बुधवार, 16 सितंबर 2020

अटकन-चटकन: प्रतिक्रियाएं

रामरतन अवस्थी
मेरे पापाजी इन दिनों अस्वस्थ हैं। बेहद कमज़ोर हो गए हैं। लेकिन हमेशा साहित्य सृजन करने वाले हाथ भी कभी अशक्त होते हैं? उनके हाथों का कम्पन कलम की पकड़ को कमज़ोर नहीं कर पाता। अपनी इस अस्वस्थ अवस्था में भी उन्होंने न केवल 'अटकन-चटकन' पढा, बल्कि उस पर समीक्षा भी लिखी, वो भी अपने हाथ से।  
पापाजी को उपन्यास पसन्द आया, समझिए ठीकठाक लिख गया है। ये समीक्षा मेरे लिखे पर सर्वोच्च अवार्ड सी है। आप भी देखें-

अटकन-चटकन : मेरी दृष्टि में
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सद्य: प्रकाशित उपन्यास "अटकन-चटकन" अपनी चटक - मटक के साथ मेरे सामने टेबिल पर सुशोभित है। पुस्तक का आवरण पृष्ठ इतना आकर्षक  और जीवंत है,  कि पाठक की दृष्टि कुछ पलों को ठहर सी जाती है।
आवरण पृष्ठ का शीर्षक और चित्रांकन उपन्यास की कथावस्तु का सूत्र रूप में द्योतक है, यह इस कृति की विशेषता है। 
उपन्यास का कथानक बुन्देलखण्ड क्षेत्रान्तर्गत ग्राम्य जीवन पर आधारित है। मुझे प्रसन्नता है कि लेखिका वन्दना ने प्रायः उपेक्षित बुन्देलखण्ड की सुधि लेकर साहित्यकारों और पाठकों का ध्यान इसकी ओर आकर्षित किया है। 
गाँव के एक समृद्ध किसान श्री तिवारी जी अपने बड़े परिवार सहित निवासरत हैं। उनके परिवार में दो बहुएं हैं- सुमित्रा और कुंती। उपन्यास का सम्पूर्ण कथानक इन्हीं दोनों के चरित्र के इर्द गिर्द घूमता है। कहानी की मुख्य पात्र भी यही दोनों हैं। सुमित्रा एक सुंदर पात्र है, तन से भी और मन से भी। सहज, सरल, सुशील और शालीनता उसके स्वाभाविक गुण हैं, तो  उससे उलट कुंती, छल-कपट, ईर्ष्या-द्वेष, और बेईमानी की साक्षात मूर्ति। वह सुमित्रा का जीवन, जीना दूभर कर देती है। हाँ उसे कुछ सबक सिखाया तो उसकी बहू जानकी ने , जिसने ' शठे शाठ्यम समाचरेत' की शैली में व्यवहार करके कुंती को सुधर जाने हेतु बाध्य किया है। कुंती के सुधार हेतु प्रमुख भूमिका सुमित्रा की ही रही है।
उपन्यास में कथानक इतना जीवंत और स्वाभाविक है कि उसके पात्र, पाठक के सामने ही अभिनय करते प्रतीत होते हैं।  कृति की भाषा शैली बोधगम्य है- कहीं भी कृत्रिमता नहीं।
अल्प समय में ही 'अटकन-चटकन' बहुत लोकप्रिय और बहुचर्चित हो गया है। सुधि पाठकों की प्रतिक्रियाएं इसका साक्षात प्रमाण हैं। लेखिका की इस सफलता के लिए उन्हें हार्दिक बधाई। 
लेखिका वन्दना की जिस बात से मैं सर्वाधिक प्रभावित हूँ वह है उपन्यास में बुंदेली भाषा का सम्यक प्रयोग। कृति का प्रायः प्रत्येक पात्र अपने संवादों में बुंदेली का यथानुरूप सही प्रयोग करता है। उपेक्षित बुंदेली को सम्मान देकर लेखिका ने बहुत ही सराहनीय कार्य किया है। बुंदेली साहित्यकारों के लिए यह अनुकरणीय कृत्य होगा। 
वन्दना अवस्थी दुबे एक स्थापित साहित्यकर हैं । उन्होंने 'अटकन-चटकन' एक सफलतम उपन्यास देकर साहित्य जगत की बड़ी सेवा की है। ईश्वर करे वे भविष्य में भी अनेक कृतियाँ देकर साहित्य जगत को उपकृत करती रहें। हमारे अमित आशीर्वाद सदैव उनके साथ हैं।
#अटकनचटकन

सूर्यबाला लाल
धर्मयुग के ज़माने से जो लेखिकाएं मुझे बहुत प्रिय रहीं, उनमें से एक मुख्य नाम है सूर्यबाला दीदी का। उन्होंने उपन्यास पढा, अपने हाथ से टिप्पणी लिखी, मुझे तो जैसे जन्नत मिल गयी। कथाजगत का स्थापित नाम है सूर्यबाला दीदी का उनका आशीर्वाद मिलना ही मेरे लिए बहुत बड़ी बात है। आप भी देखें- 

अटकन- चटकन
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प्रिय वन्दना,
तुम्हारे 'अटकन-चटकन' का पहला वाक्य ही "जिज्जी हमें अपने पास बुला लो" बड़ा हठीला निकला। ज़िद्दी बच्चे की तरह मुझसे पूरा उपन्यास पढ़वा ले गया। 
जी भर छकाया। नई, पुरानी कहानी और लोककथा , बोधकथा की सी शैली में रसकथा का सा समां  बांधती , बुंदेली की मिठास घोलती, जितनी विश्वसनीय, उतनी ही अविश्वसनीय , कहीं दिलचस्प तो कहीं हैरत में डाल देने वाली , अजीबोग़रीब चक्करदार गलियों से घुमाती अपने शरारतीपन में ही पूरी पुस्तक पढ़वा ले जाती है तुम्हारी कलम।
अनौपचारिक, घरेलू सी आत्मीय लोकभाषा का रचाव लिए अतिरेकी चरित्रों को भी बख़ूबी अपने हुनर से सँभाल ले जाती है। यहाँ मनोविज्ञान भी है, त्रिया चरित्र भी । स्मृतिकोषों के मोहक नेपथ्य हैं तो बतकही का आनन्द और  तृप्ति भी। और सबके ऊपर , पाठक की उँगली न छोड़ने का बालहठ !!
स्नेहाशीष
सूर्यबाला
 #अटकनचटकन
GT eng
फेसबुक पर वे GT Eng के नाम से लिखते हैं। बहुत सुलझी हुई टिप्पणियां होती हैं उनकी। लिखने पढ़ने के शौक़ीन हैं। बातों वाली गली पर भी आपकी बेहतरीन टिप्पणी आई थी, कल अटकन चटकन पर भी आ गयी। आज उनसे नाम पूछ ही लिया। तो साथियो, GT साब का नाम 'विजय' है 😊 दिल से आभारी हूँ आपकी 🙏

"अटकन चटकन "   वंदना  अवस्थी  जी  का  लिखा  उपन्यास  कल  ही  मिला. ग्रामीण  परिवेश मे  पले  बढ़े  मेरे  जैसे  लोग  इस  तरह  के  लेखन  को  एक साँस में  ही  पढ़ते  है. वंदना जी  अपने  लेखन में  जिस  तरह  बुंदेली  का  रस  निचोड़ती है  वो  ग्रामीण  परिवेश को  आपकी  आँखों के  सामने  जीवंत कर  देता  है.  मैं   पूरब, पश्चिम ,उत्तर, दक्षिण पूरे  भारत  मे  घूमा हूँ  औऱ  80-90 के  दशक  से  हर  जगह ग्रामीण  परिवेश से  रुबरु  होने  का  सौभाग्य  मुझे  मिलता  रहा  है  इसलिये  एक  बात  दावे  से  कह  सकता  हूँ  कि  बेशक  भाषायें  अलग  हो  लेकिन  ग्रामीण  परिवेश  और  परिदृश्य  लगभग  वहीं  है  सब  जगह  एक  जैसे. और इस परिदृश्य  को   एक  चल चित्र  की  तरह  आपके  सामने   प्रस्तुत  कर  देती  है  वंदना  जी . अटकन चटकन  पढ़  के  आपको  महसूस  ही  नहीं  होगा  ये  एक  उपन्यास  है. पात्रों  के  नाम  बदल के  देखने  की  भी  जरूरत  नही  होगी ,कहीं  हमारे  अपने  ही  घर  से  जुड़े  प्रकरण  मिलेंगे कहीं  किसी  जान  पहचान  वाले  के  घर  की  स्थिति  परिस्थितियों  से  साम्य ,  और  ये सब आपको  ये  सोचने  का  अवसर  ही  नहीं  देता  की  आप  कोई  उपन्यास  पढ़  रहे  है.  चमाट..., गरुड़...., मूँछों  में  मुस्कराती  कुंती....  कुल  मिला कर कमाल  का  कथा  शिल्प  है. "चौदह भाई  तीन  बहनें " ये  वाक्य संयुक्त  परिवार  के  उस  समय  को सजीव  कर  देता  है  जिसे  हमने  स्वयं  अपनी  आँखों  के  सामने टूटते   बिखरते  देखा  है.   ऐसे  परिवारो  में बड़े  आपस  में  कितना  भी  वैमनस्य  रख  ले  लेकिन  बच्चों  के  प्रति  प्रेम  निस्वार्थ  और  निश्चल  होता  था  सभी  का. उस  सारे  परिवेश  परिदृश्य से  इतनी  सजीवता  से  रूबरू  कराने  के  लिए  वंदना  जी  का  बहुत-बहुत  धन्यवाद  और  बधाई  एक  शानदार  , जानदार  और  सफल  उपन्यास  के  लिये.
विवेेेक रस्तोगी
आज वंदना अवस्थी दुबे जी का उपन्यास "अटकन चटकन" किंडल अनलिमिटेड में पढ़ने को मिल गया।

