रविवार, 14 जनवरी 2018

बुन्देलखंड की मकर संक्रान्ति

सर्दिया शुरु होते ही मेरे ज़ेहन में जो त्यौहार ज़ोर मारने लगता है वो है मकर संक्रान्ति. सर्दियों में आने वाला एकमात्र ऐसा बड़ा त्योहार
जिस पर हमारे घर में बड़े सबेरे नहा लेने की बाध्यता होती थी. इधर जनवरी शुरु हुई, उधर हमारे घर में सन्क्रान्ति की तैयारियां शुरु . कम से कम पांच प्रकार के लड्डुओं 
 की तैयारी करनी होती थी मम्मी को. ज्वार, बाजरा, मक्का और उड़द की दाल की पूड़ियां, मूंग दाल की मंगौड़ियां, और कई तरह के नमकीन. अब सोचिये, इतना सब करने में समय लगेगा न? वो समय पैकेट बन्द तैयार आटा मिलने का नहीं था. अब तो बाज़ार जाओ और ज्वार/बाजरा/मक्का जो चाहिये, उसी का आटा एकदम तैयार, पैकेट में सील-पैक घर ले आओ.  हमारे बचपन में ये सारे आटे अनाज की शक्ल में मिलते थे, जिनसे चक्की पर जा के आटा बनवाना पड़ता था.
हमारे घर लड्डू बनाने की शुरुआत मम्मी संक्रान्ति के दो दिन पहले कर देती थीं. आटे के लड्डू, लाई के लड्डू, तिल के दो तरह के लड्डू, नारियल के लड्डू और मूंगफ़ली के लड्डू. संक्रान्ति की सुबह सारे बच्चों को रोज़ की अपेक्षा जल्दी जगा दिया जाता. सर्दियों में सुबह छह बजे उठना मायने रखता है. उठते ही सबको दूध मिलता और बारी-बारी से नहा लेने का आदेश पारित होता. आंगन में एक कटोरे में पिसी हुई तिल का उबटन रक्खा होता, जिसे पूरे शरीर पर लगा के नहाने की ताक़ीद होती. बहुत सारे लोग तो इस दिन शहर के पास बहने वाली नदी में डुबकी लगाने जाते, और इसीलिये बुन्देलखण्ड में मकर संक्रान्ति का एक और नाम “बुड़की” भी प्रचलित है. तो इतनी सुबह नहाना, वो भी ठंडे पानी से!!! नहाने में आनाकानी करने वाले को कहा जाता कि- “यदि तुमने नहीं नहाया तो तुम लंका की गधी/गधा बनोगी अगले जन्म में. “ तब तो मैं छोटी थी, सो इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया कि आखिर लंका की गधी/गधा ही क्यों बनेगा कोई? लेकिन अब जरूर ये सवाल ज़ेहन में आता है तो पता करने की कोशिश भी करती हूं. लेकिन अब तक कोई सटीक जवाब नहीं मिल सका, जबकि मकर संक्रान्ति के दिन न नहाने वाले को यही कह कर डराने का चलन आज भी है.

तो भाई, सारे बच्चे नहा-धो के तैयार हो जाते. जो बच्चा नहा के निकलता, मम्मी उसके हाथ-पैरों में सरसों के तेल की हल्की मालिश करतीं, अच्छे कपड़े पहनातीं और कमरे में जल रही  गोरसी (  सर्दियों में आग जलाने के लिये इस्तेमाल किया जाने वाला मिट्टी का चौड़ा पात्र,  जिसमें हवन भी किया जाता है) के सामने बिठाती जातीं. जब सबने नहा लिया तो हम सब पूजाघर में इकट्ठे होते. यहां भगवान पर फूल चढाते, पहले से जल रहे छोटे से हवन कुंड में तिल-गुड़ के मिक्स्चर से हवन करते और वहीं बड़े से भगौने में रखी कच्ची खिचड़ी ( दाल-चावल का मिश्रण) पांच-पांच मुट्ठी भर, थाली में निकाल देते. काले तिल के लड्डू भी पांच-पांच की संख्या में ही निकालते. ये अनाज और लड्डू, गरीबों को दिया जाने वाला था.
इसके बाद हम सब फिर गोरसी को घेर के बैठ जाते और फिर शुरु होती पेट-पूजा. मम्मी सुबह हरे पत्तों वाली प्याज़ की मुंगौड़ियां  बनातीं और थाली में भर के बीच में रख देतीं. हम सब बच्चे मिल के उस पर हाथ साफ़ करते जाते. उड़द/ज्वार और मक्के की पूड़ियां भी सुबह ही बनतीं. दोपहर के खाने में केवल खिचड़ी बनती. ये खिचड़ी भी नये चावल से बनाई जाती. खिचड़ी खाने के विधान के चलते ही इस त्यौहार का नाम “खिचड़ी” भी है बुन्देलखंड में.  शाम को फिर मूंग की मुंगौड़ी, पूड़ियां, तरह-तरह के लड्डू और शक्कर के घोड़े/हाथी, जो बाज़ार से खरीदे जाते. गन्ने भी पूरे बाज़ार में बेचने के लिये लाये जाते. तो ये है बुन्देलख्न्ड की मकर संक्रान्ति… कृषि-प्रधान देश का कृषि आधारित साल का पहला त्यौहार.  देश के तमाम हिस्सों में इस दिन पतंगबाज़ी का भी रिवाज़ है. खासतौर से गुजरात और राजस्थान में.
ये एकमात्र ऐसा त्यौहार है जिसे अलग-अलग प्रदेशों में, अलग-अलग  नामों से जाना जाता है. मकर संक्रान्ति, पंजाब और हरियाणा में “लोहिड़ी”  के नाम से मनाई जाती है तो असम में यही “बिहू” हो जाती है. वहीं दक्षिण भारत में इसे “पोंगल” के नाम से मनाते हैं. दक्षिण में यह त्यौहार चार दिन तक मनाया जाता है. तिल-चावल और दाल की खिचड़ी

