शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

अनूठा संग्रह है: बातों वाली गली- GT Eng

वे अपना नाम GT Eng लिखते हैं। मेरी कहानियां ब्लॉग के ज़माने से पढ़ रहे हैं जान के कितनी खुशी हुई, ये बताया नहीं जा सकता। फेसबुक की मेरी मित्र सूची में नहीं हैं, लेकिन दोस्ती का पैमाना केवल ये सूची नहीं है। उन्होंने किताब मंगवाई, और फिर शानदार समीक्षा भी की। दो दिन पहले उन्होंने ये पोस्ट डाली थी, लेकिन उसी दिन मैं दिल्ली के लिए निकल रही थी। विलम्ब के लिए क्षमा GT साब।
"बातो वाली गली " पहला कहानी संग्रह वो भी पापा जी को समर्पित इससे सुंदर समर्पण और क्या हो सकता है । हिंदी साहित्य मे कहानियो का अपना अस्तित्व और अपनी पहचान बिलकुल खो सी गई है बड़े भाई साहब, ठाकुर का कुआँ, पूस की रात जैसी कहानिया पढने के बाद आजकल कहानियो के नाम पर लिखे जा रहे संवाद, संशय , संदेह और
व्यग्रता को कहानी मन मानता ही नही और उन पर समय जाया करने से मै बचता ही रहता हूँ । ऐसा साहित्य एकता कपूर के धारावाहिक की तरह आपका साहित्यिक प्रेम , ज्ञान सरोकार सब छिन्न भिन्न कर देता है ।
परन्तु "बातो वाली गली" की लेखिका सुश्री वंदना अवस्थी दुबे जी की कुछ कहानिया मै उनके ब्लाग पर पढ चुका था । इसलिए उनके इस प्रथम कहानी संग्रह मे मुझे विशेष रूचि थी
बहरहाल विमोचन के बाद 14 सितंबर को पंहुची वंदना जी की पुस्तक "बातो वाली गली से " बात करने का मौका कल ही मिला और 118 पृष्ठ पलटने मे महज दो घंटे लगे । ये कोई जेम्स हेडली चेईज का उपन्यास नही बल्कि समसामयिक विषयो पर रोजमर्रा की जिंदगी मे आम इंसान के जीवन उसके आस पास घटती घटनाओ का बेहद सरल बोलचाल की भाषा और शब्दो का अनूठा संग्रह है । जहाँ असल भारतीय जीवन बेतरतीब बने मकानो की अपनी अपनी साईज की अपनी अपनी हैसियत की खिडकियो से झांकता है । जहाँ भरी दुपहरी मे सूरज चीं चा करते हैंड पम्प से बात करता है । गर्म लू आंगन मे लगे पेड़ की छांव को ठंडा कर मजे लेती है । जहाँ आस्था अभाव के साथ जीवन को, एक स्वभाव बना देती है ऐसे कई रमणीय भारतीय जीवन दर्शन के परिदृश्य है इस "बातो वाली गली में" ।


कहानी कोई भी हो दरअसल वो बस एक कहानी ही होती है ये हर पाठक जानता है जो एक सत्य है । किसी कहानी को पढते हुए अगर इस सार्वभौमिक सत्य से आप कुछ देर के लिए भी विमुख होते है तो समझिए लेखक का लिखना सफल हो गया । बातो वाली गली मे ऐसे कई मौके आऐंगे जब आप को लगेगा अरे अपने यहाँ वहाँ भी तो ऐसा ही हुआ कल परसो या पिछले
साल , ,शिव बोल मेरी रसना घड़ी घड़ी " शीर्षक ने न केवल कहानी के प्रति जिज्ञासा बढाई बल्कि कहानी के अंत मे सोचने पर मजबूर भी कर दिया की " शुभ " आस्था से नही अवचेतन मन और निरंतर कर्म से होता है । ये इस "बातो वाली गली" मे घुसने पर आप समझ पाऐंगे ।
इस कहानी संग्रह के बारे मे इतना ही यथेष्ठ है कि 'बात निकली है तो अब दूर तलक जाएगी "
इस संग्रह का साहित्यिक मानकों की दृष्टि से विवेचना करने की मुझे कोई आवश्यकता महसूस नही हुई क्योकि जब लेखन आपके आसपास के वातावरण और परिदृश्य का प्रतिरूप हो उसके लिए मानको का कोई भी परीक्षण न्यायसंगत नही कहा जा सकता ।
वंदना जी को बहुत शुभकामनाये

