बुधवार, 11 सितंबर 2019

दिमाग़ के दरवाज़े खोलता है- बन्द दरवाज़ों का शहर



पिछले एक साल में बहुत सारी पुस्तकें इकट्ठा हो गयीं, पढ़ने के लिये, और फिर लिखने के लिये. न बहुत पढ़ पाई, सो लिख भी नहीं पाई. अब एक-एक करके पढ़-लिख रही हूं. रश्मि का कहानी-संग्रह, ’बन्द दरवाज़ों का शहर’ प्रकाशित होते ही ऑर्डर कर दिया था. कुछ कहानियां पढ़ भी ली थीं, लेकिन लिखने के लिये कुछ से बात नहीं बनती. पूरा और शब्दश: पढ़ना ज़रूरी होता है. फिर किताब यदि अपनी दोस्त की हो, तो ये शब्दश: पढ़ना मजबूरी नहीं, बल्कि बाखुशी होता है. तो जून के किसी हफ़्ते में मैने कहानी संग्रह पढ़ना चाहा. बुक-शेल्फ़ में देखा, अपनी टेबल पर देखा, अपने ऑफ़िस के कोने-कोने में झांका, मम्मी के कमरे में तलाशा, पूरे घर में एक बार, दो बार, तीन बार...कई बार खोजा. नहीं मिला ’बन्द दरवाज़ों का शहर’......! अब क्या हो? मैने तो पूरी कहानियां पढ़ी ही नहीं अभी...!. इस्मत को फोन लगाया-’ तुम्हें दी क्या रश्मि की किताब? तुम्हारे साथ दिल्ली तो नहीं पहुंच गयी? इस्मत ने इंकार में ज़ोर से सिर हिलाया. बोली, तुमने ज्योति को दी होगी. ज्योति को मैने नहीं दी है, ये मुझे अच्छे से याद था. अब क्या हो? आनन-फानन दोबारा ऑर्डर की गयी किताब. जब आई, उन दिनों इस्मत सतना में ही थीं, और घर पर ही थीं. बाहर से अपना पार्सल ले के लौटी , किताब देखते ही इस्मत बोली-’ दोबारा क्यों मंगवाई? है तो तुम्हारे पास.’ अब हम झल्लाए, - तुम्हें पता तो है मिल नहीं रही. पता नहीं कहां गयी.’ अब इस्मत ने पलट-झल्लाहट दिखाई- ’ ऐसे कैसे नहीं मिल रही? वहां पापाजी के बुक शेल्फ़ पर रखी तो है!’
’हैं....! ले के आओ तो जानें.’
इस्मत उठीं, मम्मी के कमरे में गयीं और ’बन्द दरवाज़ों का शहर’ हिलाते हुए ले आईं. हम दंग!! हमें क्यों न दिखी? हमने तो चार बार ढूंढ़ी थी वहां! खैर, अब दो हो गयी थीं, तो एक इस्मत रानी ने मुस्कुराते हुए अपने बैग के हवाले की, ये कहते हुए- कि ये दूसरी शायद तुमने हमारे लिये ही मंगवा ली. चलो ये भी बढ़िया हुआ.
तो ये तो किस्सा हुआ किताब के गुमने और मिलने का. अब किताब की चर्चा हो जाये.
’बन्द दरवाज़ों का शहर’ रश्मि रविजा की दूसरी कृति है. पहली कृति ’कांच के शामियाने’ थी. महाराष्ट्र साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित इस उपन्यास ने पर्याप्त ख्याति बटोरी, और अब ये कहानी संग्रह भी उसी राह पर है. इस कहानी-संग्रह में कुल बारह कहानियां हैं. कुछ पुरानी हैं, तो कुछ नयी हैं. कुछ लम्बी हैं, तो कुछ छोटी हैं. पहली कहानी ’ चुभन टूटते सपनों के किरचों की, दो बहनों की कहानी है. बड़ी बहन, जिसका ब्याह तब हो गया, जब उसने सपने देखने शुरु भी नहीं किये थे. सपनों के बीच आंखों की मिट्टी में दबे रह गये. लेकिन जब उसे पता चलता है कि उसके ये अनदेखे, अनउपजे सपने, छोटी बहन की आंखों में पनप रहे हैं, बल्कि पौधे का आकार ले चुके हैं तो वो एक अजानी खुशी से भर जाती है. लेकिन जब कहानी के अन्त में वो शादी और प्रेम को लेकर छोटी बहन की व्याख्या सुनती है, तो अवाक रह जाती है. उसे लगता है, जैसे उसके अपने सपने टूट गये हों. छोटी बहन अपने प्रेम के प्रति अचानक क्यों अलग रवैया अपना लेती है, ये आप खुद जानिये, कहानी पढ़ने के बाद.
दूसरी कहानी है- ’अनकहा सच’ ये ऐसे साथियों की कहानी है, जो बचपन से साथ हैं, एक दूसरे को पसन्द करते हैं, लेकिन ज़ाहिर कोई नहीं करता. बाद में क्या होता है, इस रोचक कहानी में, ये आप खुद पढ़ें. तीसरी कहानी-’पराग... तुम भी’ ये भी प्रेमकथा है. ऐसी प्रेम कहानी, जिसमें साथ पढ़ने वाला जोड़ा साथ जीने-मरने के सपने संजोता है. कथा की नायिका पल्लवी पहले नौकरी पा जाती है, जबकि नौकरी के लिये संघर्ष करता पराग जब मुम्बई में जॉब पाता है तो पल्लवी को नौकरी छोड़ने की बात जिस आसानी से कह देता है, वो रवैया पल्लवी के गले नहीं उतरता. आम पुरुष मानसिकता को बखूबी दर्शाती है ये कहानी. चौथी कहानी है- ’दुष्चक्र’ ये कहानी एक ऐसे मेधावी लड़के की कहानी है जो नशे की लत का शिकार हो जाता है. किशोरवय से ही गलत संगत में पड़ के बच्चे किस तरह भयानक रास्ता अपना लेते हैं, और ज़िन्दगी किस तरह दिशाहीन हो जाती है, इन सारे भावों को समेटे है ये कहानी.
कहानी-संग्रह की शीर्षक कथा है- ’बन्द दरवाज़ों का शहर’. ये कहानी पता नहीं कितनी, एकाकी रह जाने वाली महिलाओं की कहानी है. उस महानगरीय एकाकीपन की कहानी, जहां घर में बस सुबह आठ बजे तक ही अहबड़-तबड़ मचती है, जब तक घर का पुरुष काम पर निकल नहीं जाता. उसके बाद औरत का एकाकीपन शुरु होता है, जो खत्म ही नहीं होता, पति के घर लौटने के बाद भी. क्योंकि पति के पास समय ही नहीं, जो पत्नी को दे सके. ऐसे में किसी के द्वारा ज़रा सा भी ध्यान देना, आकर्षण का कारण बन जाता है. लेकिन मध्यमवर्गीय मानसिकता इस भाव को भी किस तरह लेती है, पढ़ियेगा कहानी में. बहुत सार्थक कथा है ये. ’कशमकश’ एक ऐसे युवा की कहानी है जो अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद बेरोज़गार है. घर वालों के सपने साकार न कर पाने का दंश किस क़दर कच्गोटता है बेरोज़गार लड़कों को, ये इस कहानी को पढ़ के बखूबी महसूस किया जा सकता है. ’खामोश इल्तिज़ा’ तन्वी नाम की एक ऐसी लड़की की कहानी है, जिसने ज़िन्दगी में इतने धोखे खाये हैं, कि अब उसे बहुत जल्दी किसी पर भरोसा नहीं होता. पति से अलग होने के बाद जब सचिन ने उसके जीवन में दस्तक दी, तो तन्वी ने जानबूझ के दरवाज़े बन्द ही रखने चाहे. ये दरवाज़े खुले, या बन्द ही रहे, जानिये इस कहानी को पढ़ के.
              संग्रह की अन्य कहानियां – पहचान तो थी, पहचाना नहीं था, होंठिओं से आंखों तक का सफ़र, दुख सबके मश्तरक, पर हौसले जुदा भी एकदम अलग विषयों पर लिखी गयीं बेहतरीन कहानियां हैं. रश्मि की शैली बिल्कुल सहज और भाषा सरल है, इसलिये कहानियां हर तरह का पाठक वर्ग पसन्द करेगा. कहानियों के विषय भी आम जीवन से जुड़े हैं सो वे भी पाठक वर्ग को अपने बीच की ही लगती हैं. कहानी की सबसे बड़ी शर्त होती है उसकी पठनीयता. यदि कहानी खुद को पूरा पढ़ने के लिये मजबूर करे, तो समझिये, लेखन में भरपूर पठनीयता ह और यही विशेषता है एक कथाकार की, जो रश्मि के पास मौजूद है. अनुज्ञा बुक्स-दिल्ली से प्रकाशित. 180 पृष्ठ के इस संग्रह की कीमत 225 रुपये है. पुस्तक का कवर पेज़ आकर्षक है. सबसे बड़ी बात, पुस्तक में कहीं भी प्रकाशकीय ग़लतियां नहीं हैं. ये बहुत बड़ी बात है.  इस पुस्तक के लिये लेखिका- रश्मि रविजा और प्रकाशक को हार्दिक बधाई.    .