के अलावा यहां “पायसम” जो कि नये चावल और दूध से बनी विशेष प्रकार की खीर को कहा जाता है, भी बनाते हैं.
मकर संक्रान्ति के दिन भगवान भास्कर अपने पुत्र शनिदेव से स्वयं मिलने आते हैं. चूंकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, इसलिये इस त्यौहार को “मकर संक्रान्ति” के नाम से जाना गया. महाभारत में भीष्म पितामह ने शरीर त्यागने के लिये, मकर संक्रान्ति का दिन ही चुना था. तो तमाम पौराणिक/भौगोलिक/ और पर्यावरणीय महत्व वाले इस त्यौहार को आइये मनाते हैं पूरे रीति-रिवाज़ के साथ, क्योंकि इस की हर रीति में छुपा है आयुर्वेद का कोई न कोई राज़… आप सबको मकर संक्रान्ति की अनन्त शुभकामनाएं.



मंगलवार, 2 जनवरी 2018

आसपास की गलियों से गुजरती ‘बातों वाली गली’ - गिरिजा कुलश्रेष्ठ

गिरिजा कुलश्रेष्ठ... यानी फ़ुल-टू मिठास. मीठा स्वभाव, मीठी आवाज़, मीठा लेखन..... कुछ व्यक्तित्व सादगी की ऐसी प्रतिमूर्ति होते हैं, जो सादगी का स्वयमेव पर्याय बन जाते हैं. गिरिजा दीदी ऐसा ही व्यक्तित्व हैं. आइये देखें, क्या लिखती हैं वे.
यह सुखद संयोग है कि जब कभी ब्लाग पर दिख जाने वाली वन्दना अवस्थी दुबे, जिनका प्रथम परिचय सलिल भैया (सलिल वर्मा) की ‘जिज्जी’के रूप में हुआ था लेकिन पिछले साल अर्चना चावजी द्वारा बनाए वाट्सअप ग्रुप (गाओ गुनगुनाओ) के माध्यम से उनसे भेंट हुई तो मैं उनके व्यक्तित्त्व और वाक्कौशल से प्रभावित हुए बिना न रह सकी . गीत और संवादों के माध्यम से वे हर किसी की आत्मीया बन गई हैं . कहने की जरूरत नही कि जब इनका यह पहला कहानी संग्रह बातों वाली गली आया तो पढ़ने की उत्कण्ठा तीव्र हो उठी . पता चला कि पुस्तक आमेजोन से प्राप्त की जा सकती है पर शायद माँग पूर्ति से अधिक होजाने के कारण निराशा ही हाथ लगी . तब ग्रुप पर ही उन बहिनों से भेजने का आग्रह किया जो ‘बातों वाली गली’ की बातें करके जी ललचा रही थीं . तब बहिन ऊषाकिरण (मेरठ) ने मुझे यह पुस्तक भेजी यानी ‘बातों वाली गली’ . यह हुई इस बहुप्रतीक्षित पुस्तक को पाने की दास्तान .
बातों वाली गली में बीस कहानियाँ हैं .आसपास की ही ,रोजमर्रा के जीवन की छोटी छोटी बातों को लेकर बुनी गई बड़ी कहानियाँ जैसे हमारे आपके बीच गुजरती चलती हैं . निम्न मध्यम परिवारों में मेहमान के आने पर उनके नाश्ते वगैरह को देख बच्चे किस तरह ललचाते हैं यह मार्मिक और बहुत ही जाना माना प्रसंग है जिसे वन्दना जी ने कहानी (अपने अपने दायरे ) में खूबसूरती से पिरोया है . ‘अनिश्चितता में’ , छोटी किन्तु बेरोजगारी से आई हीनता की अच्छी कहानी है ‘.ज्ञातव्य’ कहानी में पापा की मेहमाननवाजी को कोसने वाले बच्चे अपनी तरह से घर चलाते हैं .इसमें नई पीढ़ी में दूर के या व्यर्थ मेहमानों के प्रति उपेक्षा के भाव को बखूबी दर्शाया है . वास्तव में यह आज का यथार्थ है . ‘आसपास बिखरे लोग’ , लोगों की संवेदनहीनता का निर्मम दस्तावेज है . दूसरों के यहाँ हुई दुर्घटना लोगों के लिये महज एक खबर है . पड़ोस में बहू के जल जाने पर लोग तमाम बातें तो करते है पर सच को सामने लाने वाला कोई कदम नही उठाते . शीर्षक कहानी , जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है घर में रहने वाली महिलाएं अक्सर किस तरह दूसरों के बारे में अनुमान लगाकर तिल का ताड़ बना लेतीं हैं यह बड़ा और कड़वा सच है . जैसा कि भूमिका में अचला जी ने कहा है अधिकांश कहानियाँ स्त्री विमर्श पर केन्द्रित हैं .’हवा उद्दण्ड है’ , ‘नीरा जाग गई है’ ,’अहसास’ ,’सब जानती है शैव्या’ ,’प्रिया की डायरी’ ,ममता जी बड़ी होगई हैं ‘विरुद्ध’ ,’बड़ी बाई साब’ आदि कहानियाँ स्त्री के असन्तोष , अपने अस्तित्व के प्रति जागरूकता ,व व्यवस्था के प्रति असन्तोष की कहानियाँ हैं . हाँ ‘रमणीक भाई नहीं रहे’ , ‘पापा सब तुम्हारे कारण हुआ’ , ‘शिव शिव बोल.’, .कुछ अलग तरह की कहानियाँ हैं .ये लगभग सारी कहानियाँ उनके ब्लाग किस्सा-कहानी पर भी हैं .
कुल मिलाकर सारी कहानियाँ हमारी अपनी हैं . आसपास की है . जहाँ तक कहानियों के कथ्य की बात है ,वे रोजमर्रा की सामान्य जिन्दगी का जीवन्त दस्तावेज हैं .उनके पात्र आप और हममें से ही हैं . पात्रों के मनोभावों का सूक्ष्म चित्रण लेखिका के गहन निरीक्षण व अनुभूति का परिचायक है . संवाद रोचक हैं. भाषा सरल और जन सामान्य की भाषा है . कहीं भी दुरूहता नहीं है . सहज प्रवाह है . खास बात है लेखिका के कहने का तरीका जो किस्सा कहानी सा ही रोचक है . हर कहानी इतनी रोचकता के साथ शुरु होती है कि पाठक का ध्यान सहज ही जिज्ञासा से भर जाता है . वर्णन बेशक गजब का है . चाहे वह देशकाल हो या अन्तर्संघर्ष . बहुत गहन व सूक्ष्म चित्रण है . कुछ भी बनावटी नहीं लगता . हाँ कहीं कहीं कहानी का उद्देश्य स्पष्टता की माँग करता प्रतीत होता है . कहीं कहीं शिल्प में भी कुछ सुधार की गुंजाइश है . मेरे विचार से ‘बड़ी बाई साब’ ऐसी ही कहानी है . 
निष्कर्षतः बातों वाली गली कहानी संग्रह पाठकों के बीच जगह बनाएगा नहीं , बना चुका है . आशा है कि आगे और भी निखार के साथ हमें उनकी कहानियाँ पढ़ने मिलेंगी .