लगभग 2 घन्टों में एक ही बैठक में पूरा उपन्यास पढ़ गया व हाथों हाथ अमेजन पर रिव्यू भी डाल दिया।

पता ही नहीं था कि वंदना जी के शब्दों में इतना जबरदस्त जादू है, अब उनके लिखे और भी उपन्यास पढ़ना ही होंगे।

अमेजन पर लिखी प्रतिक्रिया -

बहुत दिनों बाद इतना बेहतरीन उपन्यास पढ़ने को मिला, जहाँ ग्रामीण परिवेश में परिवार के सदस्यों के भोलेपन व चालाकी को प्रदर्शित किया गया है। ग्रामीण भाषा तो मन मोह लेती है, कई बार तो बहुत से संवादों को बार बार पढ़कर रस लेने की चाहत होती है, बहनों के रिश्ते मायके और ससुराल में कैसे रहे, और समझदार को हमेशा ही समझदारी से काम लेना चाहिये, यह पात्रों के माध्यम से सीखने को मिलता है।

बहादुर सिंह परमार
वंदना अवस्थी दुबे के शिवना प्रकाशन से छपा  लघु उपन्यास 'अटकन चटकन' अपने आप में अनूठा है। इसकी कथा कुंती और सुमित्रा के इर्द-गिर्द घूमती है। दोनों चरित्र अपने आप में अनूठे हैं। ऐसी भी सगी बहनें हो सकती हैं? पहले तो अविश्वास सा लगता है किन्तु जैसे जैसे कहानी आगे बढ़ती है कथा की विश्वसनीयता की दर भी बढ़ती जाती है। एक सामूहिक परिवार पर भौतिकवादी युग के प्रभाव किस प्रकार पड़ा है? इसको बहुत बारीकी से देखा है कथाकार ने। बुन्देलखण्ड के पिछले पचास सालों की सामाजिक सांस्कृतिक स्थितियों की प्रस्तुति हुई है इसमें। कथा पाठक को बांधकर रखती है। भाषा भावानुकूल व स्थानीय पात्रों के अनुसार है। यह कथा अपने आप में अद्भुत व विशेष है। मेरी ओर से आदरणीया वंदना जी को बधाई। भैया इंजीनियर आर एस नायक व शीला नायक जी को पुस्तक उपलब्ध कराने के लिए धन्यवाद।

अटकन- चटकन : कुछ प्रतिक्रियाएं

शिउली सिंह
Shiully Singh उन प्रबुद्ध पाठकों में से हैं, जिनकी दम पर आज भी किताबें छप रहीं। वे मेरी बेटी की तरह हैं लेकिन हमारे बीच चर्चाएं दोस्तों की तरह होती हैं। अपने काम के प्रति बेहद ईमानदार लड़की। जितनी कर्मठ, बुद्धिमान उतनी ही सहज और सरल भी। देखें क्या लिखा है शिउली ने-
अटकन चटकन
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आज मैने आपका पहला उपन्यास अटकन चटकन  पूरा किया! पिछली बार की ही तरह इस बार भी जो पढ़ने बैठी तो एक बार में ही समाप्त करके उठी
कथा इतनी रोचक है कि जब तक अंत न पढ़ लो दिमाग में बस वही चलता रहता है कि आगे  क्या होगा
अटकन चटकन के रूप में मुझे बुंदेलखंड के ग्रामीण परिवेश को जानने का सौभाग्य मिला और इतनी सधी हुयी भाषा शैली के कारण लगता है जैसे हम प्रत्यक्ष उस कहानी को अपने सामने चलता देख रहे हैं॥ 
पढ़ने के दौरान जैसे हम भी उस कहानी के पात्र हो जाते हैं ॥ बाकी आप मेरे लिए श्रद्धेय हमेशा से ही हैं, इसलिए इस सफल और रोचक कृति के लिए मेरी बधाई और प्रणाम स्वीकार करें।
#अटकनचटकन

गिरिजा कुलश्रेष्ठ
गिरिजा कुलश्रेष्ठ .... ये नाम है एक लब्ध प्रतिष्ठ कथाकार का, जिनकी कहानियां पाठक को झकझोर देती हैं। जिनकी गायकी सीधे दिल में उतरती है , सादगी और  सरलता के आगे बच्चे भी फीके पड़ जाएं... उन्हीं गिरिजा दीदी ने लिखा है अटकन चटकन के लिए। आप भी पढ़ें-

अटकते चटकते रिश्तों का खूबसूरत दस्तावेज 
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“अटकन चटकन दही चटाकन 
बाबा लाए सात कटोरी 
एक कटोरी फूटी तामें भौजी रूठी 
नई कटोरी लाएंगे ,भौजी को मनाएंगे “
वन्दना जी के उपन्यास का नाम (अटकन चटकन) सुनते ही बचपन का यह छोटा सा बालगीत याद आगया और इस कृति को पढ़ डालने की उत्सुकता जाग उठी . वैसे भी वन्दना मेरी पसन्दीदा लेखिका ,गायिकाऔर आत्मीया मित्र हैं .  उनका कहानी संग्रह 'बातों वाली गली 'पढ़ चुकी हूँ  .यह उपन्यास आया तो  तुरन्त ऑर्डर किया हाथ में आते ही पढ़ने बैठ गई . एक ही बैठक में लगभग पूरा उपन्यास पढ़ डाला .  उपन्यास अपेक्षाकृत छोटा भी है ( इतना भी छोटा नहीं कि एक बैठक में पढ़ा जा सके ) असल में एक साथ पढ़ डालने का कारण इसकी लघुता नहीं ,आत्मीयता व रोचकता है . भाषा संवाद परिवेश सब कुछ अपना सा .हालांकि पूरे उपन्यास में बचपन के उस बालगीत से जुड़ा तो कोई प्रसंग नहीं है पर कहानी शीर्षक को पूर्णतः सार्थक करती है . रिश्तों की अटकन यानी अटकाव प्रेम और चटकन यानी दरार रिश्तों की दीवार में . यानी पूरा उपन्यास केवल दो बहिनों की अटकन और चटकन पर ही बुना गया है . यह मेरा अपना विचार है . संभवतः वन्दना ने भी इसी अर्थ के साथ यह शीर्षक रखा होगा . खैर...
पूरा कथानक ,अन्त तक ,दो सगी बहिनों सुमित्रा और कुन्ती के आसपास घूमता है .बड़ी सुमित्रा अपनी छोटी बहिन कुन्ती के लिये जो बाद में उसकी जेठानी भी बन जाती है ,जितनी स्नेहमयी सहनशीला और उदारमना है ,कुन्ती उतनी ही संकीर्ण-हदया ,विद्वेषिनी , हीनताग्रस्त और अपने लक्ष्य को पूरा करने छल और झूठ का सहारा लेने वाली है . वह जब भी मौका मिलता है सुमित्रा को नीचा दिखाने की कोशिश करती है लेकिन सुमित्रा बड़ी उदारता के साथ उसे माफ करती जाती है . इसका परिणाम भी कुन्ती को मिलता है . उसे उसके बच्चे तक सहन नहीं करते . बहू उसके अत्याचार का खुलकर विरोध करती है ..कुन्ती की सारी क्रूरता दीनता में बदल जाती है . वह अन्ततः उसी बहिन को फोन करती है , जिसे एक लम्बे समय तक कुन्ती आहत करती रही है  (यहीं से उपन्यास शुरु होता है ) ठोकरें खाने के बाद अन्त में कुन्ती सुधर जाती है .बस इतनी सी और सामान्य सी बात है न ? लेकिन इसी कथ्य को लेकर घर--आँगन के कोने कोने में , भावनाओं के हर मोड़ पर वन्दना जिस अपनेपन और खूबसूरती के साथ झाँकी ही नहीं हैं बल्कि पूरे अधिकार के साथ विराजमान है . बड़े और भरे पूरे संयुक्त परिवार की छोटी से छोटी बातों को लेकर एक जीवन्तता के साथ . यही इस कृति की सबसे बड़ी विशेषता है . वे किसी प्रसंग के लिये अपनी तरफ से कोई वर्णन या निष्कर्ष नहीं देती बल्कि घटना का जीवन्त चित्रण उस बात का गवाह बनता  है . मैं तो चकित हूँ कि किस कौशल के साथ बुना है कथा को .
यह वन्दना जी की मौलिकता और विशेषता है कि वे हर घटना व प्रसंग को किस्सा की तरह सुनाती हैं , पाठकों को सामने बिठाकर उनसे बात करती हुई . जैसे,  “आप सोच रहे होंगे कि .”....चलिये पहले उस घटना के बारे में बताते हैं .”...”आपके मन में यह सवाल जरूर होगा कि तिवारी जी ने कुन्ती को कुन्ती भाभी क्यों कहा ..तो सुनिये ..”.वगैरा . पाठक कदम कदम पर मौजूद है उपन्यास में . जहाँ तक शिल्प की बात है तो वह बहुत ही सहज और रोचक है मानो कि रजाई में पाँव डाले आराम से बैठकर लेखिका हमें कोई किस्सा सुना रही हैं .बीच बीच में जो भी याद आता है जोड़ती जा रही हैं .. सायास कुछ भी नहीं लगता . ऐसा तब होता है जब कथानक रचनाकार का इतना देखा और भोगा हुआ होता है कि कुछ सोचने ,उलझने या रुकने की जरूरत ही नही होती . पाठक को ऐसा अनुभव होना रचना की सफलता व उत्कृष्टता है . अटकन चटकन में यह बात बखूबी दिखाई देती है .
उपन्यास भाषा आंचलिकता के सौन्दर्य से रची बसी है .घिचिया मसक देना , भकोसना ,पुसाना धमधूसड़ी ,गुड़ताल ( मुरैना की तरफ गुन्ताड़ बोलते हैं ),तनक..मौड़ी , जैसे शब्द मेरे विचार से टीकमगढ़ ,छतरपुर के आसपास की बुन्देली है . बोली के बारे में कहा गया है कि कोस कोस पर बदले पानी , चार कोस पर बानी ..बुन्देलखण्ड में भी बोली के अलग अलग रंग देखने मिलते हैं . मुझे उपन्यास की बोली और संवादों में आनन्द आया . संवाद छोटे हैं जिनमें बुन्देली का माधुर्य है .
कहीं कहीं मुझे चरित्रों के एक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण की अपेक्षा महसूस हुई  है . जैसे कि कुन्ती ने अकारण ही भाभी की नई साड़ी का पल्ला फाड़ दिया और उसे सुमित्रा के नाम जोड़ दिया .ऐसा निकृष्ट कार्य करने से पहले उसने क्या क्या सोचा होगा तब इस स्तर पर गिरी होगी ..ऐसे ही दूसरे प्रसंगों के पीछे अगर उसकी मनोदशा का चित्रण भी होता ..इसी तरह सुमित्रा जी कुन्ती के प्रति असीमित रूप से उदार हैं पर उसके पीछे उनके भावों का भी वर्णन होता .(.हालांकि है ,लेकिन और भी अपेक्षित है .)..तो कृति में और भी चार चाँद लग जाते . जो भी हो , अटकन चटकन रिश्तों का खूबसूरत दस्तावेज है ही , लॉकडाउन काल में लिखे जाने के कारण एक इतिहास भी है लेखिका के दृढ़ संकल्प ,परिश्रम और लगन का ..समय को मुट्ठी में बाँध लेने का . जहाँ हम जैसे लोग समय को चूहों की तरह कुतरते काटते रहे , ‘जिज्जी’ ने एक अदद उपन्यास लिख डाला . यह बड़ी प्रेरणा है हम सबके लिये . इस बात के लिये उनको बहुत सारी बधाइयाँ .
#अटकनचटकन