मंगलवार, 6 अगस्त 2019

लन्दन की सैर कराती है-’देशी चश्मे से लन्दन डायरी


उत्सवी रंग में रंगा लंदन, इन दिनों पूरी तरह से एशियाई त्यौहारमयी हो जाता है. अपनी-अपनी पहचान और संस्कृति को बचाए रखने के पक्षधर लंदनवासी भारतीयों की श्रद्धा चरम पर नज़र आती है. रस्मो-रिवाज़ को पर्म्परागत तरीक़े से निभाने की इच्छा सर्वोपरि दिखाई देती है. परन्तु, इस सबके बावजूद कहीं कोई अप्रिय घटना नहीं घटती. भारी जनसमूह होने के बावजूद, कहीं किसी भी परिसर में कोई आहत नहीं होता. कहीं भी किसी की वजह से अन्य नागरिकों को कोई परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता. गरबा हो या दुर्गा पूजा, भजनों या संगीत की आवाज़ भी, मजाल है जो उस कक्ष या परिसर से बाहर तक आ जाये. कहीं कोई लाउड स्पीकर नहीं लगाये जाते. ईद हो या रोज़े, सुबह चार बजे अजान के नाम पर पूरे शहर को नहीं जगाया जाता. उत्सव मनाने कोई समय सीमा तय नहीं, पटाखे खरीदने बेचने, छुड़ाने पर कोई प्रतिबंध नहीं, परन्तु बाकी नागरिकों के सुकून और व्यवस्था का पूरा खयाल रखा जाता है. इसमें लंदन पुलिस से लेकर आम नागरिक तक सभी अपनी ज़िम्मेदारी निभाते हैं.’ 
                                  ये हिस्सा है हमारी प्यारी दोस्त शिखा वार्ष्णेय की किताब ’ देशी चश्मे से लन्दन डायरी’ का. इस हिस्से को पढ़ते हुए मै हिन्दुस्तान में भी ऐसी ही व्यवस्था की कल्पना करने लगी....! शिखा वार्ष्णेय किसी के लिये भी अन्जाना नाम नहीं है. शिखा से मेरा परिचय ब्लॉग के माध्यम हुआ, इस आभासी दुनिया में, और उसके बाद तो लगातार, साल दर साल उनसे नेह का नाता जुड़ता गया, दोस्ती पक्की होती गयी उधर उनका लेखन भी परवान चढ़ता रहा. पहले ’स्मृतियों में रूस’ ( यात्रा संस्मरण) फिर ’मन के प्रतिबिम्ब, (कविता संग्रह) का प्रकाशन हुआ. इन प्रकाशनों के साथ ही पुरस्कारों का सिलसिला भी शुरु हुआ जो कभी उनकी पत्रकारिता पर कभी पुस्तकों पर तो कभी ब्लॉगिंग पर मिलते रहे. ,देशी चश्मे से लन्दन डायरी’ उनकी हालिया पुस्तक है. पुस्तक में उन आलेखों का संकलन है, जो उन्होंने लन्दन से भारतीय समाचार पत्रों के लिये लिखे थे. ये आलेख सन २०१२ से २०१५ के बीच दैनिक जागरण (राष्ट्रीय)और नवभारत के पाक्षिक और साप्ताहिक स्तम्भों में प्रकाशित होते रहे हैं. इन आलेखों में लन्दन की ऐसी छोटी-छोटी झांकियां देखने को मिलती हैं, जो आमतौर पर किसी बड़े ग्रंथ में नहीं मिलेंगीं.
लन्दन की जीवन शैली को शिखा ने इतने रोचक तरीके से लिखा है, कि पढ़ते हुए पाठक खुद भी लन्दन की गलियों में, उत्सवों में, बसों में हर जगह साथ-साथ चलने लगता  है. लन्दन की चुनाव प्रक्रिया के बारे में शिखा लिखती हैं- ’दीवारें साफ़-सुथरीं, लाउड स्पीकर का कोई शोर नहीं, कोई सेलेब्रिटी प्रचार में नहीं लगा हुआ, सड़कों पर भीड़ नहीं, कहीं कोई मुन्नी बदनाम हुई या  शीला की जवानी पर पैरोडी नहीं सुनाई दे रही.’ तब याद आता है हिन्दुस्तानी चुनाव!! उफ़्फ़!! स्कूल बस के बारे में लिखते हुए शिखा ने कहा- कि स्कूल बस का कोई प्रावधान ही नहीं. हर इलाके के अपने स्कूल होते हैं, और उस स्थान के बच्चों को वहीं पढ़ाने की अनिवार्यता भी. ये स्कूल बच्चों के लिये पैदल-पहुंच के होते हैं. हिन्दुस्तान में तो शहर के एक छोर पर आप रहते हैं और पच्चीस किमी दूर बच्चे का स्कूल होता है. सुबह छह बजे निकला बच्चा, आठ बजे स्कूल पहुंचता है.  
’हॉर्न संस्कृति’ पढ़ते हुए मुझे हिन्दुस्तान का ट्रैफ़िक याद आता रहा. शुरुआत हुई, तो लगा काश! यहां भी लन्दन जैसी व्यवस्था होती, हॉर्न बजाने पर ज़ुर्माने की, लेकिन आलेख खत्म होते होते पाया कि लन्दन में भी अब लोग हॉर्न का पर्याप्त इस्तेमाल कर रहे. तो क्या वहां ज़ुर्माने का प्रावधान समाप्त हो गया?
’देशी चश्मे से लन्दन डायरी, ऐसी ही छोटी छोटी रोज़मर्रा से जुड़ी बातों का खूबसूरत दस्तावेज़ है, जो पाठक को सीधे लन्दन से जोड़ता है. बिना किसी लाग-लपेट के अपनी बेबाक शैली में शिखा ने लन्दन की अच्छाइयों/बुराइयों सब पर बराबर नज़र डाली है. तो अब यदि आप लन्दन के बारे में जानना चाहते हैं तो शिखा वार्ष्णेय की ये पुस्तक अवश्य पढ़ें. मेरा दावा है, आप निराश नहीं होंगे. इन रोचक आलेखों को समेट कर पुस्तक रूप दिया है समय साक्ष्य प्रकाशन-देहरादून ने. किताब की छपाई अच्छी है. बाइंडिंग से थोड़ी शिक़ायत है, क्योंकि पढ़ते हुए, आगे के पेज़, पुस्तक का साथ छोड़ने लगे हैं. शीतल माहेश्वरी द्वारा बनाया गया कवर पृष्ठ आकर्षक है. पुस्तक की कीमत भी बहुत वाज़िब है- मात्र दो सौ रुपये. प्रिंटिंग बढ़िया है. प्रूफ़ की ग़लतियां भी न के बराबर हैं. तो लेखिका, और प्रकाशक को इस बेहतरीन पुस्तक के प्रकाशन हेतु खूब बधाई.
पुस्तक: देशी चश्मे से लन्दन डायरी
लेखिका: शिखा वार्ष्णेय
प्रकाशक: समय साक्ष्य प्रकाशन
15 फ़ालतू लाइन, देहरादून-248001
ISBN :978-93-88165-18-1
मूल्य- 200 रुपये मात्र
               