बुधवार, 20 दिसंबर 2017

ज़मीन से जुड़ी कहानियों का संग्रह है- बातों वाली गली

पिता की नज़र में, पुत्री की पुस्तक-

हिन्दी भाषा साहित्य में अन्यान्य विधाओं का उद्भव कभी भी हुआ हो, किन्तु जहां तक कहानी विधा का सम्बन्ध है, इसका उद्भव तो साहित्य के जन्म से भी पुराना है. कदाचित, मानव-प्रजाति के जन्म के साथ ही कहानी का अवतरण हुआ है. पृथ्वी पर पदार्पण करने वाला शिशु मां की गोद से ही परिपुष्ट होकर जब बचपन की ओर अग्रसर होता है, तो मां ही उसे लोक-प्रचलित छोटी-छोटी कहानियां सुनाकर जीवन-पथ पर चल पड़ने के लिये तैयार करती है. सभ्यता के विकास के इसी क्रम में कहानी भी क्रमश: अपना कलेवर बदलती रही है. इसका यह विकसित स्वरूप आज कहां खड़ा है- सभी को इसका परिज्ञान है. यह कहना असंगत न होगा कि साहित्य की सभी विधाओं में लोकप्रियता की दृष्टि से आज कहानी सर्वोच्च आसन पर आसीन है. कहानी की चर्चा के इसी तारतम्य में वंदना अवस्थी दुबे कृत बातों वाली गली की चर्चा भी समीचीन है.
वन्दना का सद्य:प्रकाशित उक्त कहानी संग्रह- ’बातों वाली गली’ इस समय मेरे हाथों में है. पुस्तक के प्रथम अर्ध भाग पर अधुनातन शैली में सजा हुआ आकर्षक रंगीन चित्र है, तो शेष अर्ध भाग पर लेखिका के नाम सहित कहानी संग्रह का नाम-बातों वाली गली. सुधि पाठक भलीभांति जानते हैं कि कृति का नामकरण कितना महत्वपूर्ण काम है. शीर्षक को कृति की आत्मा कहा गया है. वन्दना के कहानी संग्रह के शीर्षक को कुछ यों परिभाषित किया जा सकता है कि वह गली या स्थान जहां मोहल्ले की प्राय: प्रौढ़ महिलाएं निरर्थक या अनर्थक बातें , यथा परनिंदा, चरित्र हनन, मनगढंत, सच्चे-झूठे किस्से और ईर्ष्या-द्वेष से पगी हुई कहानियां बड़े रसीले अन्दाज़ में पेश किया करती हैं. इस प्रकार गली के चरित्र को उजागर करता हुआ पुस्तक का यह शीर्षक वन्दना की परिपक्व दृष्टि और अधुनातन सोच को भी उजागर करता है. इस परिप्रेक्ष्य में पुस्तक का शीर्षक पूर्णत: उपयुक्त है.
साहित्यशास्त्रियों के अनुसार साहित्य की हर विधा के कुछ मूल तत्व होते हैं- सो कहानी के भी हैं- वे हैं :- शीर्षक, कथानक, सम्वाद, पात्र, चरित्र चित्रण, भाषा-शैली और उद्देश्य. एक अच्छे लेखक को अपनी रचना में इन्हें उपयुक्त स्थान देना चाहिये. किन्तु युग के प्रभाव से कोई भी अछूता नहीं. आज का युग बंधनविहीनता को प्राथमिकता देता है., सो कलाकार या साहित्यकार भी अपनी रचनाओं की सृष्टि करते समय प्राय: सम्बद्ध विधा के तत्वों के समावेश का खयाल नहीं- हां रचना में स्वत: उसका समावेश हो जाये , तो उसे ऐसा करने में कोई परहेज भी नहीं. जहां तक वन्दना का प्रश्न है- कहानी की रचना करते वक़्त भले ही उनकी दृष्टि उसके तत्वों की ओर न रही हो, किन्तु कोई भी विज्ञ पाठक उक्त तत्वों के समावेश को कहानियों में भली भांति देख-पढ़ सकता है. मैने वन्दना की सभी कहानियों को पूर्ण मनोयोग से पढ़ा है और पाया है कि प्राय: सभी कहानियों में उक्त तत्वों का सम्यकरूपेण समावेश हुआ है. कहानियों का कथानक लम्बा और उबाऊ न हो, सम्वाद या कथोपकथन लम्बे-लम्बे न हों, पात्रों के चरित्र चित्रण हेतु लेखकदृष्टि सजग हो और उद्देश्य स्पष्ट हो. इस दृष्टि से वन्दना को आप पूर्ण सजग पायेंगे. उन्होंने उक्त परिप्रेक्ष्य में पाठकों को शिक़ायत करने का कोई भी अवसर प्रदान नहीं किया है.
कहानी संग्रह ’बातों वाली गली में कुल बीस कहानियां संग्रहीत हैं. सर्वप्रथम कहानियों के कलेवर की बात की जाये तो आप पायेंगे कि वन्दना की बीस में से सत्रह कहानियों को तो लघुकाय कहानियों की संज्ञा दी जा सकती है. शेष अन्तिम तीन कहानियां ही ऐसी हैं जिन्हें दीर्घ कलेवर प्राप्त है. आज के युग की विशेषता है और आवश्यकता भी कि रचनाओं का कलेवर आकार-प्रकार की दृष्टि से छोटा होना चाहिये ताकि पाठक कम से कम समय में अधिक से अधिक पढ़ सके. वन्दना ने समय की इस नब्ज़ को भली प्रकार पहचाना है; एतदर्थ ही उन्होंने लघु आकार की रचनाएं लिखकर पाठक को कम से कम समय में अधिक से अधिक कहानियां पढ़ने का अवसर प्रदान किया है. पाठक-वर्ग ने इस हेतु लेखिका की सराहना भी की है. वन्दना की कहानियों की लोकप्रियता का एक महत्वपूर्ण कारण यह भी है.
आइये, थोड़ी सी चर्चा अब कहानियों के कथानकों की :- वैसे तो कहानी संग्रह में बीस कहानियां और हर कहानी का अपना अल्ग अलग कथानक है किन्तु संग्रह के समग्र कथ्य पर विचार करने पर हमें विदित होता है कि वन्दना की समस्त कहानियां मध्यमवर्गीय भारतीय समाज की दशा और दिशा पर आधारित हैं. यद्यपि लेखक की हर कहानी कल्पना प्रसूत होती है जिनमें यथार्थ से परे जाकर लिखने की भी सम्भावना विद्यमान रहती है किन्तु इस संग्रह में लेखिका ने सम्भाव्य को स्वीकार करते हुए प्राय: प्रत्येक कहानी में यथार्थ का चित्रण किया है. परिणामस्वरूप, पाठक को पढ़ते समय संग्रह की कहानी स्वयं अपनी कहानी प्रतीत होती है. इस स्थिति में पाठक कहानी के पात्रों से तादात्म्यावस्था स्थापित करने में सफल होते हैं. काव्य की चरम रसानुभूति यही है और यही रचना की सफलता भी है. वन्दना अपनी कहानियों में यह रसाभास कराने में सफल हैं.     