उर्मिला सिंह
उर्मिला दीदी उन विशिष्ट पाठकों में से हैं जिनके पास विस्तृत अध्ययन और सुलझी हुई सोच है। उनके द्वारा किसी पुस्तक की समीक्षा की जाए ये लेखक और पुस्तक दोनों का सौभाग्य है। आइये देखें क्या लिखतीं हैं Urmila Singh दीदी अटकन चटकन के बारे में-

अटकन-चटकन
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मैंने सोचा था कि 'बातों वाली गली' के बाद वन्दना की अगली किताब का नाम 'फूलों वाली गली' या 'काँटों वाली गली' जैसा कुछ होगा। ऐसा होने में कोई सन्देह भी नहीं था किन्तु अच्छा हुआ जो बाबूजी ने इसका नाम 'अटकन चटकन' रख दिया। हालाँकि कथ्य को देखते हुए यह उपन्यास 'झगड़ों वाली गली' की याद दिलाता है।

मैं बहुत दिनों से इस सोच में थी कि वन्दना की अगली किताब कब और कैसे पूरी होगी जबकि उनका सारा दिन साधन-सुविधाहीन बच्चों के लिए समर्पित रहता है। दिन के कई घन्टे स्कूल और ट्यूशन को देने के बाद उनके पास समय बचता ही कितना है? सम्भवतः लॉक डाउन से मिले समय के कारण ही यह किताब पूरी हो सकी।

कहानी उस जमाने से शुरू होती है जब जीवन और समाज में नैतिक मूल्यों का बड़ा सम्मान था। परिवार में प्रेम और सहयोग की भावना रहती थी। संयुक्त परिवार, ग्रामीण और कस्बाई संस्कृति को जीवंत करता यह उपन्यास एक पूरा कालखंड अपने में समेटे हुए है। कहानी में रोचकता और प्रवाह इतना है कि कोई भी इसे एक बैठक में समाप्त कर सकता है।

सुमित्रा और कुंती दोनों के चरित्र मैं सख्त नापसंद करती हूँ। हालाँकि लेखक के अपने अनुभव होते हैं। वन्दना ने ऐसे चरित्रों को नजदीक से अवश्य देखा होगा। स्त्रियों के स्वभाव की एक बात मुझे हरदम खटकती रही है कि अपनी सास से प्रताड़ित होने वाली ज़्यादातर बहुएँ उसी परम्परा को आगे भी जीवित रखती हैं। वे अपनी बहू के साथ वही व्यवहार करती हैं जैसा उनके साथ हुआ। वे सोचती हैं कि जिस दुर्व्यवहार को हमने सहा है, हमारी बहुओं को भी उन्हीं अनुभवों से गुजरना चाहिए।
इस मानसिकता के चलते ज़्यादातर घरों में जो भी अप्रिय घटनाएँ घटती हैं, उसमें अस्सी प्रतिशत योगदान महिलाओं का होता है। इसी बिगड़ी हुई परंपरा के कारण नब्बे प्रतिशत क्षेत्रों में जिन महिलाओं को दूध और घी नहीं मिला, उन्होंने अपनी बहुओं एवं लड़कियों को भी इससे वंचित रखा।  मालकिन बन जाने के बाद अधिकांश बहुओं ने इस परम्परा में किसी सुधार या संशोधन की कोशिश नहीं की।

वन्दना का पहला कहानी संग्रह 'बातों वाली गली' भी बढ़िया था। उस संग्रह की दो बड़ी कहानियाँ अपनी कथावस्तु और कसावट के कारण बहुत अच्छी बन पड़ी थीं। वन्दना की हास्यवृत्ति उनकी रचनाओं में भी भरपूर नज़र आती है। हास परिहास के अनेक प्रसङ्ग उनकी दोनों किताबों में मौजूद हैं।

मुझे यह बात भी हर्षित करती है कि वन्दना के सादगीपूर्ण और सरल स्वभाव का असर उनके लेखन पर भी स्पष्ट दिखाई देता है।
चूँकि विद्यालय अभी भी बंद चल रहे हैं अतः हम पाठक ये उम्मीद कर सकते हैं कि इस विस्तारित लॉकडाउन का फायदा उठाते हुए वन्दना बहुत जल्द अपनी तीसरी किताब पूर्ण कर लेंगी। रही बात प्रकाशन की तो उसके लिए अपने बन्धु पंकज सुबीर हैं ही।

निरुपमा चौहान राघव
हम अब तक फेसबुक फ्रेंड नहीं थे, लेकिन व्हाट्सएप ग्रुप 'गाएं गुनगुनाएं शौक़ से' की वजह से अजनबी भी नहीं थे। आज जब Nirupma Chauhan Raghav की ये प्यारी सी टिप्पणी मिली तो हम उछल पड़े। बहुत स्नेह निरुपमा ❤️

अटकन चटकन
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वंदना अवस्थी दुबे - आप के लेखन से ये मेरा पहला परिचय है जबकि आपकी गायकी की मैं भी फैन हो गईं हूँ ... अटकन चटकन ... नाम से ज्यादा समझ नहीं आ रहा था और उपन्यास पढ़ने का बेहद मन था तो झट से Amazon तलाशा उसका थोड़ा नखरा देखा तो Kindle का रुख किया और वहाँ ये उपन्यास देख कर  download किया ... बस फिर क्या था जो पढ़ना शुरू किया खत्म करके ही छोड़ पाये 🧡उपन्यास के पात्र कथानक सब बहुत ही रोचक, मन को बांधने वाला आपका लेखन मन को बहुत भाया एकदम मौलिक . एक दिन अच्छी किताब खत्म करके उसे जज्ब करने में लगता हमें तो, खो ही जाते हैं  सब पात्रों और कथानक में , तभी आज थोड़ा चैतन्य होने पर आपको बताने का मन किया अपने मन के भाव और जो हमें बहुत ही भाया वो आपके लिखने का style बिल्कुल कहीं भी नहीं लगा कि अरे ये इसके जैसा या उसके जैसा... अटकन चटकन के वैसे तो सभी पात्र अपने से लगे लेकिन ये कुंती . . . भगवान न मिलायें ऐसी देवी से😁इतने रोचक और बेहतरीन उपन्यास के लिये बहुत बधाई और हमें आगे भी बहुत इंतजार रहेगा लिखती रहिये बहुत शुभकामनाएं💐
#अटकनचटकन