रविवार, 2 जून 2019

आम जीवन का आइना है-क़र्ज़ा वसूली


आम जीवन का आइना है: क़र्ज़ा वसूली

गिरिजा कुलश्रेष्ठ..... ये नाम मेरे लिये नया नहीं था. उन्हें जानती थी, उनकी लेखनी के ज़रिये. पहचानती थी, उनकी आवाज़ के ज़रिये लेकिन मुलाक़ात नहीं हुई थी. 
तीन साल पहले,अप्रैल के आखिरी दिन थे वे जब हम ग्वालियर गये, एक शादी में. गिरिजा जी का फोन आया कि वे आ रही हैं, मिलने. चिलचिलाती धूप में गिरिजा जी का आना, उनकी सरलता का परिचायक था. वे खुद जितनी सौम्य हैं, उनकी लेखनी भी उतनी ही सहज-सौम्य है. बड़ी-बड़ी बात वे जिस सहजता से कह जाती हैं, चकित होने को मजबूर करती हैं. बोधि प्रकाशन से प्रकाशित हुआ उनका कहानी संग्रह- ’कर्ज़ा-वसूली’ उनकी मजबूत लेखनी और प्रखर सोच का नतीजा है.
’कर्ज़ा-वसूली’ में कुल तेरह कहानियां हैं. सभी कहानियां अलग रंग और अलग माहौल की हैं. पहली कहानी- अपने अपने कारावास’ एक ऐसी लड़की की कहानी है जो संगीत में रुचि रखती है, लेकिन परिस्थितियां उसके इस शौक़ को लगभग समाप्तप्राय कर देती हैं. शादी के बाद मध्यमवर्गीय लड़कियां किस तरह खुद को समेट लेती हैं, बहुत सुन्दर चित्रण इस कहानी में मिलता है. दूसरी कहानी ’साहब के यहां तो....! बिल्कुल अलग ही मिजाज़ की कहानी है. गिरिजा जी ने विद्यालय में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों को कितने नज़दीक से देखा है, ये इस कहानी से साबित होता है. रसीदन जो स्कूल के काम में पिस रही है, इमरती, जो कि शिक्षा मंत्री के बंगले पर काम करती है, जबकि है वो भी स्कूल की ही चपरासी की क़िस्मत से बड़ा रश्क़ करती है. लेकिन जब उसे इमरती के काम की असलियत का पता चलता है तो.... आगे आप खुद ही पढ़ लें इस ज़बर्दस्त कहानी को.
तीसरी कहानी है ’कर्ज़ा-वसूली. इस कहानी को पढ़ते हुए मुझे प्रेम्चंद जी की कहानियों का मज़ा मिला. ये कहानी गांव के एक छोटे किसान रामनाथ और व्यापारी बौहरे जी के इर्द-गिर्द बुनी गयी है. रामनाथ द्वारा कर्ज़ा लेना, और फ़िर उसे न चुकाना, बौहरे जी की बौखलाहट, लेकिन सहृदयता के साथ, जो अन्त तक बनी रही. कहानी बहुत जीवंत सम्वादों में रची-बसी है. ऐसा लगता है जैसे इस कहानी को खुद गिरिजा जी ने जिया है. बहुत शानदार कहानी है ये. चौथी कहानी ’उर्मि नईं तो नहीं है घर में..’ सेवानिवृत मास्टर माणिकलाल की उपेक्षित ज़िन्दगी को बखूबी उभारती है. शपथपत्र कहानी एक कर्मचारी की व्यथा को दिखाती सशक्त रचना है. किस प्रकार उसे अपने ही जीपीएफ़ के पैसों के लिये भटकना पड़ता है. किसोरीलाल की व्यथा उन तमाम कर्मचारियों की व्यथा है जो बाबुओं के चंगुल में फंस चुके हैं. एक मां और बेटे की बहुत जीवंत कहानी है ’पहली रचना’. इस कहानी को पढ़ते हुए सालों पहले का मुझे वो समाचार याद आया, जिसमें एक बच्चा ग़लती से स्कूल की कक्षा में बन्द हो गया, जबकि अगले दिन से ही लम्बी छुट्टियां होने वाली थीं. जब कमरा खोला गया तो बच्चा मर चुका था, और उसने पूरे फ़र्श पर, दीवारों पर चौक से लिखा था, मम्मी मुझे भूख लगी है, मम्मी मुझे प्यास लगी है....! हृदय विदारक थी ये घटना, उसी तरह हृदय विदारक है ये कहानी भी. ’उसके लायक़’ कहानी, सरिता नाम की एक ऐसी लड़की की कथा है, जो ठेठ ग्रामीण इलाके से उठ कर शहर के स्कूल में पढ़ने आई, जहां सब उसका मज़ाक उड़ाते थे. एक दिन ऐसा भी आया जब सबको धता बताती यही लड़की प्रोफ़ेसर हो गयी, जबकि बाकी बड़े घर के बच्चे अभी तक रोज़गार की तलाश में ही थे.
संग्रह में ’एक मौत का विश्लेषण’, ’नामुराद’, ब्लंडर मिस्टेक’, ’व्यर्थ ही’, पियक्कड़’, सामने वाला दरवाज़ा जैसी अन्य बेहतरीन कहानियां भी हैं, जिन्हें आप पढ़ेंगे तो हर बार चकित होंगे. बहुत व्यापक दृष्टिकोण है गिरिजा जी का, और बेहद सूक्ष्म अवलोकन भी. सभी कहानियां अपने आस-पास घटती सी लगती हैं. पाठक कहानी के साथ पूरी तरह जुड़ जाता है. इतने बेहतरीन लेखन के लिये गिरिजा जी को बधाई और शुभकामनाएं कि वे लगातार लिखती रहें और हम उनके अनेक संग्रह पढते रहें.
ये संग्रह बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित हुआ है. छपाई बेहतरीन है. सबसे बड़ी बात, अशुद्धियां नहीं हैं, पूरे संग्रह में, जो कि प्रिंटिंग की एक सबसे बड़ी समस्या होती है. कवर पृष्ठ शानदार है. पुस्तक का मूल्य १७५ रुपये है. इस संग्रह को आप ज़रूर पढ़ें. एक बार फ़िर लेखिका, प्रकाशक को बधाई.
पुस्तक: कर्ज़ा वसूली
लेखिका: गिरिजा कुलश्रेष्ठ
प्रकाशक: बोधि प्रकाशन, जयपुर
ISBN: 978-93-87078-96-3
मूल्य: १७५ रुपये मात्र


