराम परिहार उनके ठीक सामने आ के खड़े हो गये. दोनों की घिग्घी बंध गयी. जीवन भर पटवारी को  दुनिया का सबसे बड़ा अफ़सर मानने वाले किसान के सामने अगर एकदम से कलेक्टर आ के खड़ा हो जाये, तो उसकी दशा सोची जा सकती है.”
ऐसी ही बहुत छोटी छोटी बातें हैं, जो आम जीवन का अभिन्न अंग हैं , जिन्हें इस खूबी से उकेरा गया है, कि पाठक खुद इस उपन्यास के भीतर प्रविष्ठ हो जाता है, और रामप्रसाद के साथ चलने लगता है तो कभी कलेक्टर के.
 किसी भी तयशुदा  सरकारी कार्यक्रम में किस तरह और कितना बजट सुनिश्चित होता है, और वास्तविकता में यह बजट कैसे दायें-बायें हो, सारा कार्यक्रम बाहरी खर्चे पर ही संचालित कर लिया जाता है, पढ के पाठक, जिसे सरकारी महकमे के काम करने का अन्दाज़ा है, होंठों में ही मुस्कुराता है, क्योंकि उसे तो कलेक्टर के खिलाफ़ अकेले में भी खुल के मुस्कुराने की आदत नहीं है, जबकि पंकज ने सारी प्रक्रिया का कच्चा चिट्ठा खोल के रख दिया है. तमाम राज़ फ़ाश किये हैं पंकज ने. मसलन, फ़र्ज़ी किसान क्रेडिट कार्ड का मामला, मुआवज़े की रक़म का मामला और भी कई मामले जिन्हें आप खुद पढें.
  मुझे लगता है, कि यदि मैने इस पुस्तक चर्चा को समापन की ओर नहीं मोड़ा तो, धीरे-धीरे पुस्तक के सारे अंश यहीं आपको पढवा दूंगी.  उपन्यास का अन्त इतना मार्मिक और चौंकाने वाला है, कि पढ के पाठक अचानक ही यथार्थ की ज़मीन पर गिरता है. उसे समझ में आता है, कि एक किसान की आत्महत्या का कारण, केवल फ़सल का खराब हो जाना नहीं होता. उसकी मौत का ज़िम्मेदार मौसम से अधिक प्रशासन होता है.
अन्त में इतना ही कहूंगी, कि इस उपन्यास को लिखने में जितनी मेहनत पंकज ने की है, वो पूरी की पूरी हमें दिखाई देती है. एक किसान के जीवन को आत्मसात किया है पंकज ने.  जैसे पूरे सरकारी महकमे की नस नस में बहे हैं खून बन के. हर बात का इतना सजीव चित्रण है कि पढते हुए लगता है जैसे सारा कार्यकलाप पंकज देखते रहे हों, अदृश्य हो के.
 जब भी कोई कथाकार/उपन्यासकार रचना प्रक्रिया से गुज़र रहा होता है, तब वो खुद अपने पात्रों में शामिल हो जाता है. उपन्यास के सारे पात्र उसके अगल-बगल घूमते हैं. मैं निश्चित तौर पर कह सकती हूं, कि रामप्रसाद के दुख को जीते समय पंकज खुद कई बार रोये होंगे. और जब उपन्यास पूरा हुआ होगा, तब पता नहीं कितने दिनों तक पंकज खुद को अकेला, और रामप्रसाद की मौत पर ठगा हुआ महसूस करते रहे होंगे. बहुत दिनों बाद उबर पाये होंगे इस उपन्यास से. मैं आज भी “अकाल में उत्सव “ की गिरफ़्त में हूं. इसे पढने के बाद अब कुछ और पढने का मन ही नहीं हो रहा.
किसानों के साथ की गयी  पंकज की  तपस्या सफल हुई है, इस अद्भुत उपन्यास के रूप में. ये उपन्यास एक नहीं, अनेक विशिष्ट पुरस्कारों से नवाज़ा जायेगा, नवाज़ा जाना चाहिये. एक बार फिर बधाई और आशीर्वाद. लिखते रहें इसी प्रकार.
उपन्यास : अकाल में उत्सव
लेखक : पंकज सुबीर
प्रकाशक : शिवना प्रकाशन,
पी.सी. लैब, सम्राट कॉम्प्लैक्स बेसमेंट
बस स्टैंड, सीहोर- 466001 (म.प्र.)
मूल्य : 150 रुपये
ISBN : 978-93-81520-29-1