कहानी संग्रह का एक अन्य मुख्य बिन्दु है कथानक के लिये चयनित सामाजिक क्षेत्र. हमारे देश का समाज जीवन-यापन की दृष्टि से तीन स्तरों में विभाजित है- उच्च वर्ग, मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग. देश की अधिकांश जनता मध्यम वर्गीय जीवन जीती है. इस वर्ग के लोगों का रहन-सहन प्राय: ’हां’ और ’न’ के द्वन्द से आवृत्त रहता है. ऐसे लोगों की आर्थिक स्थिति थीक नहीं होते हुए भी उनके दैनन्दिन जीवन की आवश्यकताओं की किसी प्रकार पूर्ति होती रहती है. सुख-दुखमय जीवन-तराजू के ये दोनों पलड़े कभी ऊंचे और कभी नीचे आते-जाते रहते हैं. कहा जाता है-’साहित्य समाज का दर्पण होता है.’ अर्थात कथित समाज की वास्तविक तस्वीर वहां के साहित्य में देखी जा सकती है. जहां तक वन्दना की कहानियों का प्रश्न है – वे मध्यम वर्ग की अपनी ही जैसी कहानियां हैं. चंद म महिलाओं में ’ देख न सकहिं पराई विभूति’ का प्राकृतिक गुण होता है. वन्दना की लगभग आधी कहानियां इसी गुण से सम्पन्न महिलाओं का सूक्ष्म विश्लेषण करतीं हैं. ऐसी महिलाओं की मानसिकता का उन्होंने जीवन्त चित्रण  बड़ी स्वाभाविक शैली में किया है, उदाहरणार्थ- कहानी ’अलग-अलग दायरे, नीरा जाग गयी है, अहसास, दस्तक के बाद, करत-करत अभ्यास के, बड़ी हो गयी हैं ममता जी, और विरुद्ध आदि कहानियों को रखा जा सकता है.  कुछ कहानियां ऐसी भी हैं जिनमें महिला समाज की जागरूक और साहसी महिलाओं का चित्रण है- प्रिया की डायरी, बातों वाली गली, नीरा जाग गयी है, और सब जानती है शैव्या इसी प्रकार की कहानियां हैं. इनके अतिरिक्त कुछ कहानियों में समाज के विविध रंग भी चित्रित किये हैं जैसे- नहीं चाहिये आदि को कुछ में बाल मनोविज्ञान का चित्रण है तो अनिश्चितता में दो भाइयों के जीवन स्तर की गाथा है. हवा उद्दंड है में वर्तमान युग की रुग्णता दर्शाई गयी है तो बड़ी बाई साब में सामंती प्रवृत्ति का चित्रण. इन सबके विपरीत शिव बोल मेरी रसना घड़ी घड़ी एक ऐसी कहानी है जो आस्था और धर्म के नाम पर ढोंगी बाबाओं के कलुषित चरित्र को न केवल उजागर करती है, बल्कि ऐसे ढोंगी महात्माओं से दूर रहने, सावधान करती है. राम रहीमों के उदाहरण आज भरे समाज, यत्र तत्र अपने आसन जमाये हुए हैं.
जहां तक कहानी संग्रह की भाषा शैली का सवाल है, इसकी भाषा बड़ी सहज और स्वाभाविक है जो पाठक के मन-मस्तिष्क में आसानी से उतरती चली जाती है. शब्दों की दुरूहता से दूर , इसमें यत्र तत्र कुछ विदेशी भाषा के शब्दों का प्रयोग किया गया है, लेकिन ये केवल इसलिये कि लेखिका की भाषा, जन सामान्य की भाषा बन सके. कहानी की शैली तो चित्ताकर्षक है ही- इसे सुधि पाठक बंधु स्वयं महसूस करेंगे. कहानी के अन्य तत्व यथा सम्वाद और उद्देश्य भी यथानुरूप देखने को मिलते हैं. हर कहानी का जिज्ञासापूर्ण अन्त उसके उद्देश्य-पूर्ति की घोषणा स्वत: कर देती है. कुल मिला के उक्त कहानी संग्रह में प्राय: सभी तत्वों का सम्यक रूपेण समावेश हुआ है. कहा जा सकता है कि बातों वाली गली आज के युग की दृष्टि से एक सफल कृति है जिसके लिये वन्दना साधुवाद की पात्र हैं.
                                       प्रकाशन की ड्रुष्टि से यह कहानी संग्रह बातों वाली गली वन्दना की यद्यपि पहली कृति है तथापि एक कथाकार और लेखिका के रूप में हिन्दी जगत में उनका स्थान वर्षों पूर्व से सुरक्षित है. उनकी कहानियां और आलेख विगत अनेक वर्षों से देश की प्रसिद्ध हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर प्रकाशित होते रहे हैं. पत्रकार-जगत में भी उनकी अच्छी खासी पैठ है. देशबंधु के कार्यकाल में उन्होंने एक सक्षम पत्रकार के रूप में ख्याति अर्जित की है. समय-समय पर आयोजित होने वाली गोष्ठियों, सेमिनारों , साहित्यिक समारोहों में भी वे प्रतिष्ठित सहभागी के रूप में भाग लेती रही हैं. तमाम हस्तियों के साक्षात्कार भी उनके खाते में हैं.
वन्दना का यह प्रथम कहानी संग्रहबातों वाली गली अत्यल्प अवधि में ही बहुत लोकप्रिय सिद्ध हुआ हैसुधी पाठकों की समर्थ प्रतिक्रियाओं से यह भलीभांति स्पष्ट है. मुझे पूरा भरोसा है कि निकट भविष्य में यह संग्रह- गली-गली की बात बनने वाला है. ईश्वर करे, ऐसा ही हो. मेरी सद्भावना और आशीर्वाद.
राम रतन अवस्थी