मंगलवार, 19 सितंबर 2017

बातों वाली गली: आर.एन.शर्मा जी की नज़र में




RN Sharma जी से मेरा परिचय फ़ेसबुक के माध्यम से ही हुआ. Rashmi की पोस्ट पर उनकी सारगर्भित टिप्पणियां पढ़ती रहती थी. वहीं कई बार टिप्पणियों का आदान-प्रदान भी हुआ. शर्मा जी ने मेरी किताब पर ऑर्डर भी रश्मि की पोस्ट के ज़रिये ही किया. फेसबुक, जहां हर व्यक्ति केवल ले- दे वाले रिश्ते में जुड़ा है, वहां शर्मा सर जैसे विशुद्ध साहित्यप्रेमी भी हैं, जिन्हें इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि अगला आपकी मित्रतासूची में है या नहीं. जबसे आपको किताब मिली, तभी से मैं आपकी विस्तृत टिप्पणी का इंतज़ार कर रही थी. आज इंतज़ार खत्म हुआ. आपका एक-एक शब्द मेरे लिये आशीर्वाद की तरह है. आपकी सभी सलाहों पर अमल होगा. स्नेह बनाये रखें. प्रणाम सहित.
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बातों वाली गली...
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देश विदेश की कहानियां पढ़ीं हैं कुछ मूल रूप में कुछ अनुदित। बहुत सुंदर और दिल को छू लेने वाली पर उनका असर दिलो दिमाग पे ज़्यादा दिन नहीं रहा कभी। शायद इसलिए कि हम उस परिवेश में पले बढ़े ही नहीं। उन कहानियों के चरित्रों से संबंध भी स्थापित नहीं हो पाया, एक दूरी रही हमेशा।
पर उन कहानियों की बात कुछ और है जिनमे हमारी मिट्टी की खुशबू है, जो हमारे आस पास ही दिन प्रतिदिन घट रहीं है, जिनमे आपसी रिश्तों की महक है, परिवारों में दिन प्रतिदिन होने वाली नोंकझोंक है, प्यार और ईर्ष्या है, बड़प्पन है, इंसानी गुरूर और ओछापन है। शादी ब्याह और तीज त्योहारों की गहमा गहमी और उनसे जुड़े रीत रिवाजों, जिन्हें महानगरों में रहने वाले काफी हद तक पीछे छोड़ आये हैं, की रौनक है।ये सारी और न जानें कितिनि ही उनसे जुड़ी और कहानियां उस वक़्त की याद दिलातीं हैं जब हम किसी गाँव, कस्बे या मोहल्ले में रहते थे। किसी के घर मे कौन आया गया, किसकी लड़की कब आती जाती है, किसके यहां आज क्या बन रहा है, किसी के घर शादी है कहीं कोई गमी हो गई है सबको सब पता होता, न सिर्फ पता होता बल्कि मोहल्ले के आस पड़ोस के लोग उस दुख सुख में शरीक भी होते। मेरी आधी उम्र उन्ही गली कूंचों में बीती है इसलिए भी मैं इन सभी बातों को दिल मे सँजोये हुए हूँ।
वंदना अवस्थी जी का ये संग्रह " बातों वाली गली" कई दिन पहले ही पढ़ लिया था। पढ़ते वक्त और उसके बाद भी ऐसा लगता रहा कि ये सारी कहानियां मेरे आस पास या मेरे आंखों के सामने से गुजरी हैं। उनके बुने गढ़े चरित्र बिल्कुल जाने पहचाने से लगे, एकदम करीब और सच्चे। कुछ कहानियां आँखें नम कर गईं और कुछ बहुत छोटी होने के बाद भी मन पर एक गहरा असर छोड़ गईं।