मंगलवार, 5 जून 2018

केरल यात्रा: खट्टी-मीठी यादें


कोच्चि जाने की चार महीने पुरानी प्लानिंग पर उस समय पानी फिरता नज़र आया, जब हमारी ट्रेन लेट पर लेट होती गयी। लगा, कहीं कैंसिल ही न हो जाये! ख़ैर! राम-राम करते, सुबह चार बजे आने वाली ट्रेन शाम साढ़े चार बजे आई। बोगी में घुसे तो शाम को ही रात जैसा नज़ारा दिखाई दिया। हर तरफ़ सफ़ेद चादरें तनी हुईं। हमारी लोअर बर्थ पर एक बहन जी सो रहीं थीं। उन्हें जगाया तो वे अपनी मिडिल बर्थ खोल के फिर सो गयीं। ट्रेन में ऐसा भीषण सन्नाटा मैंने पहली बार देखा। अब चूंकि सब सो रहे थे तो हम अकेले गर्दन टेढ़ी करे, कब तक बैठे रहते? हम भी लेट गए। 6 बजे के आस पास कुछ हलचल हुई। दूसरी बोगी से कुछ लोग आए, और सामने, बगल, ऊपर की बर्थ वालों को जगा के बतियाने लगे। बातचीत तेलुगू में हो रही थी, सो हम उनके मुंह ताकने के सिवाय और कर भी क्या सकते थे? ये ज़रूर समझ में आया कि कोई बड़ा परिवार है जो सफ़र कर रहा। 
रात आठ बजे हमारे सिर के ऊपर तनी मिडिल बर्थ से बहन जी नीचे उतरीं। बर्थ अब भी तनी थी क्योंकि उस पर उन्होंने अपनी गृहस्थी सजा ली थी। यानी अब तीन दिन तक हमें गर्दन टेढ़ी कर, इसी छतरी की छत्रछाया में रहना था। सामने की बर्थ पर एक। भीमकाय महिला लगातार खर्राटे लेकर सो रही थीं। इतनी नींद!! हम चकित थे। ख़ैर! हमारे ऊपर वाली बहिन जी भी भारी शरीर की थीं, लेकिन थीं खूबसूरत। उतना ही सरल उनका व्यवहार भी था। ट्रेन पटना से आ रही थी तो हमें लगा ये सब हिंदी तो जानते ही होंगे। लेकिन जब हमने उनके बारे में जानना चाहा तो समझ में आया कि वे तो हिंदी का एक भी शब्द नहीं समझ पा रहे!! अंग्रेज़ी भी टूटी-फूटी। इसी टूटे-फूटेपन में ही उन्होंने बताया-"ऑल एल आई सी फ़ैमिली। 90 मेम्बर्स। विज़िट काशी, बोधगया, पटना। नेल्लोर गोइंग।" 
उनके यहां दफ़्तरी काम भी तेलुगू में ही होता है। तीन-चार बच्चे थे जो अंग्रेज़ी पढ़ते थे स्कूल में लेकिन सेकेंडरी लैंग्वेज़, सो फिर भी ठीक ठाक बात कर पा रहे थे। हमेशा सफ़र में मैं सहयात्री की बातों से बचने के लिए अपना सिर जबरन क़िताब में घुसाए रहती हूँ, इधर तरस रही थी कि कोई तो बात कर ले!! 48 घण्टों का सफ़र और ये नेल्लोरी!! या अल्लाह!! कहाँ फँस गई!! मेरी दुविधा वे भी समझ रहे थे, या शायद मेरे चेहरे से ज़ाहिर हुआ होगा, सो मुझसे इशारों में ही बात करने की कोशिश करते। गूंगे लोगों की पीड़ा समझ में आई!! 😑 कुछ भी खाने को निकालते तो मुझे पहले पूछते। दस तारीख़ की रात ग्यारह बजे नेल्लोर आने वाला था। इस रात उन्होंने ज़िद करके अपने साथ मुझे नेल्लोरी भोजन कराया। 
इन दो दिनों में लगा, कि यदि आप भाव समझ लेते हैं तो भाषा माने नहीं रखती। मेरे दोनों दिन इन सारे परिवारों और ख़ास तौर से मेरी छत्रछाया वाली बर्थ की मालकिन जिनका नाम भारती था, के स्नेह को मैं भूल नहीं पाउंगी। नेल्लोर आने पर सब उतरने लगे। मैंने भी भारती के दो बैग उठा लिए, उतरवाने के लिहाज से। सब जब उतर गए, तो हर व्यक्ति मुझसे मिलने की होड़ में था। बच्चे लिपट गए और भारती!! भारती ने तो हाथ ही नहीं छोड़ा। जब तक ट्रेन चल न पड़ी, पूरे 90 लोग हाथ हिलाते खड़े रहे। विदा प्यारे दोस्तो...कभी न कभी फिर मिलेंगे। 
नेल्लोरी साथियों के उतरते ही पूरी बोगी ख़ाली हो गयी। उधर पहले क्यूबिक में चार-पांच लोग और इधर आख़िरी क्यूबिक में छह-सात लोग! मेरी बर्थ का नम्बर 35 था, यानी बीच मंझधार का नम्बर 😊 बाएं-दाएं दोनों तरफ़ ख़ाली बर्थ मुंह चिढ़ा रही थीं। अब तक जो बोगी तरह-तरह के तेलुगू स्वरों से भरी थी, अचानक शांत हो गयी। उन सबका जाना मुझे पता नहीं क्यों इतना उदास कर रहा था। उन सबके हिलते हाथ देख के तो मुझे रोना आ रहा था 😞 
नेल्लोर प्लेटफॉर्म और मेरे साथी जैसे ही दिखना बन्द हुए, मैं अपनी बर्थ पर आ गयी। अब आज़ाद थी। मिडिल बर्थ गिरा के बैठूँ, चाहे पचासों बर्थ पर उछल-कूद मचाऊँ। कोई नहीं था रोकने वाला। लेकिन मैंने मिडिल बर्थ नीचे नहीं गिराई। पता नहीं क्यों लग रहा था जैसे भारती लेटी है अभी। खिड़की के शीशे से सिर टिकाये जबरन बाहर देखती मैं अब निपट अकेली थी। तभी बुरका ओढ़े एक महिला , आगे वाले क्यूबिक से उठ के मेरे सामने वाली बर्थ पर आ गईं। उनके साथ उनका 15-16 साल का बेटा और 12 साल की बेटी थी। बिटिया भी हिज़ाब लगाए थी। आते ही शुरू हो गईं-" हाय-हाय..कैसा मुश्क़िल सफर बीता होगा बाजी आपका? मैं तो उधर बैठी आपकी ही फ़िकर कर रही थी। अकेली फंस गयीं थीं आप । मैं मुस्कुरा दी उनकी फ़िकर पर। उन नेल्लोरियों के विरुद्ध बोलने का मेरा कतई मन नहीं था। लेकिन उनकी फ़िकर देख के मुझे लगा, कौन कहता है इंसानियत ख़त्म हो गयी? आगे वाले क्यूबिक में वे साइड लोअर बर्थ पर बैठीं थीं, बेटी सहित, सो जितनी बार भी वहां से निकलना हुआ, उतनी ही बार हमारी मुस्कुराहटों का आदान प्रदान हुआ था और ये मुस्कुराहटें ही अब अजनबियत ख़त्म कर चुकी थीं। 