                                   

मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

बातों वाली गली- मेरी नज़र से


साधना वैद जी को कौन नहीं जानता! जितनी प्यारी वे खुद हैं, उतना ही प्यारा लिखती भी हैं. आइये उनकी नज़र से जानें "बातों वाली गली" को-

ये लीजिये ! इस ‘बातों वाली गली’ में एक बार जो घुस जाए उसका निकलना क्या आसान होता है ! इसकी उसकी न जाने किस-किस की, यहाँ की वहाँ की न जाने कहाँ-कहाँ की, इधर की उधर की न जाने किधर-किधर की बस बातें ही बातें ! और इतनी सारी बातों में हमारा तो मन ऐसा रमा कि किसी और बात की फिर सुध बुध ही नहीं रही ! आप समझ तो गए ना मैं किस ‘बातों वाली गली’ की बात कर रही हूँ ! जी यह है हमारी हरदिल अजीज़ बहुत प्यारी ब्लगर वन्दना अवस्थी दुबे जी की किताब ‘बातों वाली गली’ जिसमें उनकी चुनिन्दा एक से बढ़ कर एक २० कहानियाँ संगृहीत हैं ! सारी कहानियाँ एकदम चुस्त दुरुस्त ! मन पर गहरा प्रभाव छोड़तीं और चेतना को झकझोर कर बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करतीं !

इन कहानियों को पढ़ कर इस बात का बड़ी शिद्दत से एहसास होता है कि नारी मन की गहराइयों को नाप लेने की वन्दना जी में अद्भुत क्षमता है ! यूँ तो सारी ही कहानियाँ बहुत बढ़िया हैं लेकिन कुछ कहानियों में नारी मन की अंतर्वेदना का वन्दना जी ने जिस सूक्ष्मता के साथ चित्रण किया है वह देखते ही बनता है ! इन कहानियों को पढ़ते-पढ़ते कई बार अचंभित हुई कि अरे मेरी तो कभी वन्दना जी से बात ही नहीं हुई फिर इस घटना के बारे में इन्हें कैसे पता चल गया  और इतने सटीक तरीके से इन्होंने इसे कैसे लिख दिया ! क्या यह भी संयोग है कि स्वयं पर बीती हुई अनुभूत बातें ठीक उसी प्रकार औरों के साथ भी बीती हों ? चित्रण इतना सजीव और सशक्त कि जैसे चलचित्र से चल रहे उस घटनाक्रम के हम स्वयं एक प्रत्यक्षदर्शी हों ! लेखिका की यह एक बहुत बड़ी सफलता है कि पाठक कहानियों के चरित्रों के साथ गहन तादात्म्य अनुभव करने लगते हैं ! भाषा और शैली इतनी सहज और प्रांजल जैसे किसी मैदानी नदी का एकदम शांत, निर्द्वन्द्व, निर्बाध प्रवाह !