शनिवार, 5 सितंबर 2020

अटकन चटकन : प्रतिक्रियाएं


रश्मि रविजा:
Rashmi Ravija..... ये वो नाम है जिसके साथ लड़ना, झगड़ना, बहस, सलाह मशविरा, दुख-दर्द, खुशी-ग़म सब बंटते हैं..... कुछ बुरा लगता है तो सामने से बोल देते हैं हम दोनों ही, लेकिन हमारा रिश्ता अपनी जगह मजबूती से खड़ा रहता है। अटकन चटकन के लिए जो रश्मि ने लिखा, ये केवल वही लिख सकती थी। बहुत प्यार रश्मि
 ❤️
सम्भवतः सबसे पहले वंदना अवस्थी दुबे  का उपन्यास 'अटकन चटकन' मैंने ही बुक किया था . समय से मिल भी गया . पर मैंने खुद के सामने ही एक शर्त रख दी. मुझे एक लेखनकार्य पूरा करना था . मैंने स्वार्थी बनकर शर्त रखी कि पहले काम खत्म  करो फिर किताब पढने के लिए मिलेगी. तो शुक्रिया वंदना के इस उपन्यास का जिसने मुझ आलसी से वह कार्य पूर्ण करवा लिया. :) काम खत्म करते ही किताब उठा ली. उपन्यास इतना रोचक है कि एक सिटिंग में ही पढ़ भी ली. वंदना को बहुत बधाई 

अटकन चटकन 
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सबसे पहले  किताब के शीर्षक का जिक्र .वंदना ने पहले कुछ और शीर्षक रखा था, मैंने पूछा भी था कि इसे बदलोगी ? क्यूंकि मुझे वह शीर्षक बहुत नहीं भाया था , शायद अजनबी शब्द की वजह से . जब पता चला चाचा जी ने यह 'अटकन-चटकन' शीर्षक चुना तो बहुत ख़ुशी हुई. (हमलोग अंकल वाले जमाने के नहीं, हमारे मुंह पर चाचा जी सम्बोधन ही आता है. :) )
'अटकन-चटकन' सुनते ही एक खुशनुमा सा अहसास होता है. खिलखिलाते, शरारत करते,चुलबुले से  बच्चों की छवि आँखों के सम्मुख तैर जाती है. उपन्यास का विषय वस्तु भी कुछ ऐसा ही है. दो हथेलियों सी बहनें ,जो अटकन-चटकन करती रहती हैं, पर कभी अलग नहीं होती. 

किताब की शुरुआत बहुत ही रोचक ढंग से होती है . लेखिका का पाठकों से सीधा संवाद होता है. ऐसा नहीं लगता कि कोई किताब पढ़ रहे हैं बल्कि यूँ महसूस होता है, सामने बैठी लेखिका के मुख से कहानी सुन रहें हों.

अक्सर किसी भी कथा की नायिका साहसी, अपने शर्तों पर जीने वाली, बहुत सशक्त महिला होती है या फिर दबी, सहमी, जमाने के जुल्म सहती पीड़ित महिला . पर इनसे इतर भी तो हमारे समाज में महिलायें हैं जो जलती-कुढती-कुचक्र रचती-प्रपंच करती रहती हैं. उनका जिक्र जरूर होता है पर उन्हें मुख्य पात्र के तौर पर कम ही चुना जाता है. इस उपन्यास के केंद्र बिंदु में एक ऐसी ही महिला है जिन्हें हम सबने कभी न कभी अपने आस-पास जरूर देखा है. यह भी देखा है कि एक ही माता-पिता की संतान कितनी अलग अलग प्रवृत्ति की हो सकती है. एक कुटिलता से भरी तो दूसरी सकारात्मकता की प्रतिमूर्ति . 

पुस्तक पढ़ते जाने कितनी ही बहनें नजरों के सामने से गुजर गईं जो उपन्यास की तरह एक्सट्रीम भले ना गईं हों  पर एक ने बेपनाह प्यार बरसाया, दुश्वारियों से बचाया  और दूसरी ने सिर्फ अपना मतलब साधा. मतलब निकल जाने पर आँखें फेर लीं...अगली बार जरूरत पड़ने पर फिर पास आ गईं और पहली ने गले से लगा लिया :) 

उपन्यास में एक संयुक्त परिवार के भीतर की झलकियाँ भी मिलती रहती हैं.  स्त्रियाँ मिलकर पूरा परिवार सम्भालती थीं. पर स्त्री-पुरुष में भेदभाव बना  रहता था .स्त्रियां गाय की सेवा करतीं, दूध उबालतीं-मक्खन निकलतीं-घी बनातीं पर दूध का एक गलास,मक्खन की एक डली भी उन्हें नसीब नहीं होती। दूध-घी-मक्खन के सेवन पर पुरुष का एकाधिकार रहता।
  फिर धीरे धीरे कैसे संयुक्त परिवार टूटते गए. लोग नौकरी के सिलसिले में शहरों में बसने लगे और गाँव की हवेली सूनी पड़ी रही. 
इस किताब में शिक्षा का  महत्व बहुत पुख्ता तरीके से स्थापित हुआ है. स्त्रियों की  शिक्षा कैसे उन्हें आत्मनिर्भर बनाती है, व्यर्थ के उधेडबुनों से दूर रखती है  और अपने पंख पसारने  के मौके देती है....यह सत्य पुरजोर रूप से उद्घाटित हुआ है. 

उपन्यास के पात्र बहुत जाने-पहचाने से लगते हैं, उम्र के किसी न किसी पडाव पर उनसे मुलाक़ात जरूर हुई होती है. जीवन से जुड़ी छोटी छोटी घटनाएँ, कहानी को बहुत रोचकता से आगे बढाती हैं. पात्रों  के बुन्देलखंडी भाषा में संवाद कथानक को  सहजता प्रदान करते हैं. आंचलिक भाषाओं में मैं अब तक भोजपुरी,मैथिलि, मगही, बज्झिका ही जानती थी . अटकन-चटकन के सौजन्य से अब लगता है काफी कुछ बुन्देलखंडी भी समझने लगी हूँ. 
    अब हमाय जो समझ में आओ हमने लिख दओ :) 
 

वंदना को इस उपन्यास की बहुत बधाई . वे इसी तरह समाज से अलग-अलग पात्र उठाकर उनपर उपन्यास रचती रहें....ढेरों शुभकामनाएं !!
#अटकनचटकन
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शिखा वार्ष्णेय :
विपरीत समय में यदि कोई सहारा बनती हैं तो वे हैं किताबें। हमेशा साथ। तो पिछले दिनों कई किताबें पढ़ डालीं। कुछ पहले की पेंडिंग थीं, कुछ एकदम नई। सबके बारे में बताएंगे एक एक करके। 

इसी दौरान एकदम ताज़ा ताज़ा आया वंदना अवस्थी दुबे का पहला उपन्यास। सहेली की किताब थी, बिना देर किए पढ़ डाली। 
"अटकन चटकन" दो विपरीत स्वभाव की बहनों की कहानी। ग्रामीण परिवेश, समस्याएं, दुविधाएं और फिर एक की साजिशों की दूसरी की उससे लड़ते रहने की कहानी। किसी प्राइम टाइम घरेलू सीरियल सा ताना बाना। बुंदेली का जबरदस्त तड़का मोहता है। बांध कर रखने वाली शैली। वह भी तब जबकि वह पहला उपन्यास हो।
हालांकि कथ्य मेरी पसंद का नहीं परंतु अपने अनूठे भाषा और शिल्प के कारण खुद को पूरा पढ़ा ले गई किताब। 
इसे अवश्य ही किसी टी वी सीरियल के निर्माता को भेजा जाना चाहिए। एक हिट सीरियल की गारेंटी।
 एक पठनीय उपन्यास के लिए लेखिका को बहुत बहुत बधाई।
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रामस्वरूप नायक
अटकन चटकन की आज की समीक्षा विशुद्ध पाठक की समीक्षा है। एक साहित्यिक समझ और रुचि वाला पाठक जब पुस्तक पर लिखता है तो ये लिखा जाना अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है, लेखक के लिए। श्री Ram Swaroop Nayak जी भी एक ऐसे ही साहित्यिक अभिरुचि सम्पन्न पाठक हैं। जो पेशे से अभियंता हैं लेकिन पढ़ने के बेहद शौक़ीन। आइये देखें क्या लिखते हैं आप-
अटकन-चटकन
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मैं सिर्फ एक पाठक की तरह साहित्य पढ़ने में रूचि रखता हूँ |  पेशे से अभियंता हूँ | 
किसी के लेखन पर टिप्पड़ी देना मेरे लिए अत्यंत दुरूह  कार्य है | फिर भी प्रयास करने में क्या बुराई है | 
उपन्यास का शीर्षक "अटकन-चटकन" ही पढ़ने हेतु कौतुहल पैदा करता है |  लेखिका की लेखन शैली व उपन्यास की पृष्ठभूमि अत्यंत आकर्षक बन पड़ी है |  स्थानीय बोली बुंदेली की झलक मोहित करती है | पूरे कथानक को कब कहाँ प्रस्तुत करना है , लेखिका इसमें पूर्णता: सफल रही हैं | पात्रों की रचना समाज में व्याप्त धारणाओं से मेल खाती है | उपन्यास रोचक है पर एक साथ पढ़ा जाना मुश्किल है |  कई जगह पढ़ते-२  अश्रु भी बह निकलते हैं , और उपन्यास पढ़ने के लिए अपने आप को पुनः तैयार  करना पड़ता है | मर्मस्पर्शी प्रस्तुति लेखिका की सफलता ही है जो पाठक की आँखों में महसूस हो सके | 