"जानती हैं बाजी, मेरे दो टिकट वेटिंग में ही हैं अब तक। तीन में से केवल एक कन्फ़र्म हुआ। और अल्लाह की मर्ज़ी देखिए, कि अब बर्थ ही बर्थ। मैंने सोचा आप अकेली हैं, तो यहीं आ जाये जाए ।" मैं फिर मुस्कुरा दी। बोली -"आपने बहुत अच्छा किया जो यहां आ गईं।" ये अलग बात है कि अकेलापन कभी मुझे डराता नहीं। डराती तो भीड़ भी नहीं है 😊 लोगों से बहुत पूछताछ की आदत नहीं है मेरी। फिर भी उनकी इतनी बातचीत में कुछ तो दिलचस्पी दिखानी थी न सो मैंने पूछा- "आप केरल जा रहीं? कहाँ से आ रहीं?" इतना पूछना था कि वे धाराप्रवाह शुरू हो गईं-" अरे बाजी कुछ न पूछिये। हम तीनों पटना से आ रहे हैं। ये मुआ हनीफ़, ऐसा मनमर्ज़ी का लड़का है कि क्या कहें! ट्रेन का अता-पता लगाएं बिना ले आया हमें स्टेशन। सोचिये, शाम चार बजे चलने वाली गाड़ी स्टेशन पर ही रात 10 बजे आई। फ़ातिमा के अब्बू तो बोले कि वापस आ जाओ, पर फिर हमने सोचा किसी प्रकार इस छोरी के एडमिशन का जुगाड़ जमा है, लौट गए तो क्या पता इसके अब्बू का फिर मन बदल जाये? हम लोग तिरुपति जा रहे हैं। वहां बहुत बड़ा स्कूल है हाफिज़ी की पढ़ाई का। अभी छटवीं तक इंग्लिश मीडियम में पढ़ी है पूरे सब्जेक्ट। अब यदि टेस्ट पास कर गयी तो यहीं रहेगी, हॉस्टल में। 
स्कूल का नाम उन्हें याद नहीं था और मुझे जानने की बहुत उत्सुकता भी नहीं थी। मैं तो खुश थी, कि हिज़ाब में लिपटी इस बच्ची को पढ़ाने, इतनी दूर भेज रहे इसके मां-बाप। ये अलग बात है कि हाफिज़ी की पढ़ाई का ताल्लुक़ शायद उस धार्मिक पढ़ाई से है जिसके बाद सम्भवतः वो बच्ची मदरसे में नौकरी करे। अभी फ़ातिमा की अम्मी कुछ और बतातीं, उसके पहले ही उनके बेटे का फोन घनघनाया। फोन पर ज़रा तल्ख़ बातचीत हो रही थी। फोन रखते ही बेटा बोला-"अम्मी, ठहरने का कोई इंतजाम नहीं हो पाया वहां।" अम्मी बदहवास सी कभी मुझे और कभी बेटे को देख रही थीं। बोलीं- बाजी, तिरुपति तो आने ही वाला है। वहां से हमें तुरत ही लौटने की ट्रेन मिल जाएगी क्या? अब जब अजनबी शहर में रहने का ही ठिकाना नहीं तो हम इस बच्ची को ले के कहाँ जाएंगे? पता नहीं कैसे लोग होते होंगे! इन सबकी बोली सुन के तो लगता है न कोई हमें समझेगा, न हम किसी को समझ पाएंगे। इसकी परीक्षा तो 13 मई को है और आज तो 10 तारीख ही है! या ख़ुदा! कैसा इम्तिहान है ये? बाजी अपने मोबाइल में देख के बताइये न हम लौट जाएंगे। पटना होता तो कोई डर नहीं था लेकिन यहां...!!"
उनका बोलना जारी था तब तक बेटे से मैंने पूछा कि माज़रा क्या है? उसने बताया कि जिन्होंने स्कूल हॉस्टल में ही हम लोगों को चार दिन रुकवाने का वादा किया था, वे खुद तिरुपति से बाहर हैं। उन्होंने कहा है कि फिलहाल किसी होटल में रुक जाए। 
अब मैंने फ़ातिमा की अम्मी को समझाना शुरू किया कि जब चार दिन का सफर करके अपनी मंज़िल तक पहुंची हैं तो अब वापसी की बात न करें। बच्ची को टेस्ट ज़रूर दिलवाएं। और फिलहाल वे 12 घण्टों के लिए रेलवे के रिटायरिंग रूम में रुक जाएं। दिन भर उनके पास होगा, तब वे स्कूल प्रबंधन से बात कर होस्टल में रुकने का इंतज़ाम करवा लें। बात उनकी समझ में आ गयी। मैंने तुरन्त नेट पर सर्च किया तो रात बारह बजे तक बुकिंग की जा सकती थी यदि रूम खाली है तो। 
अब फ़ातिमा की अम्मी फिर रुआंसी हो आयीं-" बाजी, आप तो इतनी अच्छी मददगार मिलीं हमें लेकिन ऑनलाइन बुकिंग के लिये हमारे पास कार्ड नहीं है 😞"
मेरे पास वेस्ट करने के लिए टाइम नहीं था, क्योंकि पौने बारह बज चुके थे, सो उनका फॉर्म भरते हुए ही मैंने कहा-मैं अपने कार्ड से जमा कर दूंगी, आप हमें नक़द दे देना। आनन फानन उनकी 24 घण्टे की बुकिंग कराई कुल 950 रुपये में। जो इन्हें हॉस्टल में रुकवाने की बात कह के मुकर गयीं थीं उन्हें भी फोन लगा के फटकारा कि वे वादाख़िलाफ़ी न करें, और हर हालत में कल इनके रुकने का इंतज़ाम हॉस्टल में करके मुझे सूचित करें। फ़ातिमा की अम्मी का चेहरा देख के मुझे लग रहा था कि मैं इनके ही साथ उतर जाऊं। ख़ैर... इंतज़ाम हो गया।
इस पूरी व्यवस्था में जुटी मैं,अब तक फ़ातिमा की ओर देख ही नहीं पाई थी। अब उसकी तरफ़ देखा, तो उसे एकटक अपनी तरफ़ देखते पाया, बेहद कृतज्ञ निगाहों से, जो प्यार से भरी थीं। मैंने उसकी तरफ 👍 का इशारा किया तो वो खिलखिला दी। बेहद निश्छल हंसी। फ़ातिमा की अम्मी ने अब बुरका उतार दिया था और इत्मीनान से कंघी कर रही थीं। शीशे में देखते हुए ही बुदबुदा रहीं थीं-"कौन कहता है दुनिया में अच्छे लोग नहीं हैं....हर धर्म में अच्छे बुरे लोग हैं...जिससे बुरा टकराया, उसने पूरी कौम को ही बुरा कह दिया, वो हिन्दू हो चाहे मुसलमां...! 
और मेरे दिमाग़ में उनका वही वाक्य घूम रहा था-' पटना होता तो कोई डर की बात न थी...!" अपना शहर सबको कितना निरापद लगता है। 
अगला स्टॉपेज तिरुपति ही था।