नारी को कमतर आँकने की रूढ़िवादी पुरुष मानसिकता पर करारा प्रहार करती कहानियाँ ‘सब जानती है शैव्या’ और ‘प्रिया की डायरी’ बहुत सुन्दर बन पडी हैं ! कुछ कहानियाँ जो मन के बहुत करीब लगीं उनके नाम अवश्य लूँगी ! ‘अहसास’, ‘विरुद्ध’ और ‘बड़ी हो गयी हैं ममता जी’ मुझे विशेष रूप से बहुत अच्छी लगीं ! ‘दस्तक के बाद’, ‘नीरा जाग गयी है’, ‘बड़ी बाई साहेब’ और ‘डेरा उखड़ने से पहले’ कहानियों में हम भी स्त्री की हृदय की विषम वीथियों में जैसे वन्दना जी के हमराह बन जाते हैं ! ‘हवा उद्दंड है’, ‘बातों वाली गली’ और ‘आस पास बिखरे लोग’ वास्तव में इतनी यथार्थवादी कहानियाँ हैं कि ज़रा इधर उधर गर्दन घुमा कर देख लेने भर से ही इन कहानियों के पात्र सशरीर हमारे सामने आ खड़े होते हैं !

‘बातों वाली गली’ कहानी संग्रह की हर कहानी हमें एक नए अनुभव से तो परिचित कराती ही है हमारी ज्ञानेन्द्रियों को नए स्वाद का रसास्वादन भी कराती है !

पुस्तक नि:संदेह रूप से संग्रहणीय है ! इतने सुन्दर संकलन के लिए वन्दना जी को बहुत-बहुत बधाई ! वे इसी तरह स्तरीय लेखन में निरत रहें और हमें इसी प्रकार अनमोल अद्वितीय कहानियाँ पढ़ने को मिलती रहें यही हमारी शुभकामना है ! आपकी अगली पुस्तक की प्रतीक्षा रहेगी वन्दना जी ! हार्दिक अभिनन्दन !



गुरुवार, 30 नवंबर 2017

च्यूइंग गम सा चबा रही हूं कहानियों को : उषाकिरण

महीने भर इंतज़ार करवाया उषाकिरण  ने, लेकिन आज जब उनकी पोस्ट देखी, तो मन बल्लियों उछलने लगा। आप भी देखें क्या लिखा उन्होंने।
बातों वाली गली
लम्बे इंतजार के बाद आज कासिद ने “बातों वाली गली” लाकर दी..बेसब्री से पैकिंग फाड़फूड़ कर फेंकी..उलटी-पलटी..सुंदर कवर ,हाथ में लेते ही गुनगुनाती ,फुसफुसाती,ठहाके लगाती आवाजें कानों में खुसपुस करने लगीं...पढ़ रही हूं जैसे च्यूंइंगम सी चबा रही हूं ..वन्दना बिना ताम-झाम ,बिना भारी भरकम कथानक और बिना बोझिल संवादों के जितनी सहजता ,सरलता से रोचक कहानियां लिखी हैं पढ़ते लगता है कि अरे ऐसा 
तो रोज होता है हमारे साथ या हमारे आस-पास ..तो हम क्यों नहीं लिख सकते भई ,हम भी लिख सकते हैं ऐसी कहानियां ..बस क्लिक नहीं हुईं..पर लिखी तो नहीं न उषा किरण ..इसी लिए तो तुम ,तुम हो वन्दना अवस्थी दुबे नहीं न ...वैसे हो बहुत खतरनाक आपसे मिलते बहुत सावधान रहना होगा ..गज़ब की ऑब्जर्वर हैं आप..जैसे आंखों में एक्सरे मशीन फिट हो..और फिर इतनी खूबसूरती से वो सारा मसाला कहानी में मिलाया आपने..आपकी सभी कहानियां कितनी अपनी सी लगती हैं..छोटे-छोटे सादे से वाक्यों के साथ आपका अपना मन्तव्य भी चलता रहता है..जैसे किसी कोने में बैठ देख रही हैं सब और बड़बड़ा रही हैं ।अचानक आगंतुक के आ जाने पर हुई हड़बड़ाहट ,बेरोजगारी की बेचारगी,गली मोहल्ले के लोगों की ताक -झांक वाली मानसिकता,बस में बत्तमीजी झेलती महिलाओं की मन:स्थिति जैसे विषयों को बहुत खूबसूरती से उठाया है..सारी कहानियां बहुत ही रोचक हैं कहानी के शीर्षक और अंत भी बहुत रोचक लगे वन्दना..कहानी की आखिरी लाइन एकदम मामूली होने पर भी आशा का बीज बो जाती हैं ,राहत देती हैं ..पाठक को खुद ही आगे का कथानक गढ़ने पर मजबूर करती हैं..लगता है चलते -चलते जिंदगी एक लम्बी सांस लेती है और फिर आगे बढ़ती है खरामा-खरामा नए जोश,नए कथानक के साथ..आखिरी कहानी शिव बोल मेरी रसना ..बहुत रोचक लगी बाबा राम रहीम की याद दिला गई..अलग-अलग दायरे , ज्ञातव्य ,बातों वाली गली,हवा उद्दंड है , रमणीक भाई नहीं रहे ,सब जानती है शैव्या ,प्रिया की डायरी, बड़ी हो गई हैं ममता जी आदि सभी कहानियां बेहद रोचक हैं..इतनी सुंदर पुस्तक लिखने के लिए बहुत बधाई और शुभकामनाएं वन्दना जी ..उम्मीद है भविष्य में भी हमको आपकी ऐसी बहुत सी किताबें पढ़ने को मिलेंगी ...किताब पढ़ कर तुरंत अपनी प्रतिक्रिया लिखी थी पर फिर कहीं लिखा हुआ रख कर भूल गई..आज मिली तो प्रस्तुत है