कहने को तो उपन्यास  दो बहनों के इर्द गिर्द ही घूमता है , एक सुमित्रा और दूसरी कुंती | सुमित्रा जहाँ रूपवान , प्रेम, स्नेह, धैर्य, दया, मित्रता , दुसरे की परवाह करने जैसे सद्गर्गुणो से परिपूर्ण , वहीँ  कुंती कुटिलता , चालाकी , ईर्ष्या , द्वेष , षड्यंत करना आदि दुर्गुणों के साथ रूपवती भी नहीं है | 

जो जैसा बोएगा वैसा काटेगा , यह कहावत भी चरितार्थ होती दिखाई पड़ती है , जब कुंती के पुत्र और नाती उसे वह अपनत्व और प्यार नहीं देते जिसकी उसको चाहत है | कुंती को तब भी कष्ट पहुँचता है जब उसे अपने पुत्रों के दो चेहरे दिखाई देते हैं , आभासी दुनिया में कुछ और वास्तविकता में कुछ और | 

कहते हैं न की अंत भला तो सब भला |  कुंती का सुमित्रा के प्रति श्रद्धा भाव दर्शाते हुए यह उपन्यास अपने समापन को प्राप्त करता है | 

पर मुझे लगता है, यह टिप्पड़ी अपने आप  में पूर्ण नहीं है | लेखिका के प्रति अन्याय होगा अगर मैं वह अनुभूति  व्यक्त न करूँ जो मुझे उपन्यास के पठन के दौरान  हुई | मुझे लगता ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि उपन्यास का मूल तत्त्व "प्रेम" ही है | प्रेम के कारण, दुसरे सद्गुण अपने आप प्रकट हो जाते हैं और जहाँ प्रेम नहीं होता वहीं ईर्ष्या, द्वेष, कुटिलता आदि अपने आप उभर आते हैं | कुंती और उसकी बहु के बीच टकराव भी प्रेम की अनुपस्थिति दर्शाता है, बहु इसकी स्पष्ट घोसणा  करती है कि कुंती के अंदर प्रेम है ही नहीं | 

अब दूसरी बात मन में यह उठती है कि क्या  कुंती सिर्फ अपनी कुरूपता के कारण और सुमित्रा के रूपवान होने से उससे ईर्ष्या रखती है | यह कहना उचित नहीं होगा | मेरा सोचना यही  है कि रूप से गुणों का कोई सम्बन्ध नहीं है | अतः कुंती अपने अवगुणों के लिए कुरूपता की आड़ नहीं ले सकती है | 

तीसरी बात मैं यह कहना चाहता हूँ कि जब प्रेम का प्रभुत्त्व होगा तो सारे दुर्गुण अपने आप विलुप्त हो जाएंगे और जो स्तिथियाँ "प्रेम" की अनुपस्थति में नरक का दृश्य पैदा करती रहीं वह सभी स्वर्ग का आभास देने लगेंगी | 

मेरा मत तो यही है कि उपन्यास में प्रेम की श्रेष्ठता ही सिद्ध होती है | जैसे की मैं पहले भी कह चुका  हूँ, पूरे उतार चढाव के बाद उपन्यास सुखांत में समाप्त होता है | 

मैं उपन्यास की लेखिका वंदना जी को इतनी सुन्दर रचना के लिए आभार व्यक्त करता हूँ और उनके उज्जवल भविष्य की कामना करता हूँ |  वह उत्तरोत्तर प्रगति करें एवं समाज को अपना श्रेष्ठ प्रदान करें | 

पुनः शुभकामनाओं सहित ,
राम स्वरुप नायक

सोमवार, 24 अगस्त 2020

अटकन-चटकन: कुछ प्रतिक्रियाएं


"लोहे का घर " फेम  Devendra Kumar Pandey जी मेरे ब्लॉगर साथी हैं। फेसबुक पर भी एक बात देवेंद्र भैया और मेरी कॉमन है, वो ये कि हम दोनों ही रेल यात्राएं लिखने के शौक़ीन हैं। देवेंद्र जी ने इतना कुछ लिख दिया अटकन चटकन के बारे में, कि मन प्रसन्न हो गया। आप भी पढ़ें-
अटकन-चटकन
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वंदना अवस्थी दुबे जी का नया उपन्यास अटकन चटकन घर मे आए भी कई दिन हो गए लेकिन पढ़ने का मौका वैसे ही नहीं मिल रहा था जैसे और बहुत सी पुस्तकें उत्साह में मंगा तो ली गईं मगर धरी की धरी रह गईं। इसके नाम मे इतना आकर्षण था कि घर से ले आया और सामने मेज पर रख दिया। पक्का मन बना लिया था कि इसे तो पढ़ना ही है। देखें अटकन चटकन है क्या बला? 

आज दिन में मौका मिला तो अनमने भाव से पढ़ना शुरू किया। शुरुआत के कुछ पृष्ठ पढ़ने के बाद से ही जो इस पुस्तक की कहानी ने अटकाया कि तब तक नहीं छूटा जब तक पूरा पढ़ नहीं लिया। जब आदमी की सांस अटक जाती है तो उसे अंतिम समय दही, गंगाजल चटा दिया जाता है। सोच रहा था, यही कुछ अर्थ लिए होगा इस शीर्षक का लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं निकला। हाँ, पूरे समय सांस अपनी ही अटकी रही और आई तब जब मैने इसे दीमक की तरह पूरा चाट नहीं लिया।

लगभग अस्सी पृष्ठों का यह लघु उपन्यास दो बहनों सुमित्रा जी और कुंती के इर्द-गिर्द घूमता रहता है। ग्रामीण परिवेश, देशज शब्द और कसे संवादों ने इस कहानी को इतना रोचक बना दिया है कि पाठक एक ही बैठकी में इसे खतम कर देना चाहता है।

दो सगी बहनों में एक मंथरा(कुंती) है तो दूसरी सावित्री। मजे की बात यह है कि सावित्री जानती है कि यह मंथरा है, मंथरा जानती है कि यह सावित्री है मगर तमाम षड्यंत्रों के बाद भी जीवन पर्यंत दोनो में प्रेम भी बना रहता है! पढ़ने के बाद लगता है इस कहानी का नाम अटकन-चटकन के बजाय उलझन-सुलझन होना चाहिए था। एक बहन जीवन के मंझे को उलझाती है दूसरी बहन उसे यत्न कर सुलझाती है। 

ग्रामीण परिवेश से उठाकर परिवारों के शहरी पलायन और अंत में गाँव के घर का, बूढ़े बरगद की तरह एकाकी रह जाने की घर-घर की दर्द भरी कहानी को बड़े अनूठे अंदाज में प्रस्तुत करने में सफल रही हैं लेखिका। 

उपन्यास में कहीं-कहीं प्रचलित सीरियल के बकवास षड्यंत्रों की झलक भी दिखती है लेकिन कहानी के बीच ही सीधे पाठकों से संवाद कर, बड़ी साफगोई से लेखिका इस आलोचना से बच निकलने का प्रयास करती दिखती हैं। इस उपन्यास के मुख्य पात्र महिलाएं होने के कारण इसमें महिलाओं की खिचड़ी ही ज्यादा पकाई गई है। पुरुषों को दाल गलाने का मौका ही नहीं मिला है। 

उपन्यास का अंत संयुक्त परिवार के विघटन के बाद एकाकी बचे पात्र को जीने का सही मार्ग इस अंदाज में दिखाता है कि हृदय को छू जाता है। कुल मिलाकर शुरुआत से अंत तक उपन्यास पाठक को बांधे रखने में सफल होता है। मैं वंदना अवस्थी दुबे जी को उनकी इस सफल कृति के लिए तहे दिल से बधाई देता हूँ।
#अटकनचटकन


Anoushka Shukla Pandey वैसे तो हमारी भांजी हैं लेकिन ऐसे वो डॉक्टर है और बहुत प्यारी कविताएं भी लिखती है। इतने सरल-सहज और विनम्र बच्चे बहुत कम होते हैं । पढ़ने की शौक़ीन हमारी बिट्टू ने अपनी पीजी की तैयारी के बीच अटकन चटकन पढा और लिखा भी। आप भी देखें-
अटकन चटकन
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मेरी प्यारी रेखा मौसी, जो कि एक वरिष्ठ साहित्यकार हैं, उनकी पुस्तक के लिए मुझ अज्ञानी का कुछ कहना तो सूरज को दीया दिखाने जैसा ही है...!
यही कह सकती हूँ कि जब एक बार पढ़ने बैठी, तो पढ़ती ही चली गयी और समय का भान न रहा! 
सभी किरदारों को अपना सा महसूस किया। मनुष्य की बड़ी से बड़ी और महीन से महीन सम्वेदना को जैसे किसी कैनवास पर रंग दिया गया हो...!
चरित्र चित्रण तो इतना सुंदर मानो सभी किरदारों आप जीवन मे कब्जी मिले हों!  और कहानी मन में भीतर तक धंस जाने वाली!!
आजकल के अजीबोग़रीब माहौल में यदि आप कुछ पल किसी कहानी की सरलता में बंध जाना चाहते हैं , तो ज़रूर पढ़ें ये बेजोड़ पुस्तक।
#अटकनचटकन

अटकन-चटकन: कुछ प्रतिक्रियाएं

अपनी किताब की प्रशंसा , अपनी ही वॉल पर, खुद के द्वारा पोस्ट करने में सकुचाहट तो होती है, लेकिन फिर आप सब तक वो रिव्यू कैसे पहुंचे, जो केवल मुझे मिला हो? फिर किताब का पहला रिव्यू एक अलग ही महत्व रखता है। Shaily Ojha मेरी भांजी है, मोटिवेशनल स्पीकर है और सकारात्मकता से भरी एक ऐसी शख़्सियत है, जिसका साथ हमेशा खुशनुमा अहसास से भर देता है। आज शैली का छोटा सा, प्यारा सा रिव्यू मिला तो मैंने झट से Rashmi Ravija की तर्ज़ पे उससे फ़ोटो भी मांग ली, किताब सहित। आप भी देखें, क्या लिखा शैली ने-