सोमवार, 28 मई 2018

कुछ दिन तो गुज़ारिये पर्यटन में.....!


मनुष्य स्वभाव से ही घुमक्कड है. आदिमानव भोजन और अपने शिकार की खोज में एक जगह से दूसरी जगह घूमता था. लेकिन इस घूमने ने उसका ऐसा मन मोहा, कि खेती करने की समझ आने के बाद भी उसे एक जगह ठिकाना बना के रहना रास न आया. घूमता ही रहा, इस जंगल से उस जंगल. पुराने राजे-महाराजे देखिये. राज-काज से समय निकाल के महीने-महीने भर को शिकार पर चले जाते थे. ये शिकार क्या था? शुद्ध घुमक्कड़ी ही न? साधु संत निकल जाते थे देशाटन पर. एक गांव से दूसरे गांव, एक पर्वत से दूसरे पर्वत. ये भी घुमक्कड़ी का ही एक रूप है. बुज़ुर्गवार तीर्थाटन पर जाते रहे हैं पुराने समय से. ये तीर्थाटन भी वृद्धावस्था की घुमक्कड़ी ही है. तो समय और देशकाल के अनुसार नाम चाहे जो ले लें हम, है ये विशुद्ध घुमक्कड़ी. घुमक्कड़ी यानी परिष्कृत भाषा में पर्यटन.
पर्यटन के प्रति आकर्षण , मनुष्य का एक ऐसा गुण है जिसे जन्मजात कहा जा सकता है. तमाम अन्य गुणों की तरह ये गुण भी अलग-अलग लोगों में कम या ज़्यादा हो सकता है. लेकिन होता सब में है. पर्यटन असल में केवल घुमक्कड़ी नहीं है. असल में पर्यटन भी भिन्न-भिन्न उद्देश्यों के चलते किया जाता है. कोई पढ़ाई-लिखाई के चक्कर में किसी दूसरे शहर या दूसरे देश जाता है, तो कोई काम के सिलसिले में तो कोई केवल घूमने के उद्देश्य से ही जाता है. लेकिन इन सभी परिस्थियों में नई जगह को जानने, वहां की खास और महत्वपूर्ण जगहों को देखने की इच्छा कोई रोक सकता है क्या? यही इच्छा अपने काम के साथ-साथ उसे पर्यटन का सुख दे जाता है.
जब हम किसी नई जगह पर घूमने जाते हैं, तो ये केवल घूमना नहीं होता, बल्कि उस शहर या देश की संस्कृति को आत्मसात करने का वक्त होता है. वहां की संस्कृति से साक्षात्कार ही हमें रोमांच से भर देता है. किसी दूसरे देश की संस्कृति तो स्वाभाविक तौर पर अलग और नई होती है, लेकिन ये नयापन हमारे देश में भी कम नहीं. जितने प्रांत, उतनी ही भिन्न संस्कृति, आचार-व्यवहार, खान-पान, वेशभूषा, सोने जागने के तरीके, सब भिन्न. हर दो सौ किलोमीटर पर बदली हुई संस्कृति दिखाई देती है. केवल मध्यप्रदेश को ही लें. बुंदेलखंड, बघेलखंड, मालवा, चम्बल इन चारों हिस्सों की संस्कृति में भिन्नता है. कुछ त्यौहार जो बुन्देलखंड में मनाये जाते हैं, वे बाकी तीन में नहीं, तो कुछ रिवाज़ जो मालवा में हैं, बाकी जगहों पर नहीं. ये सब हम कैसे जानेंगे? केवल पढ़ के ये सब नहीं जाना जा सकता. इस भिन्नता के दर्शन तब होंगे, जब हम इन जगहों पर घूमने निकलेंगे. किसी जगह को पढ़ के जानने, और घूम के जानने में उतना ही फ़र्क है, जितना खाना बनाने और व्यंजन विधियों को पढ़ने में है.
हिन्दुस्तान तो वैसे भी भिन्न संस्कृतियों, भिन्न भाषाओं का देश है. कभी-कभी अचरज होता है, कि एक ही भूभाग पर कैसे इतनी भिन्नताएं एक साथ हैं? बहुत से लोग हैं, जो देश के ही तमाम प्रांतों को जानने-समझने के लिये छुट्टियों में केवल घूमने का ही प्रोग्राम बनाते हैं, और निकल पड़ते हैं. घूमने के ऐसी प्रेमियों को बहुत ज्ञान होता है. भाषाई ज्ञान के साथ-साथ इन्हें भौगोलिक और सांस्कृतिक ज्ञान भी खूब होता है. तो पर्यटन केवल घूमने का नहीं बल्कि ज्ञानार्जन का भी ज़रिया है.
पर्यटन हमारे लिये घूमने का, तो देश के लिये राजस्व का बेहतरीन ज़रिया है. पुरानी इमारतों, विशेष स्थानों को सुरक्षित रखने, संरक्षित करने, या उसके आस-पास मनोरम स्थल विकसित होने का कारण भी एकमात्र मानव पर्यटन है. लोगों की आवाजाही को देखते हुए, उस स्थान विशेष को विकसित किया जाता है. तो पर्यटन के चलते हमारा इतिहास भी सुरक्षा पा जाता है.
सन 1966 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 1967 को अन्तर्राष्ट्रीय पर्यटन वर्ष घोषित किया था. इसी वर्ष अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पाया गया कि विकासशील देशों में भारत एकमात्र देश है, जहां पर्यटन की बहुत अधिक सम्भावना है. यहां के ऐतिहासिक स्थलों को विकसित किया जाये, तो ये पर्यटन स्थल बन सकते हैं. वैसे भी विदेशी पर्यटकों के लिये भारत में आअकर्षण के लिये बहुत कुछ है. यहां की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक इमारतें ही इतनी हैं, कि एक विदेशी पर्यटक, जब साल भर का वीज़ा ले के हिन्दुस्तान आता है, तब यहां के सारे ऐतिहासिक स्थल देख पाता है. त्यौहारों के इस देश में मेलों की भी अद्भुत परम्परा रही है. और विदेशी, हमारे इन हिन्दुस्तानी मेलों के दीवाने हैं,. मौसम और त्यौहार विशेष पर लगने वाले कुछ प्रमुख मेलों में जैसे कुम्भ, माघ, या बिहार का पशु मेले में उनके आयोजित होने के समय पर अतिरिक्त पर्यटक जुटते हैं. भारतीय संस्कृति की भिन्नता ही उन्हें इस देश के पर्यटन के लिये उकसाती है. बनारस की अपनी अलग शान है. यहां के घाट, यहां की परम्पराएं और यहां का मोक्षगान, विदेशियों को यहीं बस जाने के लिये प्रेरित करता है.
भारत सरकार ने भी पर्यटन को बढ़ावा देने के लिये बहुत सी योजनाएं बनाई हैं, सरकार द्वारा हमेशा नई-नई योजनाएं बनाई जाती रहती हैं, क्योंकि हमारा घूमना, देश के राजस्व को बढ़ाता है, जो भविष्य में हमारे ही काम आता है. तो देर किस बात की कुछ दिन तो गुज़ारिये पर्यटन में....!  
( नई दुनिया में प्रकाशित आलेख)

बुधवार, 23 मई 2018


हथेली से बादल को छूने के अरमां...!