मंगलवार, 21 नवंबर 2017

निष्ठा की कलम से-बातों वाली गली

वंदना दी की किताब सोमेश के मार्फ़त मिली। जब से किताब के बारे में मालूम चला था, तब से ही पढ़ने के लिए उत्साहित थी। और मिली उसके कुछ दिन बाद ही पूरी किताब पढ़ ली थी। पर उस पर यहाँ लिखना कुछ व्यस्तताओं की वजह से इतनी देर से हो पायेगा, यह मुझे भी न मालूम था। सो अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने में देरी के लिए वंदना दी से क्षमाप्रार्थी हूँ।
कुछ कहानियां होती हैं जो आपके दिल को छू जातीं हैं यह किताब कुछ ऐसी ही सुंदर कहानियों का संग्रह है। सफ़दर हाशमी की पंक्तियाँ "किताबें करतीं हैं बातें" इस पुस्तक पर एकदम सटीक बैठती है। आखिर शीर्षक भी है "बातों वाली गली"। सच यह किताब पढ़ते हुए हम भूल जाते हैं कि किताब पढ़ रहे हैं बल्कि किताब खोलते ही आस पास के लोग हमसे बतियाने आ जाते हैं। लेखिका के अनुभव संसार से गुजरते हुए सारे पात्र धीरे धीरे हमारे सामने खुलते जाते हैं। हर पात्र हमें अपरिचित न लगते हुए एकदम जाना पहचाना लगता है। एक जुड़ाव सा हो जाता है पात्रों से। हर कहानी पठनीय है एकदम जिंदगी से जुडी हुई।
संग्रह की कहानियां जिंदगी के छोटे छोटे विमर्श को केंद्र में लाती हैं जो कई बार अनदेखे अनछुए रह जाते हैं। शीर्षक कहानी 'बातों वाली गली' उन स्त्रियों की मानसिकता पर कटाक्ष है जिन्हें दूसरों के घर में झाँकने और उनके बारे में अनर्गल प्रलाप में बड़ा रस मिलता है। कहानी 'बड़ी हो गईं हैं ममता जी' में सास बहू के रिश्ते का सटीक चित्रण है। सास का बहू पर इतना दबदबा रहा है कि सास के चले जाने पर भी उसे अपने बहुपने से मुक्ति असहज लगती है। उसे अब भी 'दुलहिन' पुकारे जाने की ही आदत हो गयी है। वहीं 'रमणीक भाई नहीं रहे' स्वाबलंबन का पाठ पढ़ाती कहानी है जिसमें एक पिता इतना कर्मठ है कि उसके बेटे बुढापे तक भी उसके ही आसरे व्यापार चला रहे हैं और उनके जाने के बाद परिवार तनाव में हैं कि व्यापार कैसे चलेगा।
एक माँ जो अपने को उम्रदराज स्वीकार करने को तैयार नहीं पर घर में हो रही शादी व बच्चों की लायी एक साड़ी उसे उसकी उम्र का अहसास करा जाती है। यह बात खूबसूरती से बयां की है कहानी 'दस्तक के बाद' में।
'अहसास' कहानी है संयुक्त परिवार में अपने प्रति हो रहे भेदभाव को महसूस कर उसके खिलाफ आवाज उठाने की।
साधुओं के ढोंग-ढकोसले की पोल खोलती, और अंधविश्वासों पर प्रहार करती एक बेहतरीन कहानी है 'शिव बोल मेरी रसना घड़ी घड़ी'।
इनके अतिरिक्त विरुद्ध, करत करत अभ्यास के, प्रिया की डायरी,अहसास, नीरा जाग गयी है स्त्री विमर्श के विभिन्न पहलुओं को छूती हुई कहानियां हैं।
यह किताब एक ऐसी किताब है जिसे आप शुरू करेंगे तो एक बार में ही पूरी पढ़े बिना नहीं रुकेंगे। अपने आप ही कहानी दर कहानी आपको अपने में डुबोती जायेगी। कहानियों की भाषा एकदम सहज सुगम्य, खूबसूरत आंचलिक शब्दों से गुंथी हुई है। इसलिए हम एक सांस में ही पूरी किताब पढ़ जाते हैं। यह किताब आप अपने हर दोस्त को तोहफे में दे सकते हैं। क्योंकि सभी अपने जीवन के किसी न किसी पहलू से इन कहानियों को जुड़ा पाएंगे।
सहज सरल भाषा शिल्प में गुथी इन सुंदर कहानियों के लिए वंदना दी बधाई की पात्र हैं। उनकी अगली किताब का इंतजार रहेगा।