रविवार, 17 जनवरी 2016

याद-ए-मकर संक्रान्ति

सर्दिया शुरु होते ही मेरे ज़ेहन में जो त्यौहार ज़ोर मारने लगता है वो है मकर संक्रान्ति. सर्दियों में आने वाला एकमात्र ऐसा बड़ा त्योहार
जिस पर हमारे घर में बड़े सबेरे नहा लेने की बाध्यता होती थी. इधर जनवरी शुरु हुई, उधर हमारे घर में सन्क्रान्ति की तैयारियां शुरु . कम से कम पांच प्रकार के लड्डुओं
 की तैयारी करनी होती थी मम्मी को. ज्वार, बाजरा, मक्का और उड़द की दाल की पूड़ियां, मूंग दाल की मंगौड़ियां, और कई तरह के नमकीन. अब सोचिये, इतना सब करने में समय लगेगा न? वो समय पैकेट बन्द तैयार आटा मिलने का नहीं था. अब तो बाज़ार जाओ और ज्वार/बाजरा/मक्का जो चाहिये, उसी का आटा एकदम तैयार, पैकेट में सील-पैक घर ले आओ.  हमारे बचपन में ये सारे आटे अनाज की शक्ल में मिलते थे, जिनसे चक्की पर जा के आटा बनवाना पड़ता था.
हमारे घर लड्डू बनाने की शुरुआत मम्मी संक्रान्ति के दो दिन पहले कर देती थीं. आटे के लड्डू, लाई के लड्डू, तिल के दो तरह के लड्डू, नारियल के लड्डू और मूंगफ़ली के लड्डू. संक्रान्ति की सुबह सारे बच्चों को रोज़ की अपेक्षा जल्दी जगा दिया जाता. सर्दियों में सुबह छह बजे उठना मायने रखता है. उठते ही सबको दूध मिलता और बारी-बारी से नहा लेने का आदेश पारित होता. आंगन में एक कटोरे में पिसी हुई तिल का उबटन रक्खा होता, जिसे पूरे शरीर पर लगा के नहाने की ताक़ीद होती. बहुत सारे लोग तो इस दिन शहर के पास बहने वाली नदी में डुबकी लगाने जाते, और इसीलिये बुन्देलखण्ड में मकर संक्रान्ति का एक और नाम “बुड़की” भी प्रचलित है. तो इतनी सुबह नहाना, वो भी ठंडे पानी से!!! नहाने में आनाकानी करने वाले को कहा जाता कि- “यदि तुमने नहीं नहाया तो तुम लंका की गधी/गधा बनोगी अगले जन्म में. “ तब तो मैं छोटी थी, सो इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया कि आखिर लंका की गधी/गधा ही क्यों बनेगा कोई? लेकिन अब जरूर ये सवाल ज़ेहन में आता है तो पता करने की कोशिश भी करती हूं. लेकिन अब तक कोई सटीक जवाब नहीं मिल सका, जबकि मकर संक्रान्ति के दिन न नहाने वाले को यही कह कर डराने का चलन आज भी है.

तो भाई, सारे बच्चे नहा-धो के तैयार हो जाते. जो बच्चा नहा के निकलता, मम्मी उसके हाथ-पैरों में सरसों के तेल की हल्की मालिश करतीं, अच्छे कपड़े पहनातीं और कमरे में जल रही  गोरसी (  सर्दियों में आग जलाने के लिये इस्तेमाल किया जाने वाला मिट्टी का चौड़ा पात्र,  जिसमें हवन भी किया जाता है) के सामने बिठाती जातीं. जब सबने नहा लिया तो हम सब पूजाघर में इकट्ठे होते. यहां भगवान पर फूल चढाते, पहले से जल रहे छोटे से हवन कुंड में तिल-गुड़ के मिक्स्चर से हवन करते और वहीं बड़े से भगौने में रखी कच्ची खिचड़ी ( दाल-चावल का मिश्रण) पांच-पांच मुट्ठी भर, थाली में निकाल देते. काले तिल के लड्डू भी पांच-पांच की संख्या में ही निकालते. ये अनाज और लड्डू, गरीबों को दिया जाने वाला था.
इसके बाद हम सब फिर गोरसी को घेर के बैठ जाते और फिर शुरु होती पेट-पूजा. मम्मी सुबह हरे पत्तों वाली प्याज़ की मुंगौड़ियां  बनातीं और थाली में भर के बीच में रख देतीं. हम सब बच्चे मिल के उस पर हाथ साफ़ करते जाते. उड़द/ज्वार और मक्के की पूड़ियां भी सुबह ही बनतीं. दोपहर के खाने में केवल खिचड़ी बनती. ये खिचड़ी भी नये चावल से बनाई जाती. खिचड़ी खाने के विधान के चलते ही इस त्यौहार का नाम “खिचड़ी” भी है बुन्देलखंड में.  शाम को फिर मूंग की मुंगौड़ी, पूड़ियां, तरह-तरह के लड्डू और शक्कर के घोड़े/हाथी, जो बाज़ार से खरीदे जाते. गन्ने भी पूरे बाज़ार में बेचने के लिये लाये जाते. तो ये है बुन्देलख्न्ड की मकर संक्रान्ति… कृषि-प्रधान देश का कृषि आधारित साल का पहला त्यौहार.  देश के तमाम हिस्सों में इस दिन पतंगबाज़ी का भी रिवाज़ है. खासतौर से गुजरात और राजस्थान में.
ये एकमात्र ऐसा त्यौहार है जिसे अलग-अलग प्रदेशों में, अलग-अलग  नामों से जाना जाता है. मकर संक्रान्ति, पंजाब और हरियाणा में “लोहिड़ी”  के नाम से मनाई जाती है तो असम में यही “बिहू” हो जाती है. वहीं दक्षिण भारत में इसे “पोंगल” के नाम से मनाते हैं. दक्षिण में यह त्यौहार चार दिन तक मनाया जाता है. तिल-चावल और दाल की खिचड़ी

के अलावा यहां “पायसम” जो कि नये चावल और दूध से बनी विशेष प्रकार की खीर को कहा जाता है, भी बनाते हैं.
मकर संक्रान्ति के दिन भगवान भास्कर अपने पुत्र शनिदेव से स्वयं मिलने आते हैं. चूंकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, इसलिये इस त्यौहार को “मकर संक्रान्ति” के नाम से जाना गया. महाभारत में भीष्म पितामह ने शरीर त्यागने के लिये, मकर संक्रान्ति का दिन ही चुना था. तो तमाम पौराणिक/भौगोलिक/ और पर्यावरणीय महत्व वाले इस त्यौहार को आइये मनाते हैं पूरे रीति-रिवाज़ के साथ, क्योंकि इस की हर रीति में छुपा है आयुर्वेद का कोई न कोई राज़… आप सबको मकर संक्रान्ति की अनन्त शुभकामनाएं.