"अटकन चटकन"

किताबें पढ़ना पसंद है मुझे, पर अपने पसंद के विषय पढ़ते पढ़ते हिन्दी की किताबें कम ही हाथ में आती हैं। बहुत दिनों बाद एक किताब हाथ में आयी। पहली चीज़ जिसने आकर्षित किया वह है इसका नाम 😊 पढ़ना शुरू किया तो बस रुक ना पायी। हर चित्र जैसे आंखों के सामने से गुज़र रहा हो। चरित्र चित्रण तो ऐसा कमाल का, कि आप अपने जीवन से जोड़ लेंगे उन्हें जाने अनजाने। इंसान का स्वभाव ही उसका सबसे बड़ा मित्र और सबसे बड़ा शत्रु है इस बात को लेखिका ने बड़ी खूबसूरती, सरलता और प्यार से दर्शाया है। वंदना अवस्थी दुबे जी को इस कथा के लिए बहुत बधाई।



डॉ शीला नायक ( Sheela Nayak ) महाराजा महाविद्यालय छतरपुर में संस्कृत विभाग की विभागाध्यक्ष हैं। अटकन चटकन मंगवाना, फिर उसे पढ़ना ... फिर उस पर अपनी टिप्पणी देना....!
अब और क्या चाहिए हमें?

अटकन-चटकन
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सबसे पहले तो उपन्यास का शीर्षक ही आकर्षक है | पाठक को जिज्ञासा बनी रहती है कि अटकन-चटकन से क्या तात्पर्य है | मैंने बचपन में खेलते खेलते ये बात सुनी थी कि अटक न-चटकन चार चपेटन....इस प्रकार यह शीर्षक बहुत ही प्यारा है |

उपन्यास की प्रमुख पात्र सुमित्रा जी बड़े घर की बेटी हैं और उन्होंने ये संस्कार बखूबी अपनी ससुराल में निर्वहन किये | सुमित्रा जी धैर्य की मूर्ती हैं , उनकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है | वहीँ कुंती का चरित्र पढ़कर बड़ी नाराज़गी उभरती है कि सगी बहन किस स्तर तक गिर सकती है, कुंती जैसी स्त्रियां ही कुल का संहार करने वाली होती हैं | उपन्यास का पढ़ना पाठक को निरंतर बाँध कर रखता है | एक चलचित्र की तरह पाठक उसी में खो जाता है | उपन्यास के माध्यम से लेखिका जी ने उस समाज का चित्रण किया है जहां स्त्रियों की शिक्षा उनकी दशा पर ध्यान नहीं दिया जाता था | उपन्यास का अंत सुखद है जो की पाठक को आनंद की अनुभूति कराता है | लेखिका को यथार्थ चित्रण के लिए बहुत बहुत बधाई |💐💐💐




हमारी छोटी दीदी यानी Archana Awasthi ने सम्भवतः सबसे पहले "अटकन-चटकन" पढ़ा, लेकिन टिप्पणी आज आई। उनकी व्यस्तताएं जानते हैं हम, सो कोई शिक़ायत नहीं। 😊 बहुत धन्यवाद छोटी, इतनी प्यारी टिप्पणी के लिए। 💐💐

अटकन-चटकन
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सर्वप्रथम उपन्यास का शीर्षक और पुस्तक का आवरण अपनी तरफ़ आकर्षित करता है. उपन्यास की मुख्य-पात्र सुमित्रा की सरलता और कुन्ती की कुटिलता, कुन्ती का हृदय परिवर्तन होना तथा इस बीच का घटना-क्रम बराबर पाठक की उत्सुकता को बनाये रखता है. ग्रामीण-परिवेश और बुन्देली-भाषा का प्रयोग उस अंचल को चलचित्र की भाँति हमारे सम्मुख ले आते हैं. लेखिका वन्दना अवस्थी दुबे का उपन्यास यथार्थ-चित्रण-सा बन पड़ा है, उन्हें ढेर सारी शुभकामनाएं और अमित बधाइयां...

--अर्चना
#अटकनचटकन


Dev Shrivastava, यानी संजय श्रीवास्तव के बचपन के कुछ साल नौगाँव में बीते। पापाजी के शिष्य हैं। बेहद शिष्ट और नम्र स्वभाव के देव उतने ही सरल भी हैं। आज किताब मिली और आज ही पढ़ डाली। इस स्नेह पर धन्यवाद कह के पानी नहीं फेरेंगे हम।
अटकन-चटकन
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दीदी,आज जैसे ही ,"अटकन चटकन " कोरियर से आई , मन खुश हो गया , पूरे समय उपन्यास को पढ़ते समय कभी सुमित्रा का चरित्र आंखो के सामने आता तो कभी कुंती का,दोनों ही चरित्र अपने आस पास ही घूम रहे थे।तिवारी जी के इतने बड़े परिवार में एक एक पात्र जाना पहचाना लग रहा था। बहुत ही खूबसूरती से सारे पात्रों को आपने गढ़ा है।शुरू किया तो छोड़ने का मन ही नहीं किया।बीच में पारंपरिक बुन्देली भी पढ़ने को मिली । इतना सुंदर और सरल उपन्यास लिखने के लिए बहुत बहुत बधाई आपको ।😊👏👏🙏👍👍👍🙏

#अटकनचटकन

बुधवार, 29 अप्रैल 2020

तमाम मिथक तोड़ता है: फाग लोक के ईसुरी


तमाम मिथक तोड़ता है उपन्यास फाग लोक के ईसुरी


लॉक डाउन का ये समय तमाम लम्बित किताबों को पढ़ते हुए गुज़ार रही हूं. इसी बीच चार दिन पहले, मुझे मेरी बाल सखी, लब्ध प्रतिष्ठ कथाकार/साहित्यकार, डीएवी कॉलेज कानपुर में एसोसियेट प्रोफ़ेसर डॉ. दया दीक्षित का नया उपन्यास  फाग लोक के ईसुरी स्पीड पोस्ट से मिला. मार्च में जब यह उपन्यास लोकार्पित हुआ, तो मैने दया से पूछा, कि मुझे कैसे और कहां से मिलेगा? छूटते ही दया ने कहा कि वो भेजेगी मुझे. पूरे देश की सेवाएं ठप्प हैं, तो मुझे उम्मीद थी कि अब दो-तीन महीने बाद ही ये उपन्यास मुझे मिल पायेगा. लेकिन मेरी तमाम उम्मीदों को नाकाम करता ये उपन्यास मुझे चार दिन पहले मिला, तो मैं सुखद आश्चर्य में डूब गयी. डाकिया बाबू सुबह ग्यारह बजे के आस-पास आये थे. तब मैने उपन्यास खोल के दया की ’अपनी बात’ पढ़ डाली. अपनी बात पढ़ते-पढ़ते ही मेरी उत्सुकता जागने लगी थी. एक तो उपन्यास बुन्देली लोककवि ईसुरी पर था, दूसरे ईसुरी को लेकर इतने मिथक गढ़े गये, कि मुझे उत्सुकता थी, कि दया ने क्या लिखा होगा, उस पर उपन्यास की रचना प्रक्रिया ने ही इसे तुरन्त पढ़ने को प्रेरित किया. उस पर, उपन्यास मेरी उस दोस्त का था, जिसके साथ मेरा बचपन बीता. स्नान ध्यान के बाद, जब पुस्तक हाथ में उठाई, तब ऐसा सोच के नहीं उठाई थी, कि इसे आज ही पूरा करना है. लेकिन इसे हाथ में पकड़ा, तो थोड़ी देर बाद ही इस पुस्तक ने मुझे पकड़ लिया. अब मुझे खाना खाने का भी होश नहीं था. किताब को दस मिनट के लिये भी आंखों से हटाना भारी पड़ रहा था. मैं हमेशा कहती हूं, कि कुछ उपन्यास, कहानी संग्रह ऐसे होते हैं, जो खुद को पढ़वा ले जाते हैं. ये उपन्यास भी ऐसा ही है.