वंदना जी की ये कहानियां, एक दो को छोड़ कर, समाज के उस वर्ग की महिलाओं के इर्द गिर्द घूमती है जो आज भी बहुत व्यापक है, गली मोहल्लों, कस्बों और देहातों में बसता है जहां भारत की आत्मा सांस लेती है। इन सभी, सच्ची से लगने वाली, कहानियों को शिद्दत और लगन से एक कैनवस पे एक सीधी सादी बोलचाल की भाषा मे उतारना कोई आसान काम नहीं है पर वंदना जी ने कर दिखाया है।
डॉक्टर अचला नागर ने वैसे तो इस कहानी संग्रह की भूमिका में इतना कुछ लिख दिया है कि कुछ और लिखने की गुंजाइश नही है। फिर भी दो शब्द वंदना जी की सरल और आम बोलचाल की भाषा शैली पे बनतें हैं। वो बचपन से उसी साहित्यिक माहौल में रहीं, इसलिए भाषा पे उनकी पकड़ अद्भुत और प्रशंसनीय है। रीवा और सतना के आसपास बोले जानी वाली हिंदी या उसके कुछ शब्दों का कहानियों में समावेश उनकी शैली को समृद्ध बनाता है। उनके ब्लॉग आदि तो मैंने नहीं पढ़े पर जो भी उनकी फेसबुक पोस्ट्स और इस संग्रह को पढ़कर लगा है उससे एक उम्मीद बन पड़ी है कि आगे चलकर कुछ और ऐसी ही कहानियों का ताना बाना बुनेंगी जिनकी छाप उनके पाठकों के दिलो दिमाग पे हमेशा रहेगी।
इतनी सुंदर और अपनी सी लगने वाली कहानियों के इस संग्रह की रचना करने के लिए वंदना अवस्थी दुबे निश्चय ही बधाईं कि पात्र है।उम्मीद है वो अपने लेखन से समाज के उस वर्ग, जो अपनी मसरूफियत के चलते पढ़ने पढ़ाने से दूर है, में पढ़ने लिखने की रुचि जाग्रत करेंगी। { इसलिए एक सुझाव उन्हें, और वो ये कि वे अपने प्रकाशक को कहें कि इस कहानी संग्रह को ऑन लाइन उपलब्ध कराने के अलावा ऐ एच व्हीलर को भी उपलब्ध कराए ताकि आते जाते लोगों की नज़र इस पर पड़े और अधिक से अधिक लोग इसे पढ़ सकें। कुछ हिंदी समाचार पत्रों को जो मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड से प्रकाशित होतें है इसकी एक प्रतिलिपि अवश्य भेजें ताकि इस संग्रह की चर्चा उनके साहित्यिक कॉलम में हो सके। आल इंडिया रेडियो के बहुत से केंद्र है इन प्रदेशों में जहां हिंदी मे उस अंचल विशेष के लेखकों की रचनाओं पर अक्सर चर्चा होती है। उन्हें भी इसकी एक प्रतिलिपी अगर हो सके तो भेज दें। इस कहानी संग्रह को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचने में ये कोशिश अवश्य कामयाब होगी।}
एक बार फिर इतनी सुंदर रचना के लिए वंदना अवस्थी दुबे को बधाईं...