शुक्रवार, 27 अक्तूबर 2017

किस्सों वाली गली है ये - गंगाशरण सिंह


इंतज़ार  का फल मीठा होता है, आज साबित हुआ। हर रोज़ देखती थी कि गंगा शरण जी ने लिखा क्या? मित्रों में चन्द मित्र ऐसे होते हैं जिनकी टिप्पणी विश्वसनीय होती है। आप ऐसे ही मित्र और सजग पाठक हैं। किसी भी लेखक की पुस्तक पर इतनी विस्तृत समीक्षा, उसे किस तरह आंदोलित करती है ये केवल वही समझ सकता है जो इस अनुभव से गुज़र चुका हो। अपने व्यस्तम समय में से आपने इतना समय किताब के लिए चुराया, ये मेरा सौभाग्य है। ऐसे सुहृद मित्र को धन्यवाद कहना बेमानी है।
"रुझान पब्लिकेशन से 2017 में प्रकाशित "बातों वाली गली" वंदना अवस्थी दुबे का पहला कहानी संग्रह है। अलग अलग विषयों के इतने किस्से इस किताब में शामिल हैं कि इसका नाम किस्सों वाली गली भी हो सकता था। विषयों का वैविध्य ये दर्शाता है कि लेखिका के पास जीवन अनुभवों की कमी नही है और वो अपने आसपास की चीजों और घटनाओं को कितनी सजगता से अपने अवचेतन में सहेजती हैं। संग्रह की प्रत्येक कहानी असाधारण नही है किंतु एक गुण हर रचना में मौजूद है और वो है पठनीयता जो किसी भी कहानी का अनिवार्य तत्व है। अधिकांश कहानियों का विषय और प्रस्तुति आश्वस्तिकारक है। जिस नारी विमर्श का ज़िक्र भूमिका में हुआ है उसकी मात्रा भी काफी संतुलित है। कुछ स्वनामधन्य लेखकों/ लेखिकाओं की तरह उनके नारी पात्र न तो हर जगह क्रान्ति का झंडा लेकर खड़े होते हैं और न ही प्रगतिशीलता के नाम पर कहीं भी कपड़े उतारने लगते हैं। ये पात्र एक सीमा तक अनुचित बातों या परिस्थितियों को सहन करते हैं और फिर एक दिन साहस करके अपनी नियति को बदलने के प्रयास में लग जाते हैं।
"नहीं चाहिए आदि को कुछ" एक बच्चे के मनोविज्ञान पर केंद्रित अच्छी कहानी है। गरीब घर का आदि अपनी धनवान दोस्त के सुख सुविधाओं से लैस जीवन को देखकर प्रायः दोनों घरों की तुलना करता रहता है। एक दिन किसी दुर्घटना के कारण उसका पूरा दिन अपने उसी दोस्त के घर बीतता है। अपने घर जैसा स्वच्छन्द वातावरण न पाकर वहाँ के अनुशासित माहौल में शाम होते होते वो ऊब जाता है।
इसी तरह की एक और रोचक कहानी "प्रिया की डायरी" जिसमें प्रिया का पति उसे हमेशा ताना मारता रहता है कि आखिर क्या काम करती है वो दिन भर। पूरे दिन घर को सँभालने में व्यस्त वह गृहिणी एक दिन सबसे पहले अपने लिए नौकरी ढूँढती है और फिर घर के नियमों का नया प्रारूप पति के सामने रख देती है जिनके हिस्से में इतने काम आ जाते हैं कि पहले दिन ही उनकी ट्रेन पटरी से उतर जाती है और बच्चे स्कूल ही नहीं जा पाते हैं ।
"बड़ी हो गयीं हैं ममता जी" एक मार्मिक कहानी है जिसमें घर की इकलौती बहू लम्बी उम्र तक अपनी सास द्वारा हमेशा आवाज या आदेश दिए जाने से कभी कभी झुँझला उठती है। एक दिन रात को खाना खाकर सास सोयीं तो सोती ही रह गयीं। उनके न रहने पर बहू निश्चिन्त अनुभव करती है या नहीं ये आपको कहानी पढ़कर ही मालूम हो सकेगा।
संग्रह के आख़िर में तीन लंबी कहानियाँ हैं जिनकी विषय वस्तु का निर्वाह बड़ी कुशलता और विस्तार से हो सका है।
"डेरा उखड़ने से पहले" एक ऐसे परिवार की कहानी है जहाँ पिता फक्कड़ और निश्चिन्त टाइप के हैं। लड़कियों के विवाह की फ़िक्र न तो पिता को हैं , न स्वार्थी भाइयों को। और सब तो ठिकाने लग जाते हैं पर सरकारी नौकरी कर रही सबसे छोटी आभा के सामने शेष रह जाता है एक अनिश्चित एकाकी जीवन और हमेशा कोई न कोई फायदा उठाते परिवार के लोग। और फिर.....
"शिव बोल मेरी रसना घड़ी घड़ी" धर्मभीरु जनता की भावनाओं का फायदा उठाने वाले ठगों की अनोखी दास्तान है। हमारे समाज का एक काफी बड़ा तबका ऐसा है जो धर्म के नाम पर कहीं लुट सकता है और जरूरत पड़ने पर उन्माद की सीमा भी पार कर सकता है। ऐसा ही एक वर्ग वह भी है जो हर बात में उत्सुक हो ताक झाँक करने को जीवन का आनन्द मानता है। इसी स्वभाव के चलते एक दिन वहाँ के आस्थावान लोग उस उजड़ी हवेली के बेरोजगार मनचलों को साधू मान लेते हैं और फिर उन लफंगों के हाथों लुटने का दौर शुरू हो जाता है।
"बड़ी बाई साहब" नए और पुराने मूल्यों में निरंतर पैदा होते अंतराल और एक सशक्त महिला के सामजिक और पारिवारिक वर्चस्व की मानसिकता को बखूबी बयान करती है।
वंदना जी को इस कहानी संग्रह के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ। उनकी किस्सागोई हर कहानी के साथ बेहतर होती गयी है। उम्मीद करते हैं कि अगला संग्रह बहुत जल्द हमारे सामने होगा।