                   बुन्देलखंड के नैसर्गिक सौंदर्य का वणन करते हुए उपन्यास जैसे ही ईसुरी के पैतृक गांव ’मेंड़की’ पहुंचा, मन प्राण वहीं अटक गये..... अचानक ही कानों में ईसुरी की सुपरिचित फाग-

मोरी रजऊ से नौनों को है

डगर चलत मन मोहै

अंग अंग में कोल कोल कें ईसुर रंग भरौ है ।

गूंजने लगी..... उनके जन्म की कथा पढ़ने के लिये मन बेताव होने लगा. लेखिका दया दीक्षित ने इतनी खूबसूरती से उनके जन्म का ब्यौरा दिया है , उनके परिवार की जानकारियां दी हैं, कि मन, आंखें अपने अप भीगने लगीं...! ईसुरी के जन्म के एक साल बाद ही उनकी मां और फिर दूसरे साल में ही पिता का देहांत, नन्हे ईसुरी का अपने मामा-मामी के साथ उनके गांव लुहर गांव आना, फिर धीरे-धीरे मामी के स्वभाव में परिवर्तन होना. अब तक निस्संतान नायक दम्पत्ति अब उम्मीद से था, और यही वजह हो गयी, ईसुरी से विलगाव की. चंद स्थानों पर ईसुरी के बाल मन के स्वगत कथन, जो उस वक़्त की उनकी पीड़ा को व्यक्त करते हैं, इतने मार्मिक बन पड़े हैं, कि पाठक के आंसू कब बहने लगते हैं, पता ही नहीं चलता. मुझे बालक ईसुरी के रुदन के बीच तीन बार चश्मा उतार के आंखें पोंछनी पड़ीं. थोड़ी देर आंखें बन्द करके बैठना पड़ा....! पिता ने ईसुरी का नाम ’हरलाल’ रखा था. लेकिन उनके मामा ने उन्हें ईसुरी नाम दिया. ईसुरी के व्यक्तित्व में तमाम गुणों के साथ-साथ एक और गुण विद्यमान था, ईश्वरीय साक्षात्कार का. उनकी अनेक समस्यायें, अर्धचेतन अवस्था में प्रकट होने वाली ’माई’ ने सुलझाईं. ये दैवीय शक्ति उन्हें सपने या बेहोशी में उनकी मां के रूप में दर्शन देती थी और राह सुझाती थी.

मामा ने १३ वर्षीय ईसुरी का विवाह सीगौन नामक गांव की कन्या श्यामबाई के साथ तय कर दिया था. जो बाद में उनके अपने ददिहाल लौटने के पश्चात सम्पन्न हुआ. ईसुरी किस तरह अपनी ब्याहता श्यामबाई दोस्त, सखा, साथी थे, बहुत प्यारा वर्णन लेखिका ने किया है. आपसी सम्वाद मन को बांधे रहते हैं. काम के सिलसिले में ईसुरी का उनकी ससुराल जाना, वहां साधुओं की टोली का आना, और उन्हीं के सवाल पर जवाब के रूप में पहली बार काव्य पंक्तियां नि:सृत हुईं-

कां लौ सोचौं, कां लों जानों

मैं आपड़ा अज्ञानी

तुमई बता दो, का कै रएते

ईसुर तुम हौ ज्ञानी

इसके बाद ईसुरी के लेखन का सफ़र जो शुरु हुआ, वो रुका नहीं. उनका मित्र धीरे पंडा उनका सबसे सगा साथी साबित हुआ. ईसुरी की लगभग सभी रचनाओं को कलमबन्द करने का श्रेय उन्हीं को है. बाद में काम के ही सिलसिले में ईसुरी धौर्रा आ गये और फिर उनका अधिकान्श समय धौर्रा में ही बीता. उनकी लेखनी का स्वर्णिम दौर इसी धौर्रा गांव में फला-फूला. बुन्देलखंड में एक समय फड़बाज़ी की प्रथा खूब प्रचलित थी. ग्राम्य जीवन अपने मनोरंजन का साधन इन्हीं फड़ों को मानता था. फड़ भी एक से बढ़कर एक कवियों के ठिकाने थे. फड़बाज़ी के इसी चस्के में ईसुरी की चौकड़ियां, ईसुरी की फागें, सब लिखी गयीं. नौगांव छावनी में पदस्थ, अंग्रेज़ों के मुसाहिब जंगजीत सिंह का पात्र भी बखूबी उभर के आया है. जंगजीत सिंह इस उपन्यास और ईसुरी के जीवन के एक बेहद अहम किरदार हैं. सम्भवत: उन्हीं के आरोपों के चलते ईसुरी अपने जीवन्काल, और जीवनोपरांत भी तमाम विवादों में घिरे रहे. असल में ईसुरी की पत्नी श्यामबाई का घर का नाम था ’राजाबेटी’. ईसुरी ने जितनी भी फागें लिखीं, उन सब में ’रजऊ’ का उल्लेख है. ये रजऊ ईसुरी की पत्नी श्यामबाई ही हैं. ईसुरी का अपनी पत्नी के प्रति अगाध प्रेम था, उनके बिना वे निष्प्राण से हो जाते थे. तो उनका नाम, ईसुरी की रचनाओं में आना स्वाभाविक है. लेकिन चूंकि मुसाहिब जंगजीत सिंह की बेटी का नाम ’रज्जूराजा’ था. ईसुरी की चौकड़ियां हों या फागें, रजऊ के बिना पूरी ही न होती थीं. तो कुटिल जनमानस ने अनुमान लगाना शुरु कर दिया, कि ये रजऊ रज्जूराजा ही हैं. जंगजीत सिंह ने एक बार ईसुरी को बुला के ताक़ीद भी किया, लेकिन ईसुरी ने जब उन्हें असलियत बताई तो वे थोड़ा मुतमईन हुए. लेकिन कान भरने वाले कहीं ज़्यादा होशियार निकले.इस पूरे मामले में ईसुरी को कितना अपमान झेलना पड़ा, बेहद मार्मिक और सजीव चित्रण किया है लेखिका ने.

ईसुरी की कर्मभूमि बगौरा और धौर्रा गांव रहे हैं. कुशाग्र बुद्धि के ईसुरी अपने काम काज में बहुत होशियार थे. चूंकि वे इन दो स्थानों पर सबसे लम्बे समय तक रहे तो उनकी रचना स्थली भी ये ही दो स्थान बने. पत्नी श्यामबाई की अचानक हुई मृत्यु ने उन्हें तोड़ दिया. वे बीमार हो गये तब उनकी बेटी गुरन उन्हें अपने साथ, अपनी ससुराल ले आई. उनके अन्तिम दिन बेटी के पास ही गुज़रे. एक संत की भांति उन्होंने अन्तिम सांस भी बेटी के पास ही ली, समाधि अवस्था में.

136 पृष्ठों के उपन्यास को मैने मात्र दो पृष्ठों में सहेज दिया है. जब आप इस उपन्यास को पढ़ेंगे तो जानेंगे कि मेरी इन चंद पंक्तियों के मध्य कितनी-कितनी रोचक घटनाएं बिखरी हुई हैं. उपन्यास का अधिकांश भाग विशुद्ध बुन्देली में है. होना भी चाहिये था. खड़ी बोली में हमारे बुंदेली ईसुरी को यदि व्यक्त किया जाता, तो ये उनके साथ अन्याय हो जाता. असल में, खड़ी बोली में उन की आत्मा तक पहुंचा ही नहीं जा सकता था. दया दीक्षित ने इतनी मीठी बुन्देली का इस्तेमाल किया है कि मेरे पास शब्द नहीं उनकी तारीफ़ के लिये. सम्वाद इतने सहज और बुन्देली रस से भरे हुए हैं, कि लगता ही नहीं हम पढ़ रहे हैं. सजीव पात्र जैसे बोलने लगते हैं. इतने सजीव सम्वाद बहुत कम मिलते हैं, किसी की भी लेखनी के ज़रिये. बुन्देली कहावतों, उलाहनों का खूबसूरत इस्तेमाल किया है लेखिका ने.

                 किसी भी इतिहास पुरुष पर लेखनी चलाना आसान काम नहीं है. एक तो ऐसे चरित्र पर लिखने से पहले बहुत शोध की आवश्यकता होती है. उन पर लिखे गये ग्रंथ, उनको चाहने/मानने वाले लोग और न मानने वाले लोगों से भी मेल-मुलाक़ात बहुत ज़रूरी हो जाता है. फिर चरित्र यदि ईसुरी जैसा हो, तो लिखना और भी मुश्किल. ईसुरी ने जितना नाम कमाया, उतने ही विवाद भी कमाये. लेकिन ये उपन्यास  फाग लोक के ईसुरी इन तमाम विवादों को ध्वस्त करता है. उन पर लगे इल्ज़ामों से उन्हें बरी करता है और रजऊ को केवल प्रेमिका की छवि से मुक्त करता है. रजऊ से प्रेम में जिन फागों को अनैतिक और अश्लील करार दिया था, पत्नी राजाबेटी के रूप में तब्दील होते ही ये प्रेम अलौकिक हो गया. फागें सुहानी हो गयीं. लेखिका ने तमाम मिथक तोड़े हैं, ईसुरी से जुड़े.

                 बुन्देली समझने वाले, नहीं समझने वाले हर साहित्यप्रेमी को ये उपन्यास पढ़ना ही चाहिये. अमन प्रकाशन-कानपुर से प्रकाशित ये उपन्यास भविष्य में नये प्रतिमान स्थापित करेगा, ये मेरा दावा है. हां प्रकाशक की ज़िम्मेदारी है कि वो इस अद्भुत उपन्यास के महत्व को समझते हुए इसका भरपूर प्रचार-प्रसार करे. बढ़िया छपाई के लिये और उससे भी ज़्यादा बेहतरीन प्रूफ़ रीडिंग के लिये प्रकाशक बधाई के पात्र हैं. पुस्तक का कवर पेज़ बहुत शानदार है. मेरी शिक़ायत इस उपन्यास के शीर्षक से ज़रूर है. पहली नज़र में ये शीर्षक किसी उपन्यास का शीर्षक नहीं लगता, बल्कि निबन्धात्मक/शोधपरक पुस्तक का आभास देता है. लेकिन उपन्यास इतना रोचक और भाषा इतनी कसी हुई है, कि फिर उपन्यास का शीर्षक गौण हो जाता है. लेखिका को दिल से बधाई, इस कालजयी सृजन के लिये.