क्या हार में, क्या जीत में,
किंचित नहीं भयभीत मैं,
संघर्ष पथ पर जो मिले,
यह भी सही, वह भी सही
रसोई में जगह थोड़ी कम है चाची. दो फुट लम्बाई और होती, तब सही होता. चाय के प्यालों को सिंक के दूसरी ओर सरकाती, प्रेमाबाई ने ज़रा खिन्न अवाज़ में कहा. प्रेमाबाई की बात मन स्वीकार करने ही वाला था कि परात में आटा निकालतीं पाठक चाची का स्वर मेरे कानों में पड़ा-
अरे! कहां कम है? खूब जगह है. तुम्हारा काम रुक रहा क्या? हमारा काम रुक रहा? सारे काम हो रहे न? घर में पंद्रह लोग हैं अभी और इसी रसोई से सबका खाना बन पा रहा न? फिर काहे की कमी? कुछ कम नहीं है. खूब है. जगह ही जगह है...
प्रेमाबाई की बात से अचानक ही बोझिल हुआ मन, खट से खिल गया. लगा एक नितांत अनपढ़ महिला की सोच कितनी सकारात्मक है! कितनी खूबसूरती से उसने उस छोटी सी जगह को बड़ा बना दिया! ज़ाहिर है- दोष उस जगह के छोटे होने में नहीं, बल्कि हमारी सोच में है. किसी भी चीज़ को छोटा या बड़ा हमारा नज़रिया बनाता है. असल में हमने असंतोष को अपना स्थायी भाव बना लिया है. अपने काम से असंतुष्ट, भोजन से असंतुष्ट, पहनावे से असंतुष्ट और सबसे ज़्यादा दूसरों के रवैये से असंतुष्ट. फ़लाने ने ऐसा कहा- क्यों कहा होगा? ज़रूर तंज किया होगा... वो शायद हमारी सफलता से चिढ़ता है. उसे हमारे रहन-सहन से ईर्ष्या है...आदि-आदि. ऐसी बातें सोचते हुए हम खुद कितनी नकारात्मकता से भर जाते हैं, कभी सोचा है? दूसरे ने भले ही सहज भाव से कुछ कहा हो, लेकिन उस बात के दूसरे-तीसरे मतलब निकालने की आदत सी होती जा रही हमारी. न केवल मतलब निकालने की, बल्कि नकारात्मक मतलब निकालना शगल सा हो गया है. कार्यस्थल पर यदि दो लोग आपस में बात कर रहे हों, वो भी धीमी आवाज़ में, तो पहला व्यक्ति यही सोचता है कि ज़रूर ये दोनों उसकी बुराई कर रहे होंगे. यानी उसने खुद को ही बुराई करने के लायक़ समझ लिया! कभी ये भी किसी ने सोचा, कि अगले व्यक्ति उसकी तारीफ़ कर रहे होंगे? बुराई करने की बात सोच के उसने अपने दिमाग़ को उथल-पुथल के हवाले कर दिया. यदि वहीं तारीफ़ की बात सोची होती तो कितना सुकून होता उस दिमाग़ में! आम ज़िन्दगी में भी हमने अपने ही लोगों के प्रति ऐसी सोच बना ली है कि हर व्यक्ति खुद के ख़िलाफ़ नज़र आने लगा है.
आम ज़िन्दगी से असंतुष्ट व्यक्ति हर बात से असंतुष्ट होता है. उसे जितना मिला, उससे संतुष्ट होने की जगह उसे हमेशा शिक़ायत बनी रहती है कि कम मिला. या उसका भाग्य ही खराब है. जबकि ग़ौर तो उसे अपनी कोशिशों पर करना चाहिये था. अकर्मण्य व्यक्ति कोशिश की जगह भाग्य को दोषी मानने लगते हैं. जबकि भाग्य का निर्माण तो हमारा कर्म करता है. ऐसे व्यक्ति अपने घर में भी गज़ब नकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं. नतीजतन, पत्नी, बच्चे सब सहमे-सहमे से रहते हैं. उन्हें भी अपना भाग्य ही खराब लगने लगता है. वहीं चंद लोग ऐसे भी हैं, जो अपनी कमज़ोर आर्थिक स्थिति के बाद भी खुश-संतुष्ट दिखाई देते हैं. जैसे हमारी पाठक चाची. कहने को वे हमारे घर में खाना बनाती हैं, लेकिन मन से वे बहुत धनी हैं. सुविचारों की एक ऐसी पोटली उनके पास है, जो उन्हें और उनसे जुड़े लोगों को निराश नहीं होने देती. ज़िन्दगी में आई हर मुश्क़िल का सकारात्मक पहलू उनके पास मौजूद है. इस बढ़ती उमर में भी काम करना उनके लिये अफ़सोस का नहीं बल्कि स्वाबलम्बन का वायस है.
जैसा खायें अन्न, वैसा होबे मन की तर्ज़ पर ही हम जैसा सोचते हैं, वैसा ही हमारा व्यक्तित्व भी बन जाता है. मेरी एक परिचिता हैं, उनके पास शिक़ायतों का अम्बार है. ससुराल से शिक़ायत, मायके से शिक़ायत, पड़ोस से शिक़ायत, अपने काम से शिक़ायत.... कई बार लगता है इतनी शिक़ायतों के बीच कैसे कट रही इनकी ज़िन्दगी? उनकी शिक़ायतों का आलम ये, कि उनके बच्चे भी अपने विद्यालय, शिक्षकों और सहपाठियों की शिक़ायत करते दिखाई देने लगे हैं. इन कम उम्र बच्चों ने खूबियों की जगह कमियां खोजना सीख लिया है. हमारी ये आदतें बचपन को नकारात्मकता से भर रही हैं, इस ओर ध्यान देना बेहद ज़रूरी है. ज़रूरी है कि हम बच्चों को आधे खाली गिलास की जगह भरे गिलास का महत्व समझायें. खुश होना या दुखी होना हमारे हाथ में है. किसी एक बात पर ही हम खुश हो सकते हैं, और दुखी भी, फ़र्क़ केवल हमारे नज़रिये का होगा.
सकारात्मकता का गुण यदि सीखना है, तो एक नज़र प्रकृति पर डालनी होगी. पेड़-पौधों के बीच पहुंचते ही दिल-दिमाग़ कितने सुकून से भर जाता है न? क्यों? क्योंकि प्रकृति में कोई नकारात्मक गुण नहीं है. पेड़ों ने, पौधों ने नि:स्वार्थ भाव से केवल देना सीखा है. लेने की लालसा तो केवल इंसानी है. जहां केवल देने का भाव हो, वहां कैसी नकारात्मकता? चारों ओर सकारात्मक घेरा होता है. यही हमें सुकून देता है. लेकिन हमने कभी पौढों से कुछ सीखने की कोशिश की ही नहीं. ग्रीष्म से तपी, सूखी धरती पर पहली बारिश की बौछार पड़ते ही नन्हे-नन्हे पौधे अपनी बाहें फैला के खड़े हो जाते हैं रातोंरात. उन्हें कुचले जाने का खौफ़ नहीं होता. हम जैसा दूसरों को देते हैं, हमें ठीक वैसा ही वापस मिल जाता है. धरती में भी अगर हम अच्छा बीज बोयेंगे तो हमें एक स्वस्थ पौधा प्राप्त होगा. खराब बीज अव्वल तो पनपेगा ही नहीं, और यदि पनप भी गया तो स्वस्थ पौधे की उम्मीद, उस बीज से नहीं होनी चाहिये. बच्चे भी बीज की तरह हैं. हम उनके दिमाग़ में जैसी खुराक डालेंगे, वे वैसे ही तैयार होंगे. बचपन से ही यदि हम उन्हें प्रेम और सद्भाव के साथ-साथ संतोष का पाठ पढ़ायें, तो युवावस्था में वे इसका उलट करेंगे, ऐसी उम्मीद न के बराबर है.
हमारे हौसलों का रेग-ए-सहरा पर असर देखो,
अगर ठोकर लगा दें हम तो चश्मे फूट जाते हैं
इस्मत ज़ैदी ’शिफ़ा’ का ये शेर मुझे कई बार याद आता है. खासतौर से हौसलापरस्त युवाओं को देखकर.
पिछले दिनों मेरा एक विद्यार्थी किसी प्रतियोगी परीक्षा में शामिल हुआ. लौट के उसने हंसते हुए बताया कि- मैं कुल पचास प्रश्नों के ही उत्तर दे सका. गणित के लगभग सभी सवाल ग़लत हो गये. लेकिन मुझे इससे बड़ी सीख मिली, कि जिस गणित से मैं बचता रहा, उससे पीछा छुड़ाना इतना आसान नहीं है. मुझे उससे भागना नहीं है. अब मैं पहले मन लगा के गणित की ही तैयारी करूंगा मैं खुश थी. एक बच्चे ने अपनी कमज़ोरी को पहचाना. एक असफलता ने उसे नैराश्य से नहीं भरा, बल्कि अपनी कमी को दूर करने के लिये प्रेरित किया. यदि यही सकारात्मक रवैया अपनाया जाये, तो वो दिन दूर नहीं, जब सफलता आपके कदम चूमेगी. ज़िन्दगी है तो सुख-दुख, सफलता-असफलता का सिलसिला भी अवश्यम्भावी है. अपने तमाम दुखों के हल खोजना ज़्यादा बेहतर है, बजाय उस दुख को पालने-पोसने के. हमारी असफलताएं भी हमें अपने आपको जांचने का मौक़ा देतीं हैं, बशर्ते की हम परिस्थितियों को दोषी न मानने लगें. नकारात्मकता के इस जंगल में हमें आशा कि किरण को बचाना ही होगा. मन में आसमान छूने का हौसला रखना ही होगा भले ही हम इस कोशिश में कई बार गिरें क्यों न. चिड़ियों को घोंसला बनाते देखा है न? कितनी बार उनके तिनके गिरते हैं. कई बार तो पूरा घोंसला ही उजाड़ दिया जाता है, लेकिन वे तब भी अपनी कोशिशें नहीं छोड़तीं. नतीजतन, घोंसला तैयार हो ही जाता है. लेकिन इंसानी फ़ितरत में निराशा बहुतायत है. और ये खुद की कोशिश से, अपनी सोच बदलने से ही आशा में तब्दील हो सकेगी.
एक कहानी मुझे याद आती है हमेशा- एक व्यक्ति ऑटो से रेल्वे स्टेशन जा रहा था. ऑटो की रफ़्तार सामान्य थी. एक कार अचानक पार्किंग से निकल कर रोड पर आ गयी. ऑटो ड्राइवर ने ब्रेक लगाया और कार ऑटो से टकराते-टकराते बची. कार चला रहे व्यक्ति ने गुस्से में ऑटो वाले को खूब बुरा भला कहा. गालियां तक दीं, जबकि ग़लती उसी की थी. ऑटो चालक बिना कोई बहस किये, क्षमा मांग के आगे चल दिया. ऑटो में बैठे व्यक्ति ने कहा- तुमने उसे ऐसे ही क्यों जाने दिया? कितना बुरा भला कहा उसने जबकि तुम्हारी ग़लती थी ही नहीं. ऑटो वाले ने सहजता से कहा- साहब, कुछ लोग कचरे से भरे ट्रक के समान होते हैं. ये तमाम कचरा अपने दिमाग़ में भर के चलते हैं. जिन चीज़ों की जीवन में कोई जरूरत नहीं होती, उसे भी मेहनत करके जोड़ते रहते हैं जैसे क्रोध, चिंता, निराशा, घृणा. जब उनके दिमाग़ में कचरा जरूरत से ज़्यादा हो जाता है तो वे उस बोझ को हल्का करने के लिये इसे दूसरों पर फेंकने का मौक़ा खोजते हैं. इसलिये मैं ऐसे लोगों को दूर से ही मुस्कुरा के विदा कर देता हूं. अगर मैने उनका गिराया कचरा स्वीकार कर लिया तो फिर मैं भी तो कचरे का ट्रक ही बन जाउंगा न? ऐसे लोगों के कारण मैं क्यों तनाव पालूं? कितनी सच्ची बात है ये! कोई भी झगड़ा बढ़ाने से ही बढ़ता है वरना एक अकेला व्यक्ति कब तक बकझक करेगा?
लोग भूल जाते हैं, कि ये ज़िन्दगी उन्हें एक बार ही मिली है, और वे इसे नरक बना रहे हैं. ज़िन्दगी बहुत खूबसूरत है. हम इसे अपनी सोच, और व्यवहार से और भी खूबसूरत बना सकते हैं. खाली पड़े मैदान में केवल घास-फूस पैदा होती है जो किसी काम की नहीं होती, जबकि खेतों में फसल के रूप में ज़िन्दगी लहलहा रही होती है. उसी तरह हमें भी अपने दिमाग़ को खाली मैदान नहीं बनाना है, यहां बोना है सकारात्मक विचारों की फसल, जो आने वाली पीढ़ियों को भी जीवनदान दे सके.
(31 दिसम्बर 2017 को अहा ज़िन्दगी पटना ( दैनिक भास्कर) में प्रकाशित आवरण कथा )
तस्वीर: गूगल सर्च से साभार