रविवार, 17 सितंबर 2017

बातों वाली गली में टहलना रश्मि का....


    रात में कोई भी गली सुनसान हो जाती है ,लोग वहाँ जाने से डरते हैं ...पर मैं तो देर रात गली में घूमती रही और खूब गुलज़ार पाया गली को.
    तरह तरह के लोगों से मिलना हुआ...कुछ हंसाते रहे तो कुछ सोचने पर मजबूर करते रहे पर वो 'बातों वाली गली ' जो थी 
    बहुत इंतज़ार के बाद वंदना अवस्थी दुबे का कहानी संग्रह 'बातों वाले गली ' मिला. वंदना का लिखा करीब सात वर्षों से पढ़ती आ रही हूँ. . ब्लॉग पर उसकी कहानियाँ भी पढ़ी हैं और सामयिक विषयों ...आस-पास की घटनाओं पर तो उसकी कलम खूब चलती है. बहुत दिनों से हम दोस्तों का आग्रह था ,अपनी कहानियाँ संग्रहित कर प्रकाशित करवाओ...और आखिरकार वंदना ने हमारे कहे का मान रख लिया...आलस त्याग कहानियाँ संग्रहित कीं और हमारे सामने 'बातों वाली गली' नमूदार हो गई.
    वंदना की लेखन शैली बहुत सहज और सरल है और कम शब्दों में गहरी बात कह देने की अद्भुत क्षमता है. समाज में जितनी तरह के लोग हमें आस पास दिखते हैं,सभी कहानी के पात्रों के रूप में हमें इस किताब में नजर आयेंगे और उनके सुख दुःख,उनके मन की उलझनों में हम भी शामिल होते चले जाते हैं.
    एक गृहणी नीरू है जो अपनी सम्पन्न पड़ोसिन के सामने हीनभावना की शिकार हो जाती है,जबकि हंसमुख पति और चंचल बच्चों के साथ उसकी गृहस्थी भरी-पूरी है.
    आदी , अपनी अमीर पडोसी दीदी से बहुत प्रभावित है पर जब उसे एक दिन उनके यहाँ गुजारना पड़ता है तो अपने परिवार का अपनापन और स्नेह मिस करने लगता है.
    एक बेरोजगार लडके और एक शादी का इंतज़ार करती लडकी के मन की कशमकश,अलग अलग कहानियों में बहुत अच्छे से बयां हुई है.
    एक बड़े व्यवसायी , जिन्होंने सारा व्यापार अपनी मुट्ठी में कर रखा था ,उनके गुजरने के बाद उनके बुजुर्ग बेटे भी असहाय से हो जाते हैं ....वहीँ एक सास को बहु से इतना ज्यादा काम करवाने की आदत थी कि उनकी मृत्यु के बाद भी पचास की उम्र छूती बहु को उनकी पुकार सुनाई देती रहती है.
    समाज की विसंगतियाँ भी कई कहानियों में उभर कर दिखाई देती हैं. एक पढ़ी लिखी अपने काम में निष्णात लड़की को भी दफ्तर में उसका सहयोगी उसे कमतर समझता है.
    संगीत में गहरी रूचि रखने वाली लड़की का शादी के बाद ,किसी पार्टी में गाना पति को गवारा नहीं होता.
    एक बुजुर्ग महिला जिन्हें होटल में किसी भी जाति के बावर्ची के हाथों का बना खाने से परहेज नहीं है पर घर में किसी विशेष जाति का रसोई में प्रवेश पसंद नहीं .
    घर की सबसे छोटी लडकी जो नौकरी करती है, उसके बड़े भाई बहन उसकी शादी की,उसके देखरेख की चिंता बिलकुल नहीं करते पर अपने सारे काम बड़े आराम से करवाते हैं.
    कहानियों में जहां स्त्रियों की समस्या कि कैसे उन्हें घर से बाहर निकलते ही अनचाहे स्पर्श , फिकरे ,छींटाकशी सहन करना पड़ता है पर लेखिका ने कलम चलाई है तो स्त्रियों की कमजोरी पर भी बखूबी लिखा है कि कैसे उन्हें गॉसिप करना बेहद पसंद है और वे किसी को दूर से ही देखकर अंदाज़े लगा ,अफवाहे फैलाने लगती हैं.
    एक साधारण से आदमी के बाबा बनने और लोगों द्वारा पूजे जाने की कहानी बहुत ही सटीक और सामयिक है. लोगों की अंधश्रद्धा पर करार प्रहार है.
    इन सब कहानियों की विशेषता ये है कि सबका अंत सकरात्मक है . पात्रों को अपनी गलती का अहसास होता है या फिर वे विरोध का स्वर उठाते हैं. सभी कहानियाँ एक नई रौशनी की ओर उन्मुख होती हैं. कहानियों में रोचकता बरकरार रहती है.
    अचला नागर दी ने अपनी लिखी भूमिका में वंदना की कहानियों का बहुत सुंदर विश्लेष्ण किया है .
    वंदना को बहुत शुभकामनाएं ....उसकी लेखनी यूँ ही अबाध गति से चलती रहे .


शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

बातों वाली गली : चारू शुक्ला की नज़र में




अपनी रचनाओं का किताब के रूप में प्रकाशित होना, लोगों के हाथों में किताब का पहुंचना और फिर सुधि पाठकों की उस पर प्रतिक्रिया आना कितना सुखद है ये वही समझ सकता है, जिसकी पहली किताब प्रकाशित हुई हो. बाद की किताबों के लिये शायद उतना रोमांच न रह जाता हो. " बातों वाली गली" पर प्रतिक्रियाएं मिलनी शुरु हो गयी हैं, जिन्हें मैं क्रमश: यहां पोस्ट करूंगी. तो ये रही पहली प्रतिक्रिया चारु शुक्ला जी की- चारु जी ने इस किताब पर एक गीत भी रच डाला है, उसका वीडियो भी देखें -
'बातों वाली गली' विलम्ब से निकली अपने घर से सो सबका इंतज़ार थोड़ा लम्बा तो हुआ, लेकिन अब खुशी इस बात की है कि अब ये अलग-अलग पतों पर, अलग-अलग शहरों में अपनी पहुंच बना रही है। कल मित्रवर Charu Shukla जी को किताब मिली और उन्होंने एक ही बैठक में उसे न केवल पढ़ डाला बल्कि शानदार टिप्पणी भी लिख के पोस्ट की। बहुत शुक्रिया चारु जी। आपके लिए यहां कॉपी कर लाये हैं चारु जी की पोस्ट। पढ़ें किताब के बारे में आप भी-
video
इंतज़ार बहुत सालता,तब जब ये लगातार बना रहता कि आज अब न जाने कब पूरा हो, पर सच में जब पूरा होता तो खुशी दोगुनी बढ़ा देता, ऐसा ही कुछ अचानक आज हुआ, जब हमारे इंतज़ार पर लगाम लगा दी, डाक बाबू ने आकर, एकदम से वो गीत याद आ गया, डाकिया डाक लाया, अर्सा गुज़र गया डाक बाबू का इंतज़ार न किया, पर इसको भी फिर जीने का अवसर दिया, वंदना अवस्थी दुबे जी ने अपनी पहली कृति बातों वाली गली लिखकर, तो साहब अपना इंतज़ार आज खत्म पर बातों का सिलसिला तो अभी शुरू ही हुआ है, अब इसे अच्छी कहूं कि बुरी पर आदत तो बस आदत है, कोई अच्छी रचना हाथ लगी नहीं की, जब तक पूरी न पढ़ लें चैन कहाँ, तो कुछ ऐसा ही सफ़र शुरू हुआ बातों वाली गली का, जो अचला नागर जी की शानदार भूमिका और वंदना जी की अपनी कही के साथ, अलग अलग दायरे, अनिश्चितता में,ज्ञातव्य,आस पास बिखरे लोग,बातों वाली गली,नहीँ चाहिए आदी को कुछ,हवा उद्दंड है, नीरा जाग गई है, रमणीक भाई नहीं रहे, सब जानती है शैव्या,अहसास,दस्तक के बाद,प्रिया की डायरी, करत करत अभ्यास के, बड़ी हो गईं हैं ममता जी,विरुद्ध,सब तुम्हारे कारण हुआ पापा,डेरा उखाड़ने से पहले,शिव बोल मेरी रसना घड़ी घड़ी से होता हुआ बड़ी बाई साब पर जाकर खत्म हुआ, वंदना जी की कहानियां जहां आस पास की जान पड़ती हैं तो वहीँ उनके पात्र तो लगता कि अरे ये कुछ वैसा ही तो है, जैसे भाव जगाते, और हाँ वो जो आपकी कहानी के मेहमानों के सामने ही मिठाई चट कर जाने वाले बच्चे हैं न, वो मेरे ही दोनों शैतान हैं, उसी रंग में रंगे हुए
बाकी सारी कहानियां अपने आप में कहीं गुदगुदाती हैं तो कहीं प्रश्न भी लेकर खड़ी नज़र आती हैं कि,आखिर बदला क्या? बाकी नारी मन की जितनी गहरी पड़ताल आपने की है, वो प्रश्न भी है, सोचने पर मजबूर भी करता,
वंदना जी आप साल दर साल यूं ही लिखती रहें, इतनी बेहतरीन रचना के लिए बहुत बहुत शुक्रिया और उम्मीद है आगामी रचना जल्द पढ़ने मिले