उपन्यास : फाग लोक के ईसुरी

लेखिका : डॉ. दया दीक्षित

प्रकाशक : अमन प्रकाशन- कानपुर

ISBN : 978-93-89220-87-2

पृष्ठ संख्या : 136

मूल्य : 175/

 


बुधवार, 11 सितंबर 2019

दिमाग़ के दरवाज़े खोलता है- बन्द दरवाज़ों का शहर



पिछले एक साल में बहुत सारी पुस्तकें इकट्ठा हो गयीं, पढ़ने के लिये, और फिर लिखने के लिये. न बहुत पढ़ पाई, सो लिख भी नहीं पाई. अब एक-एक करके पढ़-लिख रही हूं. रश्मि का कहानी-संग्रह, ’बन्द दरवाज़ों का शहर’ प्रकाशित होते ही ऑर्डर कर दिया था. कुछ कहानियां पढ़ भी ली थीं, लेकिन लिखने के लिये कुछ से बात नहीं बनती. पूरा और शब्दश: पढ़ना ज़रूरी होता है. फिर किताब यदि अपनी दोस्त की हो, तो ये शब्दश: पढ़ना मजबूरी नहीं, बल्कि बाखुशी होता है. तो जून के किसी हफ़्ते में मैने कहानी संग्रह पढ़ना चाहा. बुक-शेल्फ़ में देखा, अपनी टेबल पर देखा, अपने ऑफ़िस के कोने-कोने में झांका, मम्मी के कमरे में तलाशा, पूरे घर में एक बार, दो बार, तीन बार...कई बार खोजा. नहीं मिला ’बन्द दरवाज़ों का शहर’......! अब क्या हो? मैने तो पूरी कहानियां पढ़ी ही नहीं अभी...!. इस्मत को फोन लगाया-’ तुम्हें दी क्या रश्मि की किताब? तुम्हारे साथ दिल्ली तो नहीं पहुंच गयी? इस्मत ने इंकार में ज़ोर से सिर हिलाया. बोली, तुमने ज्योति को दी होगी. ज्योति को मैने नहीं दी है, ये मुझे अच्छे से याद था. अब क्या हो? आनन-फानन दोबारा ऑर्डर की गयी किताब. जब आई, उन दिनों इस्मत सतना में ही थीं, और घर पर ही थीं. बाहर से अपना पार्सल ले के लौटी , किताब देखते ही इस्मत बोली-’ दोबारा क्यों मंगवाई? है तो तुम्हारे पास.’ अब हम झल्लाए, - तुम्हें पता तो है मिल नहीं रही. पता नहीं कहां गयी.’ अब इस्मत ने पलट-झल्लाहट दिखाई- ’ ऐसे कैसे नहीं मिल रही? वहां पापाजी के बुक शेल्फ़ पर रखी तो है!’
’हैं....! ले के आओ तो जानें.’
इस्मत उठीं, मम्मी के कमरे में गयीं और ’बन्द दरवाज़ों का शहर’ हिलाते हुए ले आईं. हम दंग!! हमें क्यों न दिखी? हमने तो चार बार ढूंढ़ी थी वहां! खैर, अब दो हो गयी थीं, तो एक इस्मत रानी ने मुस्कुराते हुए अपने बैग के हवाले की, ये कहते हुए- कि ये दूसरी शायद तुमने हमारे लिये ही मंगवा ली. चलो ये भी बढ़िया हुआ.
तो ये तो किस्सा हुआ किताब के गुमने और मिलने का. अब किताब की चर्चा हो जाये.
’बन्द दरवाज़ों का शहर’ रश्मि रविजा की दूसरी कृति है. पहली कृति ’कांच के शामियाने’ थी. महाराष्ट्र साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित इस उपन्यास ने पर्याप्त ख्याति बटोरी, और अब ये कहानी संग्रह भी उसी राह पर है. इस कहानी-संग्रह में कुल बारह कहानियां हैं. कुछ पुरानी हैं, तो कुछ नयी हैं. कुछ लम्बी हैं, तो कुछ छोटी हैं. पहली कहानी ’ चुभन टूटते सपनों के किरचों की, दो बहनों की कहानी है. बड़ी बहन, जिसका ब्याह तब हो गया, जब उसने सपने देखने शुरु भी नहीं किये थे. सपनों के बीच आंखों की मिट्टी में दबे रह गये. लेकिन जब उसे पता चलता है कि उसके ये अनदेखे, अनउपजे सपने, छोटी बहन की आंखों में पनप रहे हैं, बल्कि पौधे का आकार ले चुके हैं तो वो एक अजानी खुशी से भर जाती है. लेकिन जब कहानी के अन्त में वो शादी और प्रेम को लेकर छोटी बहन की व्याख्या सुनती है, तो अवाक रह जाती है. उसे लगता है, जैसे उसके अपने सपने टूट गये हों. छोटी बहन अपने प्रेम के प्रति अचानक क्यों अलग रवैया अपना लेती है, ये आप खुद जानिये, कहानी पढ़ने के बाद.
दूसरी कहानी है- ’अनकहा सच’ ये ऐसे साथियों की कहानी है, जो बचपन से साथ हैं, एक दूसरे को पसन्द करते हैं, लेकिन ज़ाहिर कोई नहीं करता. बाद में क्या होता है, इस रोचक कहानी में, ये आप खुद पढ़ें. तीसरी कहानी-’पराग... तुम भी’ ये भी प्रेमकथा है. ऐसी प्रेम कहानी, जिसमें साथ पढ़ने वाला जोड़ा साथ जीने-मरने के सपने संजोता है. कथा की नायिका पल्लवी पहले नौकरी पा जाती है, जबकि नौकरी के लिये संघर्ष करता पराग जब मुम्बई में जॉब पाता है तो पल्लवी को नौकरी छोड़ने की बात जिस आसानी से कह देता है, वो रवैया पल्लवी के गले नहीं उतरता. आम पुरुष मानसिकता को बखूबी दर्शाती है ये कहानी. चौथी कहानी है- ’दुष्चक्र’ ये कहानी एक ऐसे मेधावी लड़के की कहानी है जो नशे की लत का शिकार हो जाता है. किशोरवय से ही गलत संगत में पड़ के बच्चे किस तरह भयानक रास्ता अपना लेते हैं, और ज़िन्दगी किस तरह दिशाहीन हो जाती है, इन सारे भावों को समेटे है ये कहानी.
कहानी-संग्रह की शीर्षक कथा है- ’बन्द दरवाज़ों का शहर’. ये कहानी पता नहीं कितनी, एकाकी रह जाने वाली महिलाओं की कहानी है. उस महानगरीय एकाकीपन की कहानी, जहां घर में बस सुबह आठ बजे तक ही अहबड़-तबड़ मचती है, जब तक घर का पुरुष काम पर निकल नहीं जाता. उसके बाद औरत का एकाकीपन शुरु होता है, जो खत्म ही नहीं होता, पति के घर लौटने के बाद भी. क्योंकि पति के पास समय ही नहीं, जो पत्नी को दे सके. ऐसे में किसी के द्वारा ज़रा सा भी ध्यान देना, आकर्षण का कारण बन जाता है. लेकिन मध्यमवर्गीय मानसिकता इस भाव को भी किस तरह लेती है, पढ़ियेगा कहानी में. बहुत सार्थक कथा है ये. ’कशमकश’ एक ऐसे युवा की कहानी है जो अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद बेरोज़गार है. घर वालों के सपने साकार न कर पाने का दंश किस क़दर कच्गोटता है बेरोज़गार लड़कों को, ये इस कहानी को पढ़ के बखूबी महसूस किया जा सकता है. ’खामोश इल्तिज़ा’ तन्वी नाम की एक ऐसी लड़की की कहानी है, जिसने ज़िन्दगी में इतने धोखे खाये हैं, कि अब उसे बहुत जल्दी किसी पर भरोसा नहीं होता. पति से अलग होने के बाद जब सचिन ने उसके जीवन में दस्तक दी, तो तन्वी ने जानबूझ के दरवाज़े बन्द ही रखने चाहे. ये दरवाज़े खुले, या बन्द ही रहे, जानिये इस कहानी को पढ़ के.
              संग्रह की अन्य कहानियां – पहचान तो थी, पहचाना नहीं था, होंठिओं से आंखों तक का सफ़र, दुख सबके मश्तरक, पर हौसले जुदा भी एकदम अलग विषयों पर लिखी गयीं बेहतरीन कहानियां हैं. रश्मि की शैली बिल्कुल सहज और भाषा सरल है, इसलिये कहानियां हर तरह का पाठक वर्ग पसन्द करेगा. कहानियों के विषय भी आम जीवन से जुड़े हैं सो वे भी पाठक वर्ग को अपने बीच की ही लगती हैं. कहानी की सबसे बड़ी शर्त होती है उसकी पठनीयता. यदि कहानी खुद को पूरा पढ़ने के लिये मजबूर करे, तो समझिये, लेखन में भरपूर पठनीयता ह और यही विशेषता है एक कथाकार की, जो रश्मि के पास मौजूद है. अनुज्ञा बुक्स-दिल्ली से प्रकाशित. 180 पृष्ठ के इस संग्रह की कीमत 225 रुपये है. पुस्तक का कवर पेज़ आकर्षक है. सबसे बड़ी बात, पुस्तक में कहीं भी प्रकाशकीय ग़लतियां नहीं हैं. ये बहुत बड़ी बात है.  इस पुस्तक के लिये लेखिका- रश्मि रविजा और प्रकाशक को हार्दिक बधाई.    .