रविवार, 6 मई 2018

ग़ायब हो गये हैं ठहाके.....!


सुबह का समय. मॉर्निंग वॉक से लौटते हुए, रास्ते में ही नया बना जॉगिंग पार्क मिलता है. जब लौटती हूं, तब सामूहिक हंसी सुनायी देती हैं. हा हा हा....हा हा हा....!!! पिछले दिनों इलाहाबाद गयी थी. प्रात: भ्रमण की शौकीन मैं, कम्पनी बाग़ चली गयी. सुबह पांच बजे से यहां लगभग आधा इलाहाबाद, मॉर्निंग वॉक के इरादे से चला आता है. जिससे कई दिनों से मिलना न हुआ हो, वो भी कम्पनी बाग में मिल ही जायेगा. ढाई सौ एकड़ में फ़ैले इस कम्पनी बाग में तो कई जगह लाफ़िंग एक्सरसाइज़ चल रहे थे. अधिकांश बुज़ुर्ग ही थे जो नकली हंसी के बहाने हंस रहे थे.  और मेरा मन पुराने ठहाकों की ओर दौड़ रहा था.
एक समय था, जब लोगों का मिलना-जुलना, बैठना और बैठकों में हंसी-ठट्ठा होना बहुत आम बात थी.शहर की गलियों में, गर्मियों की हर शाम, देखने लायक़ होती थी. घरों के बाहर पानी का झिड़काव और फिर चार-छह कुर्सियों का घेरा. बीच में टेबल. धीरे-धीरे पापाजी के वे मित्र आने शुरु होते जो प्राय: रोज़ ही आते थे. देश-दुनिया की बातें, समाज की बातें, और उससे भी ज़्यादा यहां-वहां की अनर्गल बातें. ज़रा-ज़रा सी बात पर ज़ोरदार ठहाका लगता. ऐसे ठहाके हर पांच मिनट पर सुनाई देते, जिनकी गूंज अगले तीन मिनट तक बनी रहती. ये विशुद्ध हास्य के ठहाके थे. इनमें किसी का मज़ाक नहीं उड़ाया जा रहा था, किसी पर तंज नहीं कसा जा रहा था, इन ठहाकों से किसी तीसरे को दुखी नहीं किया जा रहा था. जी भर के हंसते थे लोग. इतना कि हंसते-हंसते पेट दुख जाये. इतना कि हंसते-हंसते आंसू बहने लगें......!! पूरा माहौल ही जैसे मुस्कुराने लगता था. धरती से आसमान तक, केवल हंसी का साम्राज्य हो जैसे...!
ऐसा नहीं था कि हंसी केवल बड़ों तक ही सीमित थी. बच्चों के पास भी हंसी के ख़ज़ाने थे. तेनालीराम के किस्से, अकबर-बीरबल, मोटू-पतलू, लम्बू-छोटू, ढब्बू जी, और भी पता नहीं कौन-कौन से पात्र केवल बच्चों को नहीं, बड़ों को भी घेरे रहते थे अपनी हंसी के व्यूह में. ’नन्दन’ में तेनालीराम का नियमित स्तम्भ होता था. चम्पक में चीकू का तो पराग में छोटू-लम्बू का. पत्रिकाओं के सबसे पहले खोले जाने वाले स्तम्भ होते थे ये. ये वो पात्र हैं, जिनका नाम भर लेने से आज भी चेहरे पर मुस्कुराहट आ जाती है. ये पात्र कैसा ग़ज़ब का हास्य सृजित करते थे! थोड़ा सा और बाद में बिल्लू, पिंकी, चाचा चौधरी जैसे पात्र कॉमिक्स के ज़रिये आये. अब तक तेनाली राम और अकबर-बीरबल भी कॉमिक्स के रूप में आ चुके थे. ये नन्हे-मुन्ने पात्र भी विशुद्ध हास्य ही पेश करते. साथ ही, इसमें तमाम शिक्षाप्रद बातें भी हंसी-हंसी में ही सिखा दी जातीं. तेनालीराम और बीरबल की बुद्धि का लोहा तो उनके राजा/बादशाह भी मानते थे. कमाल की बुद्धिमत्तापूर्ण बातें होती थीं, ज़बरदस्त हास्य के साथ.
पुरानी फ़िल्में यदि आप देखें, तो पायेंगे कि हर फ़िल्म में एक क~ऒमेडियन ज़रूर होता था. बिना हास्य कलाकार के फ़िल्म अधूरी सी लगती थी. इस हास्य कलाकार का काम था, अभिनेता के साथ मिल के किसी भी घटना पर हास्य का सृजन करना. दर्शक भी जी खोल के हंसते थे इन पात्रों के अभिनय पर. महमूद, मुकरी, राजेन्द्रनाथ, टुनटुन, मनोरमा जैसे कुछ बहुत अच्छे हास्य अभिनेता हैं, जिन्हें कोई भूल नहीं सकता. फ़िल्मों में इनकी उपस्थिति का उद्देश्य भी फ़िल्म को बोझिल होने से बचाना होता था. यानी, हास्य ज़िन्दगी का अहम हिस्सा था. लेकिन धीरे-धीरे हास्य का स्थान व्यंग्य ने ले लिया. अब पड़ोसी हो, रिश्तेदार हो, अपरिचित हो, परिचित हो, अधिकारी हो, मातहत हो, सरकार हो, मंत्री हो, नेता हो, सब केवल व्यंग्य के अधिकारी और व्यंग्य के पात्र हो गये हैं. आज हंसी में भी कड़वाहट सी घुल गयी है. ठीक वैसे ही जैसे हवा में कार्बन डाइऑक्साइड...... लोग हंसते कम हैं, हंसी ज़्यादा उड़ाते हैं. अब तो मुस्कुराहट भी कई अर्थ देने लगी है. पता नहीं व्यंग्य भरी मुस्कान है, या उपहास भरी!! हंसी का गुमना, यानी हमारे सबसे महत्वपूर्ण गुण का खत्म होना. हंसी का वरदान सभी जीवों में केवल इंसानों को ही प्रकृति ने दिया है. इसे बचा के रखें. न केवल बचायें, बल्कि बढ़ायें. न केवल बढ़ायें, बल्कि बढ़ाते रहने की चिन्ता भी करें, ठीक उसी तरह जैसे हम बैंक में रखे पैसे की चिन्ता करते हैं. खूब हंसे और दूसरों को हंसायें, बस हंसी न उड़ायें किसी की भी.
(नई दुनिया के लिये लिखे, और प्रकाशित बहुत सारे लेख इकट्ठे हो गये हैं, सो सोचती हूं यहां पोस्ट कर दूं, ताकि ब्लॉग पर आने-जाने का सिलसिला जमा